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Monday, November 15, 2010

बनारस : होर्खे लुइस बोर्खेस की कविता!



दर्शन के लिये दृश्य की भौतिक मौजूदगी कतई अनिवार्य नहीं. बल्कि कल्पना के सहारे भी उसका विधान किया जा सकता है. और द्रष्टा जब ‘समय और भूगोल’ से परे के समय और भूगोल को देख सकने की सलाहियत रखता हो, तो यथार्थ के दृश्य और कल्पना के दृश्य के बीच भेद की गुंजाइश ऐसे ही न्यूनतम हो जाती है. बनारस शहर पर, लिखने वालों ने यूँ तो बहुत कुछ लिखा है, वहाँ रहकर और वहाँ से जाकर भी, लेकिन बोर्खेस ने यह कविता उस बनारस पर लिखी है, जिसे उन्होंने अपनी आँखों से कभी नही देखा...

बनारस

कोई भ्रम, कोई तिलिस्म
जैसे आईने में उगता किसी उपवन का बिंब,
इन आँखों से अदेखा
एक शहर, शहर मेरे ख्वाबों का,
जो बटता है फासलों को
रेशों से बटी रस्सी की मानिंद
और करता रहता है परिक्रमा
अपने ही दुर्गम भवनों की.

मंदिरों, कूडे के पहाडों, चौक और कारागारों तक से
अंधेरे को खाक करती
चटकार धूप
चढ आती है दीवारों के ऊपर तक
और चमकती रहती है
पावन नदी के छ्ल छल पानी में.

गहरी उसाँसें भरता शहर,
जो बिखेर देता है समूचे क्षितिज पर
सितारों का घना झुंड,
नींद और चहलकदमी से सनी
एक उनींदी सुबह में
रोशनी उसकी गलियों को
खोलती है
मानो खोलती हो अपनी बाहें.

ठीक तभी उठता है सूर्य,
पूर्व में देखती चीजों के कपाट पर
डालता है अपने उजाले की दृष्टि.
मस्जिदों के शिखर से उठती अजान
हवा को गंभीर बनाती
करने लगती है जय-जयकार
एकांत के देवता की
अन्यान्य देवों के उस नगर में।

(और जबकि मैं खेल रहा हूँ
उसके अस्तित्व की ख़ालिश कल्पनाओं से,
वह शहर अब भी आबाद है
दुनिया के तयशुदा कोने में,
अपने निश्चित भूगोल के साथ
जिसमें मेरे सपनों की तरह भरे लोग हैं,
और हैं अस्पताल, बैरक और पीपल के छाँव वाली
सुस्त गलियाँ
और पोपले होंठों वाले लोग भी
जिनके दाँत हमेशा कठुआए रहते हैं)।


प्रस्तुति तथा (मूल स्पैनिश से) अनुवाद : श्रीकांत दुबे