Wednesday, June 02, 2010
हिंदी कहानी
टोकरी भर मिट्टी
माधवराव सप्रे की इस कहानी को हिंदी की शुरुआती कहानियों में गिना जाता है। बल्कि कुछ आलोचकों ने इसे ही हिंदी की पहली कहानी माना है। भाषासेतु के पाठकों के लिए विशेष रूप से।
किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास गरीब विधवा की झोंपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता झोंपड़ी तक बढाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई ज़माने से वहीं बसी थी। उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोंपड़ी में मर गया था। पतोहू भी पांच बरस की एक कन्या को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। जब कभी उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दुःख के फूट फूट के रोने लगती। और जब से उसने अपने श्रीमान पडोसी की इच्छा का हाल सुना तब से वह मृतप्राय हो गयी थी। उस झोंपड़ी में उसका ऐसा कुछ मन लग गया था कि बिना मरे वहां से निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए, तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकलने वाले वकीलों की थैली गरम कर उनहोंने अदालत में उस झोंपड़ी पर अपना कब्ज़ा कर लिया और विधवा को वहां से निकाल दिया।
बेचारी अनाथ तो थी ही, पांडा पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी। एक दिन श्रीमान उस झोंपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बता रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहां पहुंची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहाँ से हटा दो। पर वह
गिड़गिड़ाकर बोली, 'महाराज, अब तो झोंपड़ी तुम्हारी ही हो गयी है। मैं उसे लेने नहीं आई हूँ। महाराज, क्षमा करें तो एक विनती है।' जमींदार साहब के सर हिलाने पर उसने कहा, 'जब से यह झोंपड़ी छूटी है तब से पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत समझाया, पर एक नहीं मानती। कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊँगी। अब मैंने सोचा है कि इस झोंपड़ी में से एक टोकरी मिट्टी लेकर, उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊँगी। इससे भरोसा है कि यह रोटी खाने लगेगी। महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिये तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊँ।
श्रीमान ने आज्ञा दे दी।
विधवा झोंपड़ी के भीतर गयी। वहां जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और आँखों से आंसू की धारा बहने लगी। अपने आतंरिक दुःख को किसी तरह संभालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आई। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी,' महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगायें, जिससे कि मैं उसे अपने सर पर धर लूँ।' जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज़ हुए, पर जब वह बार बार हाथ जोड़ने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गयी। किसी नौकर से न कह कर आप ही स्वयं टोकरी उठाने को आगे बढे। ज्यों ही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे, त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति से बाहर है। फिर तो उनहोंने अपनी सब ताक़त लगाकर टोकरी को उठाना चाह, पर जिस स्थान में टोकरी रखी थी, वहां से वह एक हाथ भर भी ऊंची न हुई। तब लज्जित होकर कहने लगे कि, नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।
यह सुनकर विधवा ने कहा, 'महाराज, नाराज़ न हों। आपसे तो एक टोकरी भर मिट्टी उठाई जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी है। उसका भार जनम भर क्योंकर उठा सकेंगे। आप ही इस बात का विचार कीजिए।'
जमींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्त्तव्य भूल गए थे, पर विधवा के उक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गयीं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उनहोंने विधवा से क्षमा मांगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी।
Saturday, March 06, 2010
हिंदी कहानी

छुट्टी का दिन
शशिभूषण द्विवेदी
पूरा हफ्ता बीत जाता है छुट्टी के दिन का इंतजार करते और जब छुट्टी का दिन आता है तो मन और भी आतंकित हो जाता है। पूरा दिन एक ऊब और बेचैनी के साथ कैसे कटेगा-सोचते ही मन और भी झल्ला उठता है। छुट्टी के दिन की दिनचर्या भी अजीब होती है। देर तक सोने की इच्छा के बावजूद नींद लगभग समय पर ही खुलती है। कुनमुनाया, अलसाया...थोड़ी देर और सो लेने की कोशिश में थोड़ा सा वक्त और जाया हो जाता है। आखिर न चाहते हुए भी उठना ही पड़ता है। हाथ-मुंह धोकर ट्रैक सूट पहनता हूं। देखता हूं पत्नी अभी तक मिट्टी के लोंदे की तरह बिस्तर पर बिखरी पड़ी है। उसे पता है कि आज छुट्टी का दिन है सो वह आज देर तक सोएगी। मन करता है कि उसके फैले हुए नितंबों पर एक जोरदार लात मारूं मगर फिर खुद को संभाल लेता हूं। जानता हूं कि अब चाहे अनचाहे सारा दिन इसी के साथ गुजारना है सो सुबह-सुबह उसे चूमने में ही भलाई है। मैं उसे चूमता हूं लेकिन सुबह-सुबह उसके मुंह की बास मेरे भीतर एक अजीब तरह की मितली पैदा कर देती है। मन करता है कि उसकी बिखरी हुई देह पर उल्टी कर दूं लेकिन कर नहीं पाता। बहुत सी चीजें हम चाहकर भी नहीं कर पाते। जैसे हम चाहकर भी मंहगाई को नहीं रोक पाते। हां, मंहगाई से याद आया-दो महीने हो गए बिजली का बिल जमा किए। इस महीने जमा न किया तो कनेक्शन ही कट जाएगा। सोचा था इस छुट्टी में करा ही दूंगा, हर बार टल जाता है। हालांकि बिजली पानी का बिल जमा कराना भी किसी सिरदर्द से कम नहीं। छुट्टी वाले दिन वैसे भी आधे ही दिन बिल जमा होते हैं। फिर इतनी लंबी लाइन लगती है कि पूछो मत। समझिए कि आधा दिन तो इसी में गया। मैं घड़ी देखता हूं। सुबह के सात बज रहे हैं। मैं पत्नी को घर में सोता छोडक़र बाहर घूमने निकल जाता हूं। सुबह घूमने के बहाने एक पंथ दो काज हो जाते हैं। दरअसल घर खर्च कम करने की कवायद में दो तीन महीने पहले पत्नी ने घर आने वाला अखबार बंद करा दिया। पत्नी को लगता है कि अखबार खरीदना फिजूलखर्ची है और अखबार पढऩा समय की बर्बादी। आखिर होता ही क्या है अखबारों में आजकल-वही रोज की बासी खबरें-चोरी, छिनैती, बलात्कार, घोटाले...। लेकिन सुबह-सुबह अखबार पढऩे की अपनी बरसों पुरानी आदत मैं चाहकर भी नहीं छोड़ पाया। सुबह सुबह अखबार न पढ़ो तो लगता है कि दिन की ठीक से शुरुआत ही नहीं हुई। पहले मैं सुबह सुबह बाथरूम में अखबार लेकर घुस जाता था और नित्यकर्म करते हुए पूरा अखबार चाट लेता था। फिर तरोताजा होकर बाहर आता था। तब तक पत्नी भी चाय बनाकर ले आती थी और हम इत्मीनान से चाय पीते थे। लेकिन अब वे सब बीते दिनों की बातें हो गईं। अब तो सुबह टहलने के बहाने चाय की दुकान पर खड़े खड़े ही अखबार भी पढ़ लेता हूं। हालांकि शुरू शुरू में खाली-पीली अखबार पढऩे पर चायवाला भी मुझे बहुत तिरस्कारपूर्ण नजरों से घूरता था और बार बार आकर पूछ जाता था कि साहब चाय चलेगी। मेरे मना करने पर वह बुरा सा मुंह बना लेता। कभी कभी तो एेसा भी हुआ कि उसने सीधे सीधे मुझसे कह दिया कि साहब गाहकों को बैठने दीजिए। धंधे का टाइम है। आपका क्या है, आप तो मुफत में अखबार पढक़र चले जाएंगे। धंधा तो हमारा खोटा होगा। उसकी एेसी बातों का मुझे सचमुच बहुत बुरा लगता था। इस बुरे लगने के चलते ही अब कभी कभी मैं उसे हाफ चाय या सिगरेट का आर्डर दे देता हूं और बदले में वह मुझे चुपचाप अखबार पढऩे देता है। हालांकि हाफ कप चाय के बदले घंटे भर उसे मेरा अखबार पढऩा अब भी अखरता है लेकिन बेशर्मी से मैंने अब उसकी ओर ध्यान देना छोड़ दिया है।चाय की दुकान पर सबसे पहले मैं अपना राशिफल देखता हूं, फिर मौसम का हाल। राशिफल में लिखा है कि आज कोई शुभ सूचना मिलेगी और धनोपर्जन होगा। मैं सोचता हूं कि आज महीने की बीसवीं तारीख है। धनोपर्जन की तो कहीं कोई संभावना नजर नहीं आती बल्कि खर्च ही खर्च होना है। यही हाल मौसम के हाल का है। उसमें लिखा है आसमान साफ रहेगा लेकिन कहीं कहीं हल्की बूंदाबांदी हो सकती है। मगर यहां तो सुबह से ही जबरदस्त बारिश के आसार नजर आ रहे हैं। अखबार में और भी तमाम खबरें हैं-मसलन पेट्रोलियम मंत्री ने पेट्रोल और डीजल के दामों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी के संकेत दिए हैं और कृषि मंत्री का कहना है कि मंहगाई रोकने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। केंद्र इसके लिए राज्य सरकारों को दोष दे रहा है और राज्य सरकारें केंद्र को कोस रही हैं। बयान, बयान और बयान। पूरा अखबार नेताओं और मंत्रियों की बयानबाजी से अटा पड़ा है। मैं सिगरेट के साथ हाफ चाय सुडक़कर अखबार रख देता हूं और सोचता हूं अब सिगरेट भी छोड़ ही देनी चाहिए। सेहत और खर्च दोनों लिहाज से यह एक अच्छा विचार है। हालांकि यह अच्छा विचार इससे पहले भी मुझे सैकड़ों बार आया है लेकिन उस पर अमल करने का विचार रोज अगले दिन के लिए टल जाता है।मैं देखता हूं घड़ी में आठ बज रहे हंै और आसमान में बादल घने हो रहे हैं। मुझे जल्द ही नहा-धोकर बिजलीघर जाना होगा वरना बारिश से सब गुड़ गोबर हो सकता है। मैं तेज कदमों से घर की ओर लौट पड़ता हूं। घर में पत्नी रसोई में उठापटक कर रही है। यह उसकी रोज की खीझ है जो रसोई में बर्तनों पर निकलती है जिसे मैं रोज की तरह ही सुनकर अनसुना कर देता हूं। लेकिन तभी उसकी खीझभरी आवाज आती है-‘गैस खत्म हो गई है। कितने दिन से कह रही थी बुक करवा दो...लेकिन कोई सुने तब न...’-‘गैस के दाम भी बढ़ गए हैं।’ मैं कहता हूं।-‘तो?’-‘तो...तो कुछ नहीं। आज बिजलीघर जाना है बिल जमा कराने।’-‘पहले गैस का कुछ इंतजाम करो।’मैं नहाने के लिए बाथरूम में घुस जाता हूं। पत्नी की बड़बड़ाहट नल के पानी के शोर में गुम हो जाती है। मेरे नहाकर बाथरूम से बाहर आने तक पत्नी ने नाश्ता तैयार कर दिया है। नाश्ता करते हुए मैं गुनगुनाने लगता हूं-गिलोरी बिना चटनी कैसे बनी...। लेकिन पत्नी मुझे अनसुना करते हुए बड़बड़ा रही है जैसे मैं उसे अनसुना करते हुए गुनगुना रहा हूं।-‘सिलेंडर झुकाकर थोड़ी सी गैस निकल आई लेकिन जैसे भी हो दोपहर तक कहीं से भी गैस का बंदोबस्त करो वरना खाना भी नहीं बन पाएगा। कितनी बार कहा कि दूसरा सिलेंडर बुक करवा लो। कभी अचानक गैस खत्म हो जाए तो ये दिन तो न देखना पड़े॥मगर सुनता कौन है...’-‘अब ठीक है..बिजलीघर जाते हुए बुक करवाता आऊंगा।’-‘बुक वुक नहीं...गैस आज ही आनी चाहिए और अब्भी।’ मैं कोई जवाब नहीं देता और तैयार होकर घर से निकल पड़ता हूं। दस बज गए हैं। बाहर हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई है। शुक्र है कि मौसम को देखते हुए छतरी साथ लेता आया था। बिजलीघर पहुंचते पहुंचते बारिश और भी तेज हो गई लेकिन बिल जमा कराने वालों की लाइन में कहीं कोई कमी नहीं आई। बिल काउंटर के पास कीचड़ ही कीचड़ हो गया है। बारिश की फुहारों से बचने के लिए लोग ठेलमठेल मचाए हैं। लाइन इतनी लंबी है कि लगता नहीं कि दो घंटे बाद भी मेरा नंबर आ पाएगा। काउंटर क्लर्क इतना सुस्त है कि एक एक आदमी पर दस दस मिनट लगा रहा है। लोग कुनमुना रहे हैं और सरकारी कर्मचारियों की काहिली को कोस रहे हैं। बीच बीच में कोई काउंटर क्लर्क का जान पहचान वाला आ जाता है तो उसका काम आउट आफ वे जाकर भी हो जाता है जिससे लाइन में लगे लोगों का गुस्सा बढ़ जाता है और हल्ला शुरू हो जाता है। हालांकि इस हल्ले का कोई असर नहीं होता। बस लोग बड़बड़ाते रहते हैं और जान पहचान वाले या दबंग लोग लाइन को धकियाकर अपना काम करा ले जाते हैं। मैं घड़ी देखी साढ़े ग्यारह होने को आए। अब भी पांच-सात लोग लाइन में हैं। मेरी बेचैनी बढ़ जाती है। लगता नहीं कि आज मेरा नंबर आ पाएगा। एक एक पल भारी होता जा रहा है। ग्यारह बजकर पचास मिनट हो गए हैं। दो लोग अब भी मेरे आगे हैं। मैं हड़बड़ी में हूं-भइया जरा जल्दी करो। काउंटर क्लर्क घुडक़र मेरी ओर देखता है। उसकी घुडक़ी में एक हिकारत है।-‘काम ही कर रहा हूं। कोई मक्खी तो मार नहीं रहा।’ जानता हूं कि क्लर्क से बहस करने का कोई मतलब नहीं, वरना अभी काउंटर बंद कर देगा। बहरहाल, मेरा नंबर आखिरकार आ ही गया। घड़ी में अभी बारह बजने में पांच मिनट बाकी हैं। मैं जैसे ही बिल की रसीद उसकी ओर बढ़ाता हूं, वह पेशाब का बहाना करके उठ जाता है। मैं उसकी इस हरकत पर खीझ उठता हंू पर कुछ कह नहीं पाता। पांच मिनट बाद क्लर्क लघुशंका से निपटकर लौटता है और एेलान कर देता है कि टाइम खत्म हो गया है, अब कल आना। मेरा दिल धक से रह जाता है। दो घंटे की मेहनत पर पानी फिरता नजर आता है। अब मैं याचना की मुद्रा में आ गया हूं।-‘दो घंटे से खड़ा हूं सर...प्लीज जमा कर लीजिए बिल..वरना..’-‘वरना क्या? हम भी दो घंटे से काम ही कर रहे हैं, कोई झख तो नहीं मार रहे। इतनी ही जल्दी थी तो समय पर क्यों नहीं आए?’-‘प्लीज सर...बड़ी मुश्किल से आ पाया हूं...मेहरबानी होगी...’ मेरे चेहरे पर जाने कैसा तो दीनता का भाव है कि क्लर्क थोड़ा पसीजने लगता है।-‘अच्छा लाओ...लेकिन बाकी सब कल आएं।’ मेरी जान में थोड़ी जान आती है। आखिरकार मेरा बिल जमा हो जाता है मगर पीछे से फिर वही शोर शुरू हो जाता है-प्लीज सर...प्लीज सर... लेकिन तब तक खिडक़ी बड़ी बेरहमी से बंद हो जाती है। मैं खुश हूं कि आखिरकार मेरा बिल जमा हो गया। मुझमें एक विजेता का सा भाव घर करने लगता है।बाहर बारिश और भी तेज हो गई है। घड़ी साढ़े बारह बजा रही है। अब मुझे फौरन गैस स्टेशन की ओर भागना होगा वरना घर में खाना नहीं बनेगा। गैस स्टेशन पहुंचते पहुंचते एक डेढ़ बज जाते हैं मगर बारिश थमने का नाम नहीं लेती। मैं लगभग आधे से ज्यादा भीग चुका हूं। स्टेशन पहुंचने पर पता चलता है कि आज तो छुट्टी का दिन है। ‘हे भगवान, अब क्या होगा?’ मेरे हाथ-पांव फूलने लगते हैं। मैं आस-पास लोगों से पूछता हूं। रिरियाता हूं। घर में गैस खत्म होने का हवाला देता हूं। मेरे पेट में चूहे भी कूदने लगे हैं। घर में पत्नी भी भूखी होगी, मैं सोचता हूं। तभी बीड़ी का सुट्टा लगाता हुआ एक दलाल टाइप आदमी मेरे पास आता है। वह घूरकर एक नजर मेरी ओर देखता है।-‘गैस चाहिए?’-‘हां।’-‘ब्लैक में मिलेगा। तीस परसेंट एक्स्ट्रा।’-‘ये तो बहुत ज्यादा है। कुछ कम में नहीं होगा?’-‘लेना है तो बोलो वरना रास्ता नापो।’ मुझे पत्नी का खीझ और हताशा से भरा चेहरा याद आ जाता है। मैं फौरन हां कह देता हूं।-‘कितना लगेगा?’-‘सात सौ रुपये।’ मैं पर्स टटोलता हूं। पर्स में सिर्फ पांच सौ रुपये हैं। मैं पांच सौ रुपये उसे सौंप देता हूं।-‘सिलेंडर घर पहुंचाओ। बाकी के पैसे घर पर दूंगा।’-‘सिलेंडर घर पहुंचाने के पचास रुपये एक्स्ट्रा लगेंगे।’ वह मेरी मजबूरी का फायदा उठा रहा है। मैं कहता हूं-‘ये तो ज्यादती है।’-‘ज्यादती वादती कुछ नहीं। एक तो छुट्टी का दिन, ऊपर से मौसम देख रहे हैं।’ मैं झल्लाता हूं मगर कुछ नहीं कर पाता। फौरन सिलेंडर घर पहुंचाने को कहकर उसके साथ चल देता हूं। घड़ी में दो बज रहे हैं। बारिश अब भी रुकने का नाम नहीं ले रही। हालांकि गैस मिल जाने से मेरे भीतर एक सुकून सा आ गया है। अब बारिश से भीगी मिट्टी की सोंधी गंध मुझे अच्छी लगने लगी है।सिलेंडर के साथ जैसे-तैसे मैं घर पहुंचता हूं। ढाई बज चुके हैं। पत्नी का पारा सातवें आसमान पर है। मैं उसकी ओर ध्यान नहीं देता और गैसवाले का बकाया भुगतान कर उसे रवाना कर देता हूं। पत्नी भी बिना मुझसे कुछ कहे सिलेंडर रसोई में रखवा लेती है और खाना बनाने जुट जाती है। कुकर की सीटी और खाने की खुशबू से मेरी भूख और भी बढ़ जाती है। इस बीच मैं रूठी पत्नी को मनाने की योजना बनाने लगता हूं। साढ़े तीन तक खाना बनकर तैयार हो जाता है और मैं झटपट खाने बैठ जाता हूं। खाना आज कुछ ज्यादा ही स्वादिष्ट लग रहा है। मैं भरपेट खाकर एक जोरदार डकार लेता हूं। पत्नी भी चुपचाप खाना खाकर बर्तन समेटकर रसोई में चली जाती है। मैं आराम की मुद्रा में थोड़ी देर टीवी देखने के लिए टीवी ऑन करता हूं मगर बिजली गुल है। कमबख्त बिजली में भी इन दिनों सात-आठ घंटे की कटौती होने लगी है। रोज रोज के धरना प्रदर्शन के बावजूद बिजली की हालत इन दिनों बद से बदतर होती जा रही है। अभी चार दिन पहले गुस्साए लोगों ने बिजली विभाग के एसडीओ की उसके दफ्तर में सरेआम पिटाई ही कर दी। मगर सरकार के कान पर जूं रेंगने का नाम नहीं लेती। हारकर मैं बिस्तर पर लौटकर लेट जाता हूं। हालांकि नींद फिर भी नहीं आती। मैं बार-बार घड़ी देखता हूं। साढ़े चार बज चुके हैं। मैं पत्नी को मनाने की तरकीबें सोचता हूं और उठकर रसोई में चला आता हूं जहां पत्नी चाय बना रही है। इस बेचारी को छुट्टी के दिन भी आराम नहीं सिवाय सुबह थोड़ी देर ज्यादा सो लेने के। मैं उसे पीछे से अपनी बाहों में भर लेता हूं। वह झुंझला जाती है।-‘क्या कर रहे हो...छोड़ो...खिडक़ी खुली है कोई देख लेगा।’-‘देखता है तो देखे...अब तो खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों।’ मैं रोमांटिक मूड में गुनगुनाने लगता हूं।-‘क्या बात है..बड़ी मस्ती के मूड में हो।’ पत्नी की आंखों में शरारत है। उसका गुस्सा काफूर हो उठा है। मैं उसके इसी अंदाज पर रीझ उठता हूं। तमाम परेशानियां उसकी एक मुस्कान के आगे बौनी हो जाती हैं। मैं झट से उसके होठों को चूम लेता हूं और उसे बाहों में भरे भरे नाचने लगता हूं-‘छुट्टी का दिन है कि मस्ती में हैं हम...मस्त मस्त मस्ती..याहू्...’ पत्नी प्यार से मुझे झिडक़ देती है,‘अब बचपना छोड़ो और चलो चाय पियो।’ मैं चाय का कप लिए उसके साथ ड्राइंगरूम में आ जाता हूं। अब तक बिजली भी आ गई है। हम टीवी देखते हुए चाय पीने लगते हंै। शाम के साढ़े पांच बज चुके हैं। पत्नी बाजार चलने की फरमाइश करने लगती है। मैं उसका मूड खराब करना नहीं चाहता। हालांकि मन ही मन आज हुए खर्च का हिसाब लगाने लगता हूं। एक ही दिन में कुल चार हजार की चपत लग चुकी है। ‘खैर..मौसम खुशनुमा है और छुट्टी का दिन खराब नहीं करना है।’ मैं सोचता हूं और फौरन बाजार के लिए तैयार होने लगता हूं। हम बाजार में हैं। शाम के सात बज रहे हैं। अंधेरा घिरने लगा है। बाजार में चारों ओर जगमगाहट है। लगता है जैसे मौसम का लुत्फ लेने पूरा शहर घरों से बाहर निकल आया है। नए-नए जोड़े हाथों में हाथ में डाले इत्मीनान से टहल रहे हैं या आइसक्रीम खा रहे हैं।-‘कितने दिन हुए इतने अच्छे मौसम में हमें बाजार आए...न।’ पत्नी कहती है और मैं उसकी हां में हां मिला देता हूं। टहलते टहलते हम एक शापिंग मॉल के सामने आ जाते हैं। मॉल रंग बिरंगी रोशनियों में जगमगा रहा है और अपनी भव्यता और वैभव से पूरे शहर को मुंह चिढ़ा रहा है। शहर में पिछले दो साल में पांच मॉल और मल्टीप्लैक्स खुले हैं और सब एक से बढक़र एक। इस बीच रेहड़ी और खोमचे वालों की एक पूरी दुनिया ही उजड़ गई है और साप्ताहिक हाट बाजार का हाल बद से बदतर हो गया है। मॉल के आस पास रेहड़ी और खोमचे लगाने की सख्त मनाही है और कभी भूल से भी किसी ने एेसा दुस्साहस कर लिया तो उसके लिए पुलिस का जालिम डंडा तो है ही। बहरहाल, मॉल के आगे लंबी लंबी गाडिय़ों की लाइन लगी है और उसमें चढ़ते उतरते लोग मुझमें बेतरह हीनभावना पैदा कर रहे हैं। वे किसी दूसरी दुनिया से आए हुए लगते हैं जिनकी जेबें नोटों से भरी हुई हैं और जिनके चेहरे पर कहीं किसी दु:ख, परेशानी या मुश्किल के निशान नहीं हैं।मॉल के भीतर जगमग रोशनियों के बीच वस्तुओं का पूरा बाजार है जिनके ऊपर उनकी कीमतों के टैग लगे हैं। यहां हर चीज ब्रांडेड है और ब्रांड की ही कीमत है। लोग यहां चीजें अपनी जरूरत के हिसाब से नहीं, ब्रांड के हिसाब से लेते हैं। एक ब्रांडेड जींस की कीमत चार हजार, जूता सात हजार और बित्ते भर टॉप दो हजार। मेरे बगल में खड़ी एक अल्ट्रा मॉड लडक़ी झटपट एक जींस और टॉप उठाती है और उन्हें आजमाने के लिए ट्रायल रूम में घुस जाती है। दो मिनट बाद जब वह बाहर आती है तो मैं देखता हूं उन कसे हुए कपड़ों में उसका शरीर जैसे फट पडऩे का आतुर है। डीप नेक टॉप और लो हिप जींस में उसका शरीर और भी दिलकश हो उठा है। मैं पत्नी से नजरें बचाकर उसके शरीर के खुले गोपन अंगों को घूरने लगता हूं और वह क्रेडिट कार्ड से पेमेंट कर बेपरवाही से टहलते हुए मॉल से बाहर निकल जाती है। पत्नी वहां तमाम चीजों को ललचाई निगाहों से उठा उठाकर देख रही है फिर उनकी कीमतें पढक़र मायूस हो जाती है और चुपचाप उन्हें यथास्थान रख देती है। कुछ जरूरी चीजों की खरीदारी के बाद हम जगमग रोशनियों के उस संसार से बाहर आ जाते हैं। घड़ी में साढ़े आठ बज रहे हैं। रास्ते में गोलगप्पे खाने के बाद अपनी तमाम तमाम अधूरी इच्छाओं के साथ हम घर की ओर लौट पड़ते हैं। आखिर सुबह दफ्तर के लिए जल्दी उठना भी तो है।
शशिभूषण द्विवेदी हिंदी की युवा पीढी के जाने माने कथाकार हैं। भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित हैं। एक कहानी संग्रह : ब्रह्महत्या तथा अन्य कहानियां। पिछले कई सालों के बाद उनकी यह कहानी : 'छुट्टी का दिन'। संपर्क :405, सुपरटेक अपार्टमेंट, 5/५3, सेक्टर-५, राजेंद्र नगर, साहिबाबाद, (गाजियाबाद) उ।प्र.
Wednesday, February 10, 2010
गाब्रिएल गार्सिया मार्कस

गांव में कुछ बहुत बुरा होने वाला है
एक बहुत छोटे से गांव की सोचिए जहां एक बूढ़ी औरत रहती है, जिसके दो बच्चे हैं, पहला सत्रह साल का और दूसरी चौदह की। वह उन्हें नाश्ता परस रही है और उसके चेहरे पर किसी चिंता की लकीरें स्पष्ट हैं। बच्चे उससे पूछते हैं कि उसे क्या हुआ तो वह बोलती है - मुझे नहीं पता, लेकिन मैं इस
पूर्वाभासके साथ जागी रही हूं कि इस गांव के साथ कुछ बुरा होने वाला है।
दोनों अपनी मां पर हंस देते हैं। कहावत हैं कि जो कुछ भी होता है, बुजुर्गों को उनका पूर्वाभास हो जाता है। लड़का पूल’ खेलने चला जाता है, और अभी वह एक बेहद आसान गोले को जीतने ही वाला होता है कि दूसरा खिलाड़ी बोल पड़ता है- मैं एक पेसो की शर्त लगाता हूं कि तुम इसे नहीं जीत पाओगे।
आस पास का हर कोई हंस देता है। लड़का भी हंसता है। वह गोला खेलता है और जीत नहीं पाता। शर्त का एक पेसो चुकाता है और सब उससे पूछते हैं कि क्या हुआ, कितना तो आसान था उसे जीतना। वह बोलता है-.बेशक, पर मुझे एक बात की फिक्र थी, जो आज सुबह मेरी मां ने यह कहते हुए बताया कि इस गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है।
सब लोग उस पर हंस देते हैं, और उसका पेसो जीतने वाला शख्स अपने घर लौट आता है, जहां वह अपनी मां, पोती या फिर किसी रिश्तेदार के साथ होता है। अपने पेसो के साथ खुशी खुशी कहता है- मैंने यह पेसो दामासो से बेहद आसानी से जीत लिया क्योंकि वह मूर्ख है।
“और वह मूर्ख क्यों है?”भई! क्योंकि वह एक सबसे आसान सा गोला अपनी मां के एक एक पूर्वाभास की फिक्र में नहीं जीत पाया, जिसके मुताबिक इस गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है।आगे उसकी मां बोलती है-तुम बुजुर्गों के पूर्वाभास की खिल्ली मत उड़ाओ क्योंकि कभी कभार वे सच भी हो जाते हैं।
रिश्तेदार इसे सुनती है और गोश्त खरीदने चली जाती है। वह कसाई से बोलती है-एक पाउंड गोश्त दे दोया ऐसा करो कि जब गोश्त काटा ही जा रहा है तब बेहतर है कि दो पाउंड मुझे कुछ ज्यादा दे दो क्योंकि लोग यह कहते फिर रहे हैं कि गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है।
कसाई उसे गोश्त थमाता है और जब एक दूसरी महिला एक पाउंड गोश्त खरीदने पहुंचती है, तो उससे बोलता है- आप दो ले जाइए क्योंकि लोग यहां तक कहते फिर रहे हैं कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है, और उसके लिए तैयार हो रहे हैं, और सामान खरीद रहे हैं।
वह बूढ़ी महिला जवाब देती है- मेरे कई सारे बच्चे हैं, सुनो, बेहतर है कि तुम मुझे चार पाउंड दे दो।
वह चार पाउंड गोश्त लेकर चली जाती है, और कहानी को लंबा न खींचने के लिहाज से बता देना चाहूंगा कि कसाई का सारा गोश्त अगले आधे घंटे में खत्म हो जाता है, वह एक दूसरी गाय काटता है, उसे भी पूरा का पूरा बेच देता है और अफवाह फैलती चली जाती है। एक वक्त ऐसा जाता है जब उस गांव की समूची दुनिया, कुछ होने का इंतजार करने लगती है। लोगों की हरकतों को जैसे लकवा मार गया होता है कि अकस्मात, दोपहर बाद के दो बजे, हमेशा की ही तरह गर्मी शुरू हो जाती है। कोई बोलता है- किसी ने गौर किया कि कैसी गर्मी है आज?
लेकिन इस गांव में तो हमेशा से गर्मी पड़ती रही है। इतनी गर्मी, जिसमें गांव के ढोलकिये बाजों को टार से छाप कर रखते थे और उन्हें छांव में बजाते थे क्योंकि धूप में बजाने पर वे टपक कर बरबाद हो जाते।
जो भी हो, कोई बोलता है, इस घड़ी इतनी गर्मी पहले कभी नहीं हुई थी।लेकिन दोपहर बाद के दो बजे ऐसा ही वक्त है जब गर्मी सबसे अधिक हो।हां, लेकिन इतनी गर्मी भी नहीं जितनी कि अभी है।वीरान से गांव पर, शांत खुले चौपाल में, अचानक एक छोटी चिड़िया उतरती है और आवाज उठती है- चौपाल में एक चिड़िया है।और भय से काँपता समूचा गाँव चिड़िया को देखने आ जाती है।लेकिन सज्जनों, चिड़ियों का उतरना तो हमेशा से ही होता रहा है।हां, लेकिन इस वक्त पर कभी नहीं।
गांव वासियों के बीच एक ऐसे तनाव का क्षण आ जाता है कि हर कोई वहां से चले जाने को बेसब्र हो उठता है, लेकिन ऐसा करने का साहस नहीं जुटा पाता।मुझमें है इतनी हिम्मत, कोई चिल्लाता है, मैं तो निकलता हूं।
अपने असबाब, बच्चों और जानवरों को गाड़ी में समेटता है और उस गली के बीच से गुजरने लगता है जहां से लोग यह सब देख रहे होते हैं। इस बीच लोग कहने लगते हैं- अगर यह इतनी हिम्मत दिखा सकता है, तो फिर हम लोग भी चल निकलते हैं।और लोग सच में धीरे धीरे गांव को खाली करने लगते हैं। अपने साथ सामान, जानवर सब कुछ ले जाते हुए।
जा रहे आखिरी लोगों में से एक, बोलता है- ऐसा न हो कि इस अभिशाप का असर हमारे घर में रह सह गई चीजों पर आ पड़े .और आग लगा देता है .फिर दूसरे भी अपने अपने घरों में आग लगा देते हैं।
एक भयंकर अफरा तफरी के साथ लोग भागते हैं, जैसे कि किसी युद्ध के लिए प्रस्थान हो रहा हो। उन सब के बीच से हौले से पूर्वाभास कर लेने वाली वह महिला भी गुजरती है- मैंने बताया था कि कुछ बहुत बुरा होने जा रहा है, और लोगों ने कहा था कि मैं पागल हूं।
(इस कथा का स्पेनिश मूल से हिन्दी अनुवाद श्रीकांत का है। बाईस वर्ष के इस नौजवान ने एक डिप्लोमा कोर्स और अकूत मेहनत के सहारे स्पेनिश भाषा पर जो पकड़ हासिल की है, काबिले तारीफ है।)
Saturday, January 30, 2010

बरगद
ऋत्विक घटक
बांग्ला से अनुवाद : सुशील कान्ति
गाँव के सीवान का वह बरगद का पेड़ बहती नदी में अपना सिर झुकाए खड़ा था।
पेड़ों में वह पेड़, कुछ खास तो नहीं था।
बहुत पुराना पेड़ था, जड़ों में कीड़े लग गये थे, डालियाँ सडऩे लगी थीं। मगर किसी ज़माने में यह पेड़ ताज़ादम हुआ करता था, पर आज नहीं। यह पेड़ लोगों के किसी काम नहीं आता, मगर गाँव में आनेवाले लोग इस पेड़ को भलीभाँति पहचानते थे। वे जानते थे कि इसके बाद वाले मोड़ पर ही हारु लोहार की दुकान है और उसके बाद ही उसका गाँव शुरू हो जाता है।
साल में केवल एकबार इस पेड़ की किस्मत फिरती थी। चड़क (बंगाल का एक पारम्परिक त्यौहार)के वक्त। उस पेड़ की जड़ों में न जाने कौन आकर, तेल-सिन्दूर लगाकर चमका जाता, दूर-दराज गाँवों के लोग आ जुटते। गाँव के मैदान में मेला-सा लग जाता और वह पेड़ लोगों की नज़रों में नुमाया हो जाता। इसके बाद फिर पूरे साल वह पेड़ नदी में झुका रहता। उसके आसपास की परती पड़ी ज़मीन पर गायें चरा करतीं, वहाँ से गुज़रते पथिक उसकी शीतल छाया में बैठकर पोटली खोलते, चिउड़ा-गुड़ खाते और नदी का पानी पीकर आगे अपनी यात्रा शुरू करते। चाँदनी रातों में वह पेड़ मैदान के किनारे खड़े-खड़े अपने आगोश में अँधेरे उजाले का अद्भुत संसार रचता और कुछ ज़्यादा ही झुककर उस चंचला नदी में, न जाने कैसा एक रहस्यभरा स्वप्न देखता।
छह-छह ऋतुएँ उस पेड़ के ऊपर से गुज़र जातीं। नदी से नावों का गुज़रना जारी रहता, नावों पर सवार बच्चे अजब कुतूहल से उस पेड़ को निहारते।
छोटे-छोटे बच्चों की भी अड्डा-स्थली थी इसी पेड़ की तलहटी। पेड़ की टेढ़ी-मेढ़ी डालों पर चढ़कर बच्चे खेलते रहते। डालों से नदी में कूदते, स्कूल से भागकर यहीं जुड़ाते।
गाँव के बड़े बुज़ुर्ग अपने बचपन के दिनों से ही इस पेड़ के नीचे आकर सुस्ताया करते थे। गरमी की ढलती शाम में कोई कोई तो नदी के बिलकुल किनारे, जहाँ पेड़ की जड़ें आपस में गुत्थम-गुत्था होतीं, उस पर बैठकर नदी की कल-कल सुना करते।
वहाँ रहने वाले मछुआरों को मालूम था कि पेड़ की जड़ों में छोटी-बड़ी मछलियाँ फँसी होती हैं। उनके बच्चे स्नान करने आते तो गमछे से छानकर मछली पकड़ते। जाल में भी का$फी मछलियाँ फँसती।
बूढ़े भी इन्हें पहचानते थे। वे भी जड़ों से अपनी पीठ टिकाये इनके खेल देखते, मछुआरों का मछली पकडऩा देखते और मस्ती में अपना सिर हिलाते। शायद अपने जीवन के गाढ़े वक्तों को याद करते।
मगर वे खुद भी नहीं जानते थे कि उनके मन में इस बूढ़े बरगद का क्या स्थान है। वे तो केवल इसे बूढ़े शिव का बरगद कहते। यह हमेशा से यहीं था और रहेगा। इसका अस्तित्व बस इतना कि लोग कहते, ''हारु काका के मोड़ पार करते ही बूढ़े शिव का बरगद है।''
सम्भव था— यह पेड़ कई पीढिय़ों तक यहीं खड़ा रहता और आने वाले यात्रियों के लिए विश्राम स्थल बना रहता मगर अचानक ही एक दिन नया सरकारी फरमान आ पहुँचा। मौजूदा सिंचाई व्यवस्था को बेहतर करने के लिए नदी का पाट चौड़ा करना पड़ेगा। बस, का$फी शोरगुल के बीच अपनी मौन आपत्ति प्रकट करते हुए बूढ़े शिव का बरगद एक दिन धराशायी हो गया। नदी के दोनों किनारों को समान रूप से काटकर नये ढंग की नहर तैयार की गयी।
समूचा गाँव जैसे जाग उठा था। लोगों को उस बरगद के पेड़ का मतलब समझ में आ गया। सबके मन में विरोध का स्वर उमडऩे-घुमडऩे लगा। उन लोगों ने सस्वर आपत्ति भी प्रकट की।
मगर उनका विरोधी स्वर भिनभिनाहट बनकर रह गया। पेड़ को आखिर धराशायी होना ही था...। धीरे-धीरे उस बरगद की याद गाँव वालों के मन से भी विलुप्त होने लगी। नये चेहरे, नये मकान, सब कुछ नया-नया था। बस गाँव के बूढ़े जब वहाँ से गुज़रते तो नदी का किनारा उन्हें बेहद वीरान-सा लगता। इसकी व्याख्या वे लोग अपने हाथ-पाँव हिला-हिलाकर नयी पीढिय़ों से करते। ये उनकी चर्चा का नया विषय बन गया था।
पर, आखिर कितने दिन!
इतने दिनों तक वह बरगद लोगों को विश्राम का सुख देते देते आज सबके मन-मस्तिष्क से बेआवाज अन्तर्धान हो चुका है।
sushil kanti
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