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Thursday, July 29, 2010

बंगला कविता

एक ज़माने पहले जब स्नातकोत्तर का विद्यार्थी हुआ करता था, कुछ दोस्तों ने मिलकर कविता की एक पत्रिका निकाली थी- 'कविताई' के नाम से। सीमित संसाधनों में सिर्फ चार अंक तक ही यह पत्रिका निकली। लेकिन इन चार अंकों में हिंदी के लगभग सभी जाने माने कवियों की कविताएँ उसमें शामिल हुईं। त्रिलोचन शास्त्री, कुंवर नारायण, विनोदकुमार शुक्ल, अनामिका, अरुण कमल, प्रयाग शुक्ल, मंगलेश डबराल से लगाकर पवन करण, प्रेम रंजन अनिमेष, आर चेतनक्रांति आदि न जाने कितने कवि। याद पड़ता है, इस पत्रिका में अनूदित कविताओं के लिए 'अंतर' नाम से एक कॉलम हुआ करता था, जिसमें पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, बंगलादेश के कुछ कवियों की कविताओं का अनुवाद भी प्रकाशित हुए थे। शुरूआती तीन अंकों का सम्पादन मैंने ही किया था, अंतिम अंक (तब किसे पता था कि यह अंतिम अंक होगा) के वक़्त मैं साहित्य मासिक 'वागर्थ' से जुड़ गया था, तो इसका सम्पादन युवा कवयित्री विजया सिंह ने किया।
आज जब अपने कुछ पुराने दस्तावेजों को उलट पुलट रहा था तो 'कविताई' का चौथा अंक मिला। पृष्ठ २४ पर बंगला के बुद्धदेब दासगुप्ता की दो कविताएँ देखीं। मेरी एक दोस्त हुआ करती थी- नबारूणा भट्टाचार्य। उसी ने इन कविताओं का सुन्दर अनुवाद किया है। इससे पहले भी आप बुद्धदेब की कविताएँ पढ़ चुके हैं। आइए एक बार फिर से उन्हें पढ़ते हैं। - कुणाल सिंह

बुद्धदेब दासगुप्ता
अनुवाद : नबारुणा भट्टाचार्य

एकान्य महाकाश
बोसपुकुर, पति के घर से मुर्दाघर
जब तुम्हें ले जाया गया
बेला, तुम्हारी उम्र तब सत्ताईस से
घटते घटते पहुंची है सत्रह में
शांत पृथ्वी अद्भुत सुन्दर बन
खिल गयी है तुम्हारी देह में।
गोद में लिए हुए तुम्हारी बेटी को
हरिपद के मन से लोभ अभी गया नहीं।
सोच रहा है
मुंह पर तकिया दबाकर तुम्हें मार डालने से पेश्तर
क्यों नहीं भोग लिया तुम्हारी देह को आखिरी बार!
अस्सी साल का बाप हरिपद का-
निमाई मल्लिक भी सोचता है यही
पुत्रवधू बेला का तजा शरीर।

जानता है हरिपद
कुछ नहीं होगा उसे, वह
चलाता है गाड़ी मंत्रीजी कि
मंत्रीजी के लिए औरत से लेकर माल तक का
वही करता है इन्तेजाम
जुलूस में काकद्वीप से लोगों के जुगाड़ का
वोटों की फुहार का
नोटों के अम्बार का- सभी सभी।

हरिपद के बिना कुछ नहीं सधता, यहाँ तक कि
कुसुम भी नहीं हिलती एक पग
कुसुम से ब्याह रचा लेना अब उसकी मुट्ठी में है
लेकिन केवल चार दिन पहले आई है कुसुम की छोटी बहन
अपनी दीदी के पास, नहीं देखा था हरिपद ने
उसे पहले कभी।
वह हंसी थी उस दिन
नज़रें बचाकर सबसे
और तभी से सोचने लगा है वह सब नए सिरे से।

क्या करे हरिपद
हरिपद क्या करे
यदि कुसुम भी बेला की तरह
'वैनिश...?'
गुनगुनाते हैं मंत्रीजी, हरिपद गुनगुना रहा है
चल रही है गाड़ी तूफ़ान मेल की तरह
रिक्त करते हुए गाँव का कण कण
सब उठाते चलते हैं तारे
दौड़ रहे हैं सब पीछे पीछे गाडी के
और गुनगुना रहे हैं सब
पीछे पीछे, पीछे पीछे।
पृथ्वी से छिटक कर निकल रही है पृथ्वी
किसी एक अन्य महाकाश में
धीरे धीरे, धीरे धीरे।

रात
नींद में लथपथ निखिल। उड़ चली निखिल की पत्नी खिड़की खोलकर
तारों के पास। तारों ने अचंभित होकर जानना चाहा- नाम क्या है?
निखिल की पत्नी बोली- तारा।
सुबह हुई। निखिल दौड़ा बाज़ार। दौड़ा दफ्तर। ट्यूशन। नाटक
के रिहर्सल और देर बाद खाना खाकर पड़ रहा बिस्तर पर।
आधी रात, हडबडाकर उसकी नींद टूटी। देखा, उसका सारा मुंह-गाल
भीग रहा है जल में। वक्ष पर न जाने कब उडती हुई तारा
आकर सो गयी थी।
तारा की देह का नीर, निर्झर बन निखिल पर बरस रहा है
अविराम।