
भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष कामरेड ज्योति बसु का जाना एक किंवदंती का मिट जाना है। पिछले दो दिनों से हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों में पोलिटिकल स्पेक्ट्रम की ओर से ज्योति बसु को जितनी श्रद्धांजलियां दी जा रही हैं, ज़ाहिर है कि उनका क़द क्या था! आप अगर उनकी विचारधाराओं से इत्तेफाक न भी रखते हों, तो भी उनके जाने से उपजे शून्य का एहसास आपको ज़रूर होगा।
कामरेड बसु की अनुपस्थिति को महसूस करने का अपना एक राजनीतिक अर्थ है। भारतीय राजनीति पिछले कुछ दशकों से जिस स्खलन का शिकार हुई है, और ऐसे समय में वे अपने जिन गुणों के लिए जाने जाते थे, उनके जाने का क्या ये अर्थ है कि भारतीय राजनीति से उन गुणों की भी विदाई हो चुकी। याद करें, एक बार उन्होंने कहा था- 'आई एम नाट अ जेंटलमैन, आई एम अ कम्युनिस्ट।' आज कितने लोग हैं जो अपने वजूद से अपनी विचारधारा को चस्पां कर सकें। जहाँ तक उनके व्यक्तित्व का सवाल है, उनके जैसे जेंटलमैन भी भारतीय राजनीति में कम हुए।
एक तरफ तो ये, दूसरी तरफ उनके बारे में कई ऎसी चीजें भी मशहूर हैं जो एक राजनीतिज्ञ के लिए अवांछित हैं। पिछले तीस सालों में बंगाल की राजनीति का जिस तरह से अपराधीकरण हुआ, उसकी शुरुआत ज्योति बाबू के कार्यकाल में ही हुई। कई मिल-कारखाने बंद हुए, और कलकत्ते की उपमा एक 'सिंकिंग शिप' से दी जाने लगी। सरकारी महकमे में कार्य क्षमता में लगातार गिरावट और ट्रेड यूनियन की ज्यादतियों के लिए भी ज्योति बाबू का कार्यकाल ही दोषी है।
फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि विपक्षी एकता को संचालित-संयमित करने में जो भूमिका साठ के दशक में लोहिया और सत्तर के दशक में जे पी ने निभायी थी, वही भूमिका १९७७ से २००३ तक ज्योति बाबू की रही।
ज्योति बाबू का जाना निश्चित रूप से भारतीय राजनीति की एक अपूर्णीय क्षति है।