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Thursday, May 06, 2010

उर्दू कविता

'भाषासेतु' पर गुलज़ार एक बार फिर।
गुलज़ार

इक नज़्म यह भी
छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूंथा करते थे
आँख लगाकर, कान बनाकर
नाक सजा कर
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला
तेरा उपला
अपने अपने जाने पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे
हँसता खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पर खेला करता था
मेरा उपला सूख गया
उसका उपला टूट गया
रात को आंगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर कर बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आई
किसका उपला राख हुआ
वह पंडित था
वह मास्टर था
इक मुन्ना था
इक दशरथ था
बरसों बाद
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक़्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!

Saturday, April 10, 2010

ग़ज़ल


बहुत दिनों से चाहता था अपने ब्लॉग पे पाकिस्तान के मशहूर शायर जनाब अहमद फ़राज़ की कुछ ग़ज़लें पेश करूँ। सबसे पहले मेहंदी हसन साब की गायी वो मशहूर ग़ज़ल 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ' से ही मैंने फ़राज़ के बारे में जाना। फिर सिलसिला निकल पड़ा। कौन नहीं बार बार सुनना चाहता है मेहंदी साब की ही गायी फ़राज़ की वो एक और मशहूर ग़ज़ल 'ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं'? बहरहाल चूँकि ये दोनों ग़ज़लें बहुत बार सुनी गयी हैं, इसलिए यहाँ दो दूसरी ग़ज़लें पेश हैं।

अहमद फ़राज़ की चन्द ग़ज़लें
एक
बरसों के बाद देखा एक शख्स दिलरुबा सा
अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू खिंचे खिंचे से ऑंखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा

अल्फाज़ थे के जुगनू आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा

ख्वाबों में ख्वाब उसके यादों में याद उसकी
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िन्दगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बतों ने वो नामुरादियाँ दी
ताज़ा रफ़ाक़तों से दिल था डरा डरा सा

अब सच कहें तो यारो हमको खबर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत एक वाकिया ज़रा सा

तेवर थे बेरुखी के अंदाज़ दोस्ती का
वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा

हमने भी उसको देखा कल शाम इत्तेफाक़न
अपना भी हाल है अब लोगो 'फ़राज़' का सा

दो
इससे पहले के बेवफा हो जाएँ
क्यों न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज्र करें
और कहीं और मुब्तला हो जाएँ

इश्क भी खेल है नसीबों का
खाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ

अबके गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ

बंदगी हमने छोड़ दी है 'फ़राज़'
क्या करें लोग जब खुदा हो जाएँ

Sunday, March 14, 2010

उर्दू नज्में





चेहरे पे दुनिया भर की मलामत और दो चार दिनों की हजामत। गुलज़ार साब का ये ट्रेड मार्क है। जाने माने सिनेमादाँ और उतने ही जाने माने ग़ज़लगो। भाषासेतु के पाठकों के लिए पेश है उनकी कुछ नज्में।



गुलज़ार


बेखुदी
दो सोंधे सोंधे जिस्म जिस वक़्त
एक मुट्ठी में सो रहे थे
लबों की मद्धिम तबील सरगोशियों में साँसें उलझ गयी थीं
मुंदे हुए साहिलों पे जैसे कहीं बहुत दूर
ठंडा सावन बरस रहा था
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था?
बता तो उस वक़्त तू कहाँ था?

तुझे ऐसे ही देखा था कि...
तुझे ऐसे ही देखा था कि जैसे सबने देखा है
मगर फिर क्या हुआ जाने...
कि जब मैं लौटकर आया
तेरा चेहरा मेरी आँखों में रोशन था
किसी झक्कड़ के झोंके से गिरी बत्ती
बस एक पल का अँधेरा फिर
अचानक आग भड़की
और हर एक चीज़ जल उठी।

पूर्ण सूर्यग्रहण
कॉलेज के रोमांस में ऐसा होता था
डेस्क के पीछे बैठे बैठे
चुपके से दो हाथ सरकते
धीरे धीरे पास आते...
और फिर एक अचानक पूरा हाथ पकड़ लेता था
मुट्ठी में भर लेता था।
सूरज ने यों ही पकड़ा है चाँद का हाथ फलक में आज।

ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम
बहुत जी चाहता है फिर से बो दूँ अपनी आँखें
तुम्हारे ढेर सारे चेहरे उगाऊं, और बुलाऊं बारिशों को
बहुत जी चाहता है कि फुर्सत हो, तसव्वुर हो
तसव्वुर में ज़रा सी बागबानी हो!

मगर जानां
एक ऐसी उम्र में आकर मिली हो तुम
किसी के हिस्से की मिटटी नहीं हिलती
किसी की धूप का हिस्सा नहीं छनता
मगर क्या क्यारी के पौधे पास अपने
अब किसी को पाँव रखने के लिए भी थाह नहीं देते
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम?