
मंजुलिका पाण्डेय
'भाषासेतु' के हमारे दोस्तों को याद होगा, अभी हाल ही में हमने युवा कवयित्री-कथाकार मंजुलिका पाण्डेय की दो कविताएँ प्रकाशित की थीं। इस बीच 'नया ज्ञानोदय' के युवा पीढ़ी विशेषांक में मंजुलिका की एक कहानी 'उस दिन' प्रकाशित हो चुकी है। एक बार फिर मंजुलिका की दो कविताएँ यहाँ दी जा रही हैं। प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं।
कही अनसुनी
एक दूसरे के कन्धों पर झुके
हम तुम हैं बिलकुल पास पास
(लगता सचमुच ऐसा ही है देखकर)
एक दूसरे के कानों में बोलते हुए
बिलकुल एक जैसे लगते शब्द
मैं सोचता हूँ...
तुम थाम रहे हो मेरे शब्द
और कर रहे हो अर्थों की बुनाई
तुम्हें लगता है मैं पी रहा हूँ तुम्हारे शब्द
और भर रहा हूँ उसके भावों से
पर...
एक सी आवाज़ एक सी ध्वनि, एक से अक्षरों वाले
शब्दों की भाषा ऐसी
कि मेरे लिए तुम्हारे शब्द
सिर्फ एक आकारहीन चित्र
तुम्हारे लिए मेरे शब्द
सिर्फ एक शोर।
नयी फसल
हवा में टंगे हुए धड
उड़ रहे हैं
फर्लांग रहे हैं सीमायें
जूझ रहे हैं खूब
हवा की गति को पछाड़ने के लिए
धकिया रहे हैं एक दूसरे को
चाँद पे ज़मीन हथियाने के लिए
और धरती पर हो रही है खेती
उखडे हुए टांगों की।