Tuesday, February 15, 2011

धोबी घाट का एक सबटेक्सचुअल पाठ


युवा कथाकार-आलोचक राहुल सिंह वैसे तो पेशे से प्राध्यापक हैं, लेकिन प्राध्यापकीय मिथ को झुठलाते हुए पढते-लिखते भी हैं। खासकर समसामयिकता राहुल के यहां जरूरी खाद की तरह इस्तेमाल में लायी जाती है। चाहे उनकी कहानियां हों या आलोचना, आप उनकी रचनाशीलता में अपने आसपास की अनुगूंजें साफ सुन सकते हैं। अभी हाल ही में प्रदर्शित ‘धोबीघाट’ पर राहुल ने यह जो आलेख लिखा है, अपने आपमें यह काफी है इस स्थापना के सत्यापन के लिए। आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है, क्या यह अलग से कहना होगा!

धोबी घाट का एक सबटेक्सचुअल पाठ
राहुल सिंह

अरसा बाद किसी फिल्म को देखकर एक उम्दा रचना पढ़ने सरीखा अहसास हुआ। किरण राव के बारे में ज्यादा नहीं जानता लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद उनके फिल्म के अवबोध (परसेप्शन) और साहित्यिक संजीदगी (लिटररी सेन्स) का कायल हो गया। मुझे यह एक ‘सबटेक्स्चुअल’ फिल्म लगी जहाँ उसके ‘सबटेक्सट’ को उसके ‘टेक्सट्स’ से कमतर करके देखना एक भारी भूल साबित हो सकती है। मसलन फिल्म का शीर्षक ‘धोबी घाट’ की तुलना में उसका सबटाईटल ‘मुम्बई डायरीज’ ज्यादा मानीखेज है। सनद रहे, डायरी नहीं डायरीज। डायरीज में जो बहुवचनात्मकता (प्लूरालिटी) है वह अपने लिए एक लोकतांत्रिक छूट भी हासिल कर लेता है। किसी एक के अनुभव से नहीं बल्कि ‘कई निगाहों से बनी एक तस्वीर’। फिल्म के कैनवास को पूरा करने में हाशिये पर पड़ी चीजें भी उतना ही अहम रोल अदा करती हैं जितने के वे किरदार जो केन्द्र में हैं। यों तो सतह पर हमें चार ही पात्र नजर आते हैं लेकिन असल में हैं ज्यादा-टैक्सी ड्राइवर, खामोश पड़ोसन, लता बाई, प्रापर्टी ब्रोकर, सलीम, लिफ्ट गार्ड और सलमान खान (चौंकिये मत, सलमान खान की भी दमदार उपस्थिति इस फिल्म में है।) सब मिलकर वह सिम्फनी रचते हैं जिससे मुम्बई का और हमारे समय का भी एक अक्स उभरता है।

जैसे की फिल्म की ओपनिंग सीन जहाँ यास्मीन नूर (कीर्ति मल्होत्रा) टैक्सी में बैठी मरीन ड्राइव से गुजर रही है। टैक्सी के सामने लगी ग्लास पर गिरती बारिश को हटाते वाइपर, चलती टैक्सी और बाहर पीछे छूटते मरीन ड्राइव के किनारे और इनकी मिली-जुली आवाजों के बीच टैक्सी ड्राइवर का यह पूछना कि ‘नयी आयी हैं मुम्बई में ?’ ड्राइवर कैसे ऐसा पूछने का साहस कर सका ? क्योंकि उसकी सवारी (यास्मीन) के हाथ में एक हैंडी कैम है जिससे वह मुम्बई को सहेज रही है। जिससे वह अनुमान लगाता है कि शायद यह मुम्बई में नयी आई है (आगे मुम्बई लोकल में शूट करते हुए भी उसे दो महिलायें टोकती हैं ‘मुम्बई में नयी आयी हो ?’)। फिर उनकी आपसी बात-चीत के क्रम में ही यह मालूम होता है कि वह मलीहाबाद (उत्तर प्रदेश) की रहनेवाली है और ड्राइवर जौनपुर (उत्तर प्रदेश) का। उसी शुरूआती दृश्य में टैक्सी के अंदर डैश बोर्ड में बने बाक्स पर लगे एक स्टिकर पर भी हैंडी कैम पल भर को ठिठकता है जिसमें एक औरत इंतजार कर रही है और उसकी पृष्ठभूमि में एक कार सड़क पर दौड़ रही है, और स्टिकर के नीचे लिखा हैः ‘घर कब आओगे ?’ यह उस ड्राइवर की कहानी बयां करने के लिए काफी है कि वह अपने बीवी-बच्चों को छोड़कर कमाने के लिए मुम्बई आया है। इसके बाद भींगती बारिश में भागती कार से झांकती आँखें मुम्बई की मरीन ड्राइव को देखते हुए जो बयां करती है वह खासा काव्यात्मक है। “... समन्दर की हवा कितनी अलग है, लगता है इसमें लोंगों के अरमानों की महक मिली हुई है।” इस ओपनिंग सीन के बाद कायदे से फिल्म शुरु होती है चार शाट्स हैं पहला किसी निर्माणाधीन इमारत की छत पर भोर में जागते मजदूर का दूसरा उसके समानान्तर भोर की नीन्द में डूबी मुम्बई का तीसरा संभवतः उसी इमारत में निर्माण कार्य में लगे मजदूरों के सीढ़ियों में चढ़ने-उतरने का और चौथा दोपहर में खुले आसमान के नीचे बीड़ी के कश लगाते सुस्ताते मजदूर का। फिल्म के यह शुरुआती चार शाट्स फिल्म के एक दम आखिरी में आये चार शाट्स के साथ जुड़ते हैं। उन आखिरी चार शाट्स में पहला, दोपहर की भीड़ वाली मुम्बई है। दूसरा, शाम को धीरे-धीरे रेंगती मुम्बई और ऊपर बादलों की झांकती टुकड़ियाँ हैं। तीसरा, रात को लैम्प पोस्ट की रोशनी में गुजरनेवाली गाड़ियों का कारवां है और चौथा, देर रात में या भोर के ठीक पहले नींद में अलसाये मुम्बई का शाट्स है। इस तरह फिल्म ठीक उसी शाट्स पर खत्म होती है जहाँ फिल्म कायदे से शुरु हुई थी। एक चक्र पूरा होता है। लेकिन यह शाट्स भी मुम्बई के दो चेहरों को सामने रखता है। ‘अ टेल आव टू सिटीज’। जब एक (सर्वहारा) जाग रहा होता है तो दूसरा (अभिजन) गहरी नींद में होता है और पहला जब सोने की तैयारी कर रहा होता है तो दूसरा के लिए दिन शुरू हो रहा होता है (सलीम जब सोने की तैयारी कर रहा होता है, ठीक उसी वक्त अरूण के चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन हो रहा होता है)।

मुन्ना (प्रतीक बब्बर) यों तो पहली दुनिया का नागरिक है लेकिन उसके मन में उसी दूसरी दुनिया का नागरिक होने की चाह है, इस कारण वह अपनी नींद बेचकर सपना पूरा करने में लगा है। अरुण (आमिर खान) दूसरी दुनिया का नागरिक है और शॉय (मोनिका डोगरा) एक तीसरी दुनिया की, जो लगातार यह भ्रम पैदा करती है कि वह दूसरी दुनिया की नागरिक है। मतलब यह कि शॉय इनवेस्टमेंट बैंकिंग कन्सल्टेन्ट है दक्षिण एशियाई देशों में निवेश के रूझानों पर विशेषकर लघु और छोटी पूंजी पर आधारित पारंपरिक व्यवसायों की फील्ड सर्वे करके रिपोर्ट तैयार करने के लिए भेजी गई है। फिल्म के अंत की ओर बढ़ते हुए अचानक सिनेमा के पर्दे पर उभरने वाले उन पन्द्रह तस्वीरों की लड़ियों को याद कीजिए जिसमें डेली मार्केट जैसी जगह के स्टिल्स हैं, उन तस्वीरों में कौन लोग हैं इत्र बेचनेवाला, पौधे बेचनेवाला, जूते गाठनेवाला, मसक में पानी ढोनेवाला, रेलवे प्लेटफार्म पर चना-मूंगफली बेचनेवाला, गजरे का फूल बेचनेवाली, घरों में सजा सकनेवालों फूलों को बेचनेवाली, कान का मैल निकालनेवाला, चाकू तेज करनेवाला, मजदूर, पान बेचनेवाली, ताला की चाभी बनानेवाला, रेहड़ी और ठेला पर सामान खींचनेवाला, मछली बेचनेवाली आदि। इस काम के लिए उसे अनुदान मिला है और अनुदान देनेवाली संस्था का मुख्यालय न्यूयार्क (अमेरिका) में है। मैक्डाॅनाल्ड के लगातार खुलते आउटलेट, अलग-अलग ब्राण्ड के उत्पादों का भारत का रुख करने और हर पर्व-त्योहार में भारतीय बाजार में चीन की आतंककारी उपस्थिति को देखते हुए, वायभ्रेन्ट गुजरात की अभूतपूर्व सफलता के मूल मे अनिवासी भारतीयों की भूमिका, भारतीय सरकार द्वारा उनको दी जाने वाली दोहरी नागरिकता, भारतीय इलेक्ट्रानिक और प्रिन्ट मीडिया द्वारा उनके विश्व के ताकतवर लोगों में शुमार किये जाने की खबरों को तरजीह दिये जाने वाले परिवेश में शॉय एक कैरेक्टर मात्र न रह कर मेटाफर बन जाती है। मुन्ना को अगर प्रोलेतेरियत और अरुण को बुर्जुआ मान लें (जिसके पर्याप्त कारण मौजूद हैं) तो शॉय फिनांस कैपिटल की तरह बिहेव करती नजर आती है। खास कर तब जब वह अरुण से लगातार यह बात छिपा रही होती है कि वह मुन्ना को जानती है। मुन्ना और अरुण दोनों तक, जब चाहे पहुँच सकने की छूट शॉय को ही है। शॉय का कला प्रेम लगभग वैसा ही है जैसा सैमसंग का साहित्य प्रेम गत वर्ष हम देख चुके हैं। सभ्यता के विकास का इतिहास पूंजी के विकास का भी इतिहास है। और ज्यों-ज्यों सभ्यता का विकास होता गया त्यों-त्यों मानवीय गुणों में हृास भी देखा गया। इस लिहाज से भी विकास के सबसे निचले पायदान पर खड़ा मुन्ना, अरुण और शॉय की तुलना में ज्यादा मानवीय लगता है। आखिरी दृश्य में जब वह सड़कों पर बेतहाशा दौड़ता हुआ शॉय को अरुण का पता थमाता है, तब वह खुद इस बात की तस्दीक कर रहा होता है कि कुछ देर पहले वह झूठ बोल रहा था। शॉय भी कई जगहों पर झूठ बोलती है, बहाने बनाती है लेकिन न तो पकड़ में आती है और न ही अपराध बोध से ग्रसित नजर आती है।

साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक आक्रमण की प्रक्रिया को ‘धोबी घाट’ बेहद बारीकी से उभारती है। और यह महीनी सिर्फ इसी प्रसंग तक सिमट कर नहीं रह गई है। एक चित्रकार के तौर पर अरुण का अपने कला के सम्बन्ध में व्यक्त उद्गार ध्यान देने लायक है। “मेरी कला समर्पित है, राजस्थान, यूपी, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश और अन्य जगहों के उन लोगों का जिन्होंने इस शहर को इस उम्मीद से बनाया था कि एक दिन उन्हंे इस शहर में उनकी आधिकारिक जगह (राइटफुल प्लेस) मिल जायेगी। मेरी कला समर्पित है उस बाम्बे को।” अरुण यहाँ मुम्बई नहीं कहता है बाम्बे कहता है। अगर पूरे संदर्भ में आप बाम्बे संबोधन को देखें तो आप किरण की सिनेमाई चेतना की तारीफ किये बिना नहीं रह सकेंगे। हाल के दिनों में शायद ही किसी फिल्मकार ने शिव सेना की राजनीति का ऐसा मुखर प्रतिरोध करने की हिम्मत और हिमाकत दिखलायी है। प्रतिरोध की ऐसी बारीकी हाल के दिनों में एक आस्ट्रेलियाई निर्देशक Michael Haneke की फिल्म Cache i.e. Hidden (2005) में देखी थी।

मुन्ना, अरुण और शॉय की तुलना में यास्मीन नूर सहजता से किसी खांचे में नहीं आती। कहीं यह मुन्ना के करीब लगती है तो कहीं अरुण और शॉय के। मुन्ना और यास्मीन इस मामले में समान है कि दोनों अल्पसंख्यक वर्ग से तालुक रखते हैं, दोनां हिन्दी भाषी प्रदेश क्रमशः मलीहाबाद (उत्तर प्रदेश) और दरभंगा (बिहार) से हैं, दोनों रोजगार के सिलसिले में मुम्बई आते हैं (यास्मीन निकाह कर के अपने शौहर के साथ मुम्बई आई है। निम्न वर्ग या निम्न वित्तीय अवस्था वाले परिवारांे में लड़कियों के लिए विवाह भी एक कैरियर ही है।) इसके अलावा मुन्ना और शॉय के साथ मुम्बई में एक आउटसाइडर की हैसियत से साथ खड़ी नजर आती है। उसकी संवेदनशीलता उसे अरुण के साथ जोड़ती है। इन सबको जो चीज आपस में जोड़ती है, वह है मुम्बई, जिसकी बारिश और समन्दर ये आपस में साझा करते हैं। आप पायेंगे कि इन सबके जीवन में समन्दर और बारिश के संस्मरण मौजूद हैं। यह उनके एक साझे परिवेश से व्यक्तिगत जुड़ाव को दर्शाता है। यास्मीन के नक्शे कदम पर अरुण समन्दर के पास जाता है। मुन्ना और शॉय साथ-साथ समन्दर के किनारे वक्त बिताते हैं। लेकिन यास्मीन, बारिश और समन्दर जब भी पर्दे पर आते हैं फिल्म में हम कविता को आकार ग्रहण करते देखने लगते हैं। जैसे-“यहाँ की बारिश बिल्कुल अलग है, न कभी कम होती है, न कभी रुकने का नाम लेती है, बस गिरती रहती है, शश्श्श्......., रात को इसकी आवाज जैसे लोरी हो, जो हमें घेर लेती है अपने सीने में।” बारिश के समय अरुण अपनी पेंटिग में लीन हो जाता है तो शॉय अरुण के साथ बिताये गये अपने अंतरंगता के क्षणों में लेकिन इन सब की रोमानियत पर मुन्ना का यथार्थ पानी फेर देता है क्योंकि बारिश के वक्त मुन्ना अपनी चूती छत ठीक कर रहा होता है। इन तमाम समानताओं के बावजूद मुझे यास्मीन मुन्ना के ही नजदीक लगी। वह मारी गई अपनी अतिरिक्त संवेदनशीलता के कारण, पूरी फिल्म उसकी इस अतिरिक्त संवेदनशीलता का साक्षी है चाहे वह दाई का प्रसंग हो या किसी सदमे के कारण खामोश हो चुकी पड़ोसन का या फिर बकरीद के अवसर पर उसके उद्गार। एक लगातार संवेदनशून्य होते समय में संवेदनशीलता को कैसे बचाया जा सकता है। जो बचे रह गये उनकी संवेदनशीलता उतनी शुद्ध या निखालिस नहीं थी। शायद इसलिए यास्मीन की मौत मेरे जेहन में एक कविता के असमय अंत का बिम्ब नक्श कर गई। वैसे यहाँ ‘आप्रेस्ड क्लास’ के साथ ‘जेंडर’ वाला आयाम भी आ जुड़ता है। एक समान परिस्थितियों में भी पितृसत्तात्मक समाज किस कदर पुरुष की तुलना में स्त्री विरोधी साबित होता है। यास्मीन का प्रसंग इस लिए भी दिलचस्प है कि खुद आमिर खान ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ने के बाद किरण को अपनी शरीक-ए-हयात बनाया था। फिल्म में इस ऐंगल को शामिल किये जाने मात्र से भी किरण की बोल्डनेस का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस कोण से ही फिल्म का दूसरा सिरा खुलता है जो यास्मीन की उपस्थिति और उसके सांचे में फिट न बैठ सकने की गुत्थी का हल प्रस्तुत करता है। यहीं मुन्ना यास्मीन का विस्तार (एक्सटेंशन) नजर आता है। यास्मीन सिर्फ इस कारण से नहीं मरी कि वह अतिरिक्त संवेदनशील थी वह इसलिए मरी कि उसमें आत्म विश्वास और निर्णय लेने की क्षमता की कमी थी। मुन्ना भी लगभग उन्हीं स्थितियों में पहुँच जाता है जिन परिस्थितियों में यास्मीन ने आत्महत्या की है, (सलीम की हत्या हो चुकी है, शॉय को उसके चूहा मारने के धंधे बारे में मालूम हो गया है, जिस इलाके में वह काम करता था वहाँ से उठा कर जोगेश्वरी के एक अपार्टमेंट में फेंक दिया गया है।)। शुरु में मुन्ना भी उन परिस्थितियों से मुँह चुराकर भागता है। लेकिन फिर सामना करता है। यह जान कर की शॉय अरुण को ढूँढ रही है वह खुद उसको अरुण का पता देता है। आप पायेंगे कि लगभग पिछले मौकों पर मुन्ना आत्म विश्वास और निर्णय लेने की क्षमता का परिचय देता रहा है। जैसे वह शॉय के कपड़े पर नील पड़ जाने के कारण उसके नाराजगी को ज्यादा फैलने का मौका दिये बगैर कहता है “मैडम गलती हो गई दीजिए मैं ठीक करके देता हूँ।” जब शॉय मुफ्त में उसका पोर्टफोलियो अपने ढंग से बाहर नेचुरल तरीके से शूट करना चाहती है तो वह कहता है कि “भाई हमें नहीं चाहिए फ्रेश-व्रेश, आप स्टूडियो में शूट किजीये ना, खर्चा मैं भरता हूँ।” फिर भी ना-नुकुर की स्थिति बनता देख वह सीधा कहता है कि ‘आपको माॅडल्स फोटो लेने हैं कि नहीं! धंधा, मोहब्बत को गंवा कर भी फिल्म के अंत में ‘द लास्ट स्माइल’ की स्थिति में मुन्ना ही है, जो उम्मीद बंधाती है।

इसके अलावे पूरी फिल्म के बुनावट में जो बारीकी है वह स्क्रिप्ट और स्क्रीन प्ले में की गई मेहनत को दर्शाती है। जैसे फिल्म के शुरुआती दृश्य में जब यास्मीन खुद के मलीहाबाद की बताती है तो उसकी अहमियत आधी फिल्म खत्म होने के बाद मालूम होती है जब वह इमरान को संबोधित करते हुए अपनी दूसरी चिट्ठी मे यह कहती है कि ‘वहाँ तो आम आ गये होंगे ना, यहाँ के आमों में वह स्वाद कहाँ ?’ मुन्ना की खोली में उसके इर्द-गिर्द रहनेवाली बिल्ली की नोटिस हम तब तक नहीं लेते हैं जब तक मुन्ना अपनी खोली नहीं बदलता। दूसरी बार जब मुन्ना शॉय की नील लगी शर्ट को ठीक करके वापस करने के लिए शॉय के फ्लैट पर जाता है तो शॉय मुन्ना को चाय के लिए भीतर बुलाती है उस वक्त दरवाजे के किनारे खड़ी एग्नेस (नौकरानी) फ्रेम में आती है। उसके फ्रेम में आने का मतलब ठीक अगले ही सीन मे समझ आ जाता है, जब एग्नैस चाय लेकर आती है, एक कप में और दूसरी ग्लास में। आप पायेंगे कि बेहद पहले अवसर पर ही मुन्ना को शॉय के द्वारा मिलने वाले अतिरिक्त भाव को भांपने में वह पल भर की देरी नहीं करती और आगे चलकर इस बारे में अपनी राय भी जाहिर करती है। मुन्ना के बिस्तर के पास लगे सलमान खान के पोस्टर की अहमियत का भान हमें फिल्म के आगे बढ़ने के साथ होता चलता है। मुन्ना की कलाइयों में बंधी मोटी चेन, डम्बल से मसल्स बनाते वक्त सामने आइने पर सलमान की फोटो को हम नजरअंदाज कर जाते हैं। लेकिन तीन मौके और है जब हम फिल्म में सलमान खान की उपस्थिति को नजरअंदाज करते हैं। पहला, जब शॉय मुन्ना से दूसरी बार किसी पीवीआर या मल्टीप्लैक्स में संयोगवश मिलती है। दूसरा, जब वह मुन्ना का पोर्टफोलियो शूट कर रही होती है और तीसरा जब वह अरुण के साथ खुद को देख लिये जाने पर उससे विदा लेकर दौड़ती हुई मुन्ना के पास पहुँच कर कहती है कि आज तुम मुझे नागपाड़ा ले जाने वाले थे और फिल्म दिखाने वाले थे। फिल्म में सलमान खान की जबर्दस्त उपस्थिति को हम नजरअंदाज कर जाते हैं। शरु में ही मुन्ना और सलीम केबल पर प्रसारित होने वाली जिस फिल्म को देखकर ठहाके लगाते हैं, वह सलमान खान अभिनीत हैलो ब्रदर है। फिर जब पीवीआर या मल्टीप्लैक्स में फिल्म देखने के क्रम में शॉय मुन्ना से मिलती है वह फिल्म है ‘युवराज’। मुन्ना अपने पोर्टफोलियो शूट के लिए जो पोज दे रहा होता है अगर सलमान खान के बिकने वाले सस्ते पोस्टकार्ड और पोस्टर को आपने देखा हो तो आप समझ सकते हैं कि मुन्ना उससे कितना मुतास्सिर है और जिस फिल्म को दिखाने की बात की थी मुन्ना ने वह फिल्म थी, ‘हैलो’। हैलो ब्रदर ‘युवराज’ और ‘हैलो’ दोनों फिल्में सलमान खान की है। इन कारणों से बाद में खोली बदलते वक्त मुन्ना द्वारा सावधानी से सलमान खान के पोस्टरों को उतारा जाना एक बेहद जरुरी दृश्य लगता है। लेकिन सिर्फ इस कारण से मैं सलमान खान की उपस्थिति को जबर्दस्त नहीं कह रहा हूँ। इन संदर्भों से जुड़े होने के बावजूद वैसा कहने की वजह दूसरी है। वह यह कि किसी भी फिल्म में यथार्थ के दो बुनियादी आयामः काल और स्थान (टाईम एण्ड स्पेस) को सहजता से पहचान जा सकता है। आम तौर पर हिन्दी सिनेमाई इतिहास में इस किस्म के प्रयोग कम ही देखने को मिले हैं जिसमें शहर को ही मुख्य किरदार के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया हो। जाहिर है जब आप शहर को प्रोजेक्ट कर रहे होते हैं तो रियलिटी का स्पेस वाला डाइमेंशन टाईम वाले फैक्टर की तुलना में ज्यादा महŸवपूर्ण हो उठता है। ‘धोबी घाट’ में भी ठीक यही हुआ है। आप मुम्बई को देख रहे हैं लेकिन वह कब की मुम्बई है ? कहें कि आज की तो मैं कहूंगा कि वह अक्टूबर-नवम्बर 2010 के आगे-पीछे की मुम्बई है, इतना स्पेस्फिक कैसे हुआ जा सकता है, इसके संकेत फिल्म में है। ‘धोबी घाट’ उस अंतराल की कहानी कहता है जब सलमान खान की ‘युवराज’ रीलिज हो चुकी थी और ‘हैलो’ चल रही थी और हैलो ब्रदर इतनी पुरानी हो चुकी थी कि उसका प्रसारण केबल पर होने लगा था। सलमान खान मुम्बई के उस स्पेस के टाईम फ्रेम को रिप्रेजेन्ट करता है। बस इससे ज्यादा की जरूरत भी नहीं थी। लेकिन इसके लिए जिस ढ़ंग से सलमान खान का मल्टीपर्पस यूस किया गया है, वह किसी मामूली काबिलियत वाले निर्देशक के बूते की बात नहीं है। शहर को किरदार बनाने की दूसरी कठिनाई यह है कि स्टोरी नरेशन को ग्राफ या स्ट्रक्चर लीनियर नहीं हो सकता उसे सर्कुलर होना पडे़गा। किस्सागोई का यह सर्कुलर स्ट्रक्चर सुनने में जितना आसान है उसे फिल्माना उतना ही मुश्किल है। खासकर भारतीय दर्शक वर्ग जो लीनियर स्ट्रक्चर वाली फिल्मों का इतना अभ्यस्त हो चुका है कि वह उनके सिनेमाई संस्कार का पर्याय हो गया है। हिन्दी सिनेमाई इतिहास में जब से मैंने फिल्में देखनी शुरू की है, किरण राव का यह प्रयास कई मायने में मुझे फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की याद दिला गया। जिस तरह रेणु ने अंचल को नायक बनाकर हिन्दी कथा साहित्य की परती पड़ी जमीन को तोड़ने का काम किया था, किरण ने भी लगभग वैसा ही किया है। इतना ही नहीं रेणु ने अपनी कहानियों को ‘ठुमरीधर्मा’ कहा था। संगीत का मुझे ज्यादा ज्ञान नहीं है लेकिन इतना सुना है कि ठुमरी में कोई एक केन्द्रीय भाव या टेक होती है और बार-बार गाने के क्रम में वहाँ आकर सुस्ताते हैं, स्वरों के तमाम आरोह-अवरोह के बाद उस बुनियादी टेक को नहीं छोड़ते हैं, जिसे उसकी सार या आत्मा कह सकते हैं। ऐसा करते हुए हम उस अनुभूति को ज्यादा घनीभूत या सान्द्रता प्रदान कर रहे होते हैं जो प्रभाव को गाढ़ा करने का काम करता है। इस आवर्तन के जरिये आप उसके केन्द्र या नाभिक को ज्यादा संगत तौर पर उभार पाते हैं। रेणु ने इस शिल्प के जरिये अपनी कहानियों में अंचल की केन्द्रीयता को उभारने में सफलता पाई थी। लगभग वैसा ही शिल्प किरण ने अपनी इस फिल्म के लिए अख्तियार किया है। और यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि फिल्म में संभवतः बेगम अख्तर द्वारा गाया गये दो ठुमरी भी बैकग्राउंड स्कोर के तौर पर मौजूद है। एक जब अरुण यास्मीन वाले घर में अपने सामानों को तरतीब दे रहा है और दूसरा जब मुन्ना बारिश में भींग कर शॉय को बाय कर रहा होता है और अरुण अपनी पैग में बारिश के चूते पानी को मिला कर पेन्टिग शुरू कर रहा होता है।

भारत के किसी एक शहर या अंचल को फिल्माना खासा चुनौतिपूर्ण है। उसमें भी मुम्बई जो लगभग एक जीता-जागता मिथ है। मुम्बई के नाम से ही जो बातें तत्काल जेहन में आती हैं उनमें मायानगरी, मुम्बई की लोकल, स्लम्स, गणपति बप्पा, जुहू चैपाटी, पाव-भाजी, भेल-पुरी, अंडरवल्र्ड, शिवसेना आदि तत्काल दिमाग में कौंध जाते हैं। इस सबसे मिलकर मुम्बई का मिथ बना है। फिल्म में यह सब हैं जो मुम्बई के इस मिथ को पुष्ट करता है। तो फिर नया क्या है ? नया इस मिथ को पुष्ट करते हुए उसकी आत्मा को बयां करना है। मुम्बई के इस मिथ या कहें कि स्टीरियोटाईप छवि को किरण निजी अनुभवों (पर्सनल एक्सपिरयेंसेज) के जरिये जाँचती है। अंत में मुन्ना की मुस्कान उस मुम्बईया स्प्रिट की छाप छोड़ जाती है जिसको हम ‘शो मस्ट गो आॅन’ के मुहावरे के तौर पर सुनते आये हैं।


अभिनय की दृष्टि से आमिर को छोड़कर सब बेहतरीन हैं। मोनिका डोगरा ने कुछ दृश्यों में जो इम्प्रोवाइजेशन किया है वह गजब है। चार उदाहरण रख रहा हूँ, एक जब उसके शर्ट पर वाईन गिरती है उस समय का उसका ‘डिलेयड पाॅज एक्सप्रेशन’, दूसरा जब फोटो शूट के वक्त मुन्ना पूछता है कि क्या मैं अपना टी शर्ट उतार दूं तब मोनिका ने जो फेस एक्स्प्रेशन दिया है, वह इससे पूर्व कमल हासन में ही दिखा करता था। तीसरा मुन्ना जब पहली बार कपड़ा देने उसके फ्लैट पर गया है, तब वह अपने हाथ को जिस अंदाज में हिला कर कहती है, ‘अंदर आओ।’ और चैथा जब वह अपने टैरेस पर उठने के ठीक बाद अपनी मां से बात कर रही है। पूरे फिल्म मंे प्रतीक बब्बर की बाॅडी लैंग्वेज ‘मि परफ्ेकशनिस्ट’ पर भारी है। इस पर तो काफी कुछ लिखा जा सकता है लेकिन फिलहाल इतना ही कि एक दृश्य याद कीजिए जहाँ मुन्ना शॉय के साथ फिल्म देख रहा है, शॉय के हाथ के स्पर्श की चाह से उपजा भय, रोमांच और संकोच सब उसके चेहरे पर जिस कदर सिमटा है, वह एक उदाहरण ही काफी जान पड़ता है। ‘जाने तू या जाने ना’ में अपनी छोटी भूमिका की छाप को प्रतीक बब्बर ने इस फिल्म में धुंधलाने नहीं दिया है। सलीम इससे पहले ‘पिपली लाइव’ में भी एक छोटी सी भूमिका निभा चुके हैं। यास्मीन को सिर्फ आवाज और चेहरे के बदलते भावों के द्वारा खुद को कन्वे करना था। और वह जितनी दफा स्क्रीन पर आती है उसकी झरती रंगत मिटती ताजगी को महसूस किया जा सकता है। आमिर के हाथों अरुण का किरदार फिसल जाता है, इसे देखते हुए आमिर के संदर्भ में पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि वे एक्टर नहीं स्टार हैं। अरूण कोई ऐसा किरदार नहीं था जिसके गेस्चर और पोस्चर के जरिये उसे कन्वे किया जा सकता था। लगान, मंगल पाण्डेय, तारे जमीन पर, गजनी, थ्री इडियट की तरह सिर्फ वेश-भूषा बदल लेने से ही अरुण पहचान लिया जाता ऐसी बात नहीं थी। अरुण के किरदार को अभिनीत नहीं करना था बल्कि जीना था। आमिर एक्टिंग के नाम पर उन कुछ बाहरी लक्षणों तक ही सिमट कर रह गये जिसे उनकी चिर-परिचित मुद्राओं के तौर पर हम देखते आये हैं। मसलन्, फैलती-सिकुड़ती पुतलियाँ, भवों पर पड़नेवाला अतिरिक्त बल, सर खुजाने और लम्बी सांसे छोड़ना वाला अंदाज आदि। यह लगभग वैसा ही सलूक है जैसा ‘चमेली’ में करीना कपूर ने किया था, उसने भी होंठ रंग कर, पान चबा कर, चमकीली साड़ी और गाली वाली जुबान के कुछ बाहरी लक्षणों के द्वारा चमेली को साकार करना चाहा था। उसी के समानांतर ‘चांदनी बार’ में तब्बू को देखने से किसी किरदार को जीने और अभिनीत करने के अंतर को समझा जा सकता है। बहरहाल इस लिहाज से मोनिका डोगरा सब पर भारी है।

अब अगर बात नेपथ्य की करें तो फिल्म का संगीत और सिनेमेटोग्राफी वाला पहलू बचता है। फिल्म में कोई गाना नहीं है केवल बैकग्राउंड स्कोर है जिसके कम्पोसर हैं, ळनेजंअव ैंदजंवसंससं। इस साल हर फिल्म फेस्टिवल में जिस अर्जेन्टीनियाई फिल्म ‘दी ब्यूटीफूल’ ने सफलता के झंडे गाड़े हैं उसका संगीत भी गुस्ताव ने दिया है लगभग हर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार अपनी झोली में डाल चुके इस संगीतकार का जादू रह-रह कर थोड़े अंतराल पर ‘धोबी घाट’ में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। उन संवादहीन दृश्यों में खासकर जहाँ फिल्म की कहानी सुर-लहरियों पर तिरती आगे बढ़ती है। कहानी साउण्डट्रैक में संचरण करती है। ऐसा कई एक जगहों पर हैं। पर्दे पर आमिर खान प्रोडक्शन के साथ अजान सरीखा एक संगीत है जिसको बीच-बीच में पटरी पर दौड़ती ट्रेन की खट-खट-आहट तोड़ती है, मुन्ना और शॉय जब अंतरंगता के क्षणों में डूब रहे होते हैं। इसके अलावा अकेलापन, उदासी, प्यार जैसी भावनाओं को भी गहराने की कोशिश सुनी जा सकती है। गुस्ताव के साथ ही फिल्म की सिनेमेटोग्राफी भी सराहनीय है। खास कर तुषार कांति रे के वे पन्द्रह-सोलह स्टिल्स, जिसमें शॉय डेली मार्केट को अपनी निगाहों में कैद कर रही है। पर इससे भी ज्यादा प्रभावी वह दृश्य है जिसमें मुन्ना शॉय के साथ समन्दर किनारे बैठ कर डूबते सूरज को देख रहा है और वह डूबता सूरज मुन्ना के पीछे समन्दर के किनारे खड़ी किसी इमारत की उपरी मंजिलों पर लगे शीशे पर प्रतिबिम्बित हो रहा है। शुरू और आखिरी के चार-चार शाट्स की बात तो कर ही चुका हूँ। वैसे सिनेमेटोग्राफी को थोड़ा और सशक्त होना था क्योंकि एक ही साथ विडियो (यास्मीन), पेन्टिंग (अरुण), और फोटोग्राफी (शॉय) तीनों आर्ट फार्म की निगाह से मुम्बई को कैद करने की बात थी।

फिल्म कमजोर लगी आमिर के कारण और एक दूसरी बुनियादी गलती है सलमान खान के फिल्मों के नामोल्लेख के संदर्भ में किरण को करना सिर्फ इतना था कि मुन्ना से शॉय की दूसरी मुलाकात पर उन्हें ‘युवराज’ की जगह ‘हैलो’ देखने जाते हुए दिखलाना था और बाद में मुन्ना उसे ‘युवराज’ दिखाने का वादा कर रहा होता। ऐसा इसलिए कि ‘हैलो’ 10 अक्टूबर 2010 को रिलीज हुई थी और ‘युवराज’ 21 नवम्बर 2010 को। इससे रियलिटी के टाईम वाले डायमेन्सन की संगति भी बैठ जाती। फिलहाल तो इस फिल्म को देखने के बाद जिन बातों की प्रतिक्षा कर रहा हूँ उनमें अनुषा रिजवी और किरण राव की दूसरी फिल्म, ‘पिपली लाइव’ की मलायिका शिनाॅय व नवाजुददीन (राजेश) और ‘धोबी घाट’ की मोनिका डोगरा व प्रतीक बब्बर की अगली भूमिकाओं का इंतजार शामिल है।

Wednesday, February 09, 2011

मलयालम कविता


.एन.वी. कुरुप

मलयालम के जाने माने कवि श्री ओ.एन.वी.कुरुप को इसी माह के अगले 11 तारीख को केरल में ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा जा रहा है। हमने सोचा कि इस अवसर पर उनकी कुछ कविताओं से 'भाषासेतु' के पाठकों को रू ब रूकरवाया जाये तो कैसा हो! 'भाषासेतु' परिवार की तरफ से श्री कुरुप को ज्ञानपीठ पुरस्कार और हालिया ही प्राप्त पद्मविभूषण सम्मान के लिए अशेष बधाइयाँ। कविताओं का अनुवाद किया है स्वयं मलयालम की प्रतिष्ठित रचनाकार तंकमणि अम्मा ने।

एक दिनान्त पत्र
अपने बेहद प्यारे पक्षियों के लिए
मैंने कभी भी नहीं बनाये हैं पिंजरे
उनके उड़ने के लिए
मुझमें है एक आसमान।
बसेरा लेने के लिए
मुझमें है एक डाली।
चुगने के लिए
मेरी छाती में हैं अनाज के दाने।
उनके संग गाते पक्षी भी हैं मेरे अन्दर।
उनके स्वर वंदन सुने बिना
मेरी कोई सुबह नहीं
शाम भी नहीं।
कितने ही देशों में
चक्कर काटकर उड़ जाएँ
तो भी इन्हीं सीढ़ियों पर वे लौट आते हैं,
मैं भी!

कितने ही पता हैं उनके
अन्य देशों की पक्षियों के गीत और बोलियाँ
तो भी वे गाते हैं अपने ही स्वर में।
उनके संग गाते हुए भी
मैं ठहरा मैं ही।

मेरे बेहद प्यारे अंगूर की मदिरा
बनाने के लिए
मैंने कभी पडोसी के बाग से
अंगूरों की चोरी नहीं की है।
किन्तु जानता हूँ मैं कि
किसी भी दिशा के लाल-अंगूर
मेरे बर्तन में मदिरा बनने को
तड़प उठते हैं।
निचली भूमि को सीचने के लिए
करुणा गल उठती है।
पहले कभी आदि पितरों की
नग्नता छिपाने के लिए
इन अंगूर लताओं ने ही
बुन लिया था हरित-पाट।

मेरे अतिथि के स्वागत-सत्कार के लिए
मैंने कभी पडोसी के मेमने की
नहीं की है हत्या।
किसी भी गोशाले के चारों ओर
सूघ-सूघ कर चलने वाले
भेडिये के लिए
अपने सर को नुकीला कर सकता हूँ मैं।

अपने बेहद प्यारे फूलों को चुनकर
कभी भी मैंने फूलदान नहीं सजाया है।
मिट्टी के अल्पायु फूल यदि झड जाएँ
तो भी मेरे उर में रहेंगे वे चिरायु होकर।

मेरे लिए बेहद प्यारी है यह मिट्टी
उसका हर कण
जीवकोश-ज्यों मेरा अपना है।
धुल बन, जल बन, वायु बन, आकाश बन
और ज्वाला बन
किसी दिन मेरा लाक्षागृह भी धधक कर विलीन हो जायेगा
इस मिटटी में ही।
तब मेरा गान उभर कर आएगा
गगंवानी बनकर-
'मैं यह धरती हूँ!'

जब एक नन्हा पौधा लगाते हैं
जब हमन एक नन्हा पौधा लगाते हैं
तब एक छांह ही लगाते हैं
कमर सीधी करने के लिए ठंडी छांह लगाते हैं।
दिन में झपकी लेने के लिए फूलों की चादर बिछाते हैं।
इस मिट्टी में भी
नभ की छाती का श्याम रंग लेकर
अंजन लगाते हैं।
वसंत ऋतु के लिए
चँदोवा तानने को छोटा खम्बा लगाते हैं।
सहस्रों कलशों में
आत्मगंध भरकर
नाच उठती ऋतु कन्या के लिए
आर्द्रता लगाते हैं।
पल्लव बनकर, पत्ते बनकर
प्रस्फुटित होते पुश्प्दलों की सुषमा बनकर
आँखों के लिए बहुरंगी मेले लगाते हैं।

शुक बाला के
सानंद बैठकर झूलने के लिए
झूला लगाते हैं।

शारिकाओं के मधुकलश रखने के लिए
एक सीनका भी लगाते हैं।
गिलहरियों को भी
ओणम की दावत देने के लिए उपक्रम लगाते हैं।

ललचाये खड़े नटखट बालक के लिए
बाँहों में भरकर, गोद में उठाकर
मिठास लगाते हैं।
घड़े भर जल लिए दौड़ते बादल, और
छिपकर बहती बयार
दोनों को एक साथ उतरने के लिए
सीढियां लगाते हैं।

चोरी कर के कभी न अघाते
जंगल के चोर और
नगर के चोर, दोनों जब
नगर के रास्तों के बीच पहुँच जाते हैं
तब आकाश को छूती ऊंचाई में
चमगादड़ रूपी काले झंडे दिखने के लिए
बलिष्ठ बांहें लगाते हैं।

जब हम एक नन्हा पौधा लगाते हैं
तब कई नन्हे पौधे लगाते है।
जब कई नन्हे पुढे लगाते हैं
तब कई छाहें लगाते हैं।


Wednesday, January 26, 2011

भगवत रावत की लंबी कविता : देश एक राग है

छब्बीस जनवरी के अवसर पर भाषासेतु के विशेष अनुरोध पर वरिष्ट कवि भगवत रावत ने अपनी यह कविता हमारे लिए प्रकाशनार्थ उपलब्ध कराई। भाषासेतु की तरफ से उनका आभार। भगवत जी फिलहाल भोपाल में रहते हैं। हाल ही में 'सुराजे हिंद' और 'कहते हैं कि दिल्ली की है कुछ आबोहवा और' नामक लम्बी कविताएँ विशेष रूप से चर्चित हुई हैं। लम्बी कविताओं को उन्होंने जिस खूबी के साथ साधने का दुष्कर कार्य किया है, दर्शनीय है। उम्मीद है आगे भी हम उनकी कविताएँ 'भाषासेतु' के पाठकों के लिए उपलब्ध कराते रहेंगे।

देश एक राग है


इस बार छब्बीस जनवरी पर
मैं देश के नाम सन्देश देना चाहता था
राष्ट्र के नाम नहीं
देश के नाम
जानता हूँ ऐसे सन्देश केवल
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समय समय पर देते रहे हैं
जो राष्ट्र के नाम प्रसारित किये जाते हैं
इन संदेशों की कोइ विवशता होगी
तभी तो उनकी भाषा ऐसी तयशुदा होती है की
उनमें कहीं कोई उतार-चढ़ाव नहीं होता
न कहीं मार्मिक स्पर्श

होश संभालने के बाद पिछले पचास वर्षों से
सुनता आ रहा हूँ ऐसे सन्देश और किसी का कोई एक
वाक्य भी ठीक से याद नहीं
मजेदार बात यहाँ है कि 'देशवासियों'-जैसे
आत्मीय संबोधनों से प्रारंभ होने वाले ये सन्देश
देश को भूलकर राष्ट्र-राष्ट्र कहते नहीं थकते
राष्ट्र की मजबूती, राष्ट्र की गरिमा
राष्ट्र की संप्रभुता, रार्ष्ट्रोत्थान जैसे विशेषण वाची
अलंकरणों से से मंडित
ये आत्ममुग्धता और आत्मश्लाघा
के उदाहरण बनकर रहा जाते हैं
मुझे कुछ समझ में नहीं आता
मेरी उलझन बढ़ती ही जाती है
कि देश के भीतर राष्ट्र है या राष्ट्र के भीतर देश
दोनों में कौन किससे छोटा, बड़ा
सर्वोपरि या गौण है
इस विवाद में न पड़ें तो भी
दोनों एक ही हैं यह मानने का मन नहीं करता

अव्वल तो कोई किसी का पर्याय नहीं होता
फिर भी सुविधा के लिए मान ही लें तो
देश का पर्याय राष्ट्र कैसे हो गया
अर्थात देश में सेंध लगाकर काबा राष्ट्र घुस आया
इसका पुख्ता कोई ना कोई कारण और इतिहास
होगा ही, परा मेरा कवी मन आज ताका
उसको स्वीकार नहीं कर पाया
और यदि इसका उलटा ही माना लें,
कि सबसे पुराना राष्ट्र ही है तो
हज़ारों सालों से कहाँ गायब हुआ पड़ा था
तत्सम शब्दावली की कहीं कहीं पोथियों- पुराणों के अलावा

देश-देशान्तरों की मार्मिक कथाओं से भरा पडा है
सारी दुनिया का इतिहास
राष्ट्रों की कहानियां कौन सुनता-सुनाता है
अब आप ही बताइये
कि क्या कोई ठीक-ठीक बता सकता है कि कब
देश कि जगह राष्ट्र और राष्ट्र की जगह देश
कहा जा सकता है

हमारे जवान देश की सीमानों की रक्षा करते हैं
हम देश का इतिहास और भूगोल पढ़ते-पढ़ाते हैं
सना सैंतालीस में हमारा देश आजाद हुआ था
मैं भारत देश का नागरिक हूँ
ऐसे सैकड़ों वाक्य पढ़ते पढ़ाते बीत गयी उम्र
जब-जब, जहां-जहां तक आँखें फैलाई
दूर दूर तक देश ही देश नजर आया
राष्ट्र कहीं दिखा नहीं

आज भी बड़े-बड़े शहरों से मेहनत-मजदूरी करके जब
अपने-अपने घर-गाँव लौटते हैं लोग तो एक दूसरे से
यही कहते हैं कि वे अपने देश जा रहे हैं
वे अपने पशुओं-पक्षियों, खेतों-खलिहानों
नदियों-तालाबों, कुओं-बावडियों, पहाड़ों-जंगलों,
मैदानों-रेगिस्तानों,
बोली- बानियों, पहनावों-पोशाकों, खान-पान
रीति-रिवाज और नाच गानों से इतना प्यार करते हैं
किकुछ न होते हुए गाँठ में
भागे चले जाते हैं हज़ारों मेला ट्रेन में सफ़र करते
बीडी फूंकते हुए

वे सच्चे देश भक्त हैं
वे नहीं जानते राष्ट्र-भक्त कैसे हुआ जाता है
आजादी की लड़ाई में हंसते-हँसते फांसी के फंदों पर
झूलने वाले देश-भक्ति के गीत गाते-गाते
शहीद हो जाते थे
ऊपर कही गही बातों में से देशा की जगह राष्ट्र रखकर
कोई बोलकर तो देखे
राष्ट्र-राष्ट्र कहते-कहते जुबान न लडखडाने लगे
तो मेरा नाम बदल देना
वहीं एक वाक्य में दस बार भी आये देश तो
मीठा ही लगेगा शहद की तरह

देश एक राग है
सुवासित-सुभाषित सा फैलता हुआ धीरे-धीरे
स्नेहित तरंगों की तरह बाहर से भीतर तक
भीतर से बाहर तक
स्वयं अपनी सीमाएं लांघता
सुगन्धित मंद-मंद पवन की तरह
सारी दुनिया को शीतल करता धीरे धीरे
सारी दुनिया का हिस्सा हो जाता है

कितना भी पुराना और पवित्र रहा हो राष्ट्र शब्द का इतिहास
पर आज पता नहीं क्यों बार-बार
यह शब्द एक भारी भरकम बनायी गयी ऐसी अस्वाभाविक
डरावनी आवाज लगता है जो सत्ता और शक्ति के
अहंकार में न जाने किसको
ललकारने के लिए उपजी है
अपना बिगुल खुद बजाती जिससे एक ही शब्द
ध्वनित होता सुनायी देता है
सावधान!
सावधान!
सावधान!

मैं देश के नाम सन्देश देने के बारे में कह रहा था
और कहाँ से कहाँ निकल गया
यह सही है कि मैं न देश का राष्ट्रपति हूँ
न प्रधानमंत्री, नाकोई सांसद, न विधायक
यहाँ तक कि किसी नगरपालिका का कोई
निर्वाचित सदस्य तक नहीं हूँ

पर सभी ये कहते हैं कि ये जो अच्छे-बुरे जो भी हैं
सब मेरे ही कारण हैं
मैंने ही बनाया है उन्हें
तो इसी नागरिक अधिकार के साथ मेरा देश के नाम सन्देश
क्यों प्रसारित नहीं किया जा सकता
की स्वतन्त्र भारत न गढ़ पाने की कोई दबी-छिपी रह गयी
गुलाम मानसिकता
या परायों के तंत्र से मुक्त न हो पाए की कोई
विवशता

आप जो भी कहें
और आप पूरी तरह मुझे गलत भी साबित कर दें
और जो आप कर भी सकते हैं
कहाँ-कहाँ से पुरानो और पोथियों से प्रमाण
खोजकर ला सकते हैं और मुझे चारो खाने चित्त कर सकते हैं
पर जो सामजिक इतिहास मुझे दिखाई देता है
राष्ट्रों का वह कतई आत्मीय नहीं है

अपने ही भारत देश के बारे में सोचकर देखिये
की भारत में महाभारत कभी नहीं होता
यदि उसका सम्राट ध्रितराष्ट्र न होता जिसे
अपने सिंहासन के अलावा
कुछ भी दिखाई नहीं देता था
इतना ही नहीं उसकी रानी ने भी आँखों पर
पट्टी बाँध राखी थी ताकि उसे भी कुछ दिखाई न दे अपने पुत्रों के मोह के अलावा
भारत में महाभारत कुछ अतापता नहीं लगा आपको
और क्या ध्वनी निकलती है इस वाक्य से सत्ता के आतंक, दंभ, हिंसा और
युद्ध के अलावा
जिस-जिस शब्द से जुदा यह 'महा' उपसर्ग
शब्द की सूरत बदल कर रख दी
उदाहरण देने से क्या लाभ
आप ही जोड़कर देख ले सीधे-सादे शब्दों
के आगे यह उपसर्ग
मैं किसी 'शब्द और 'नाम'' का अपमान नहीं
कर रहा हूँ
और 'महाभारत' जैसे आदिग्रंथ का तो बिलकुल नहीं
वह न लिखा गया होता तो
युद्ध की विभीषिका और निरर्थकता का कैसे पता चलता
कैसे पता चलता की युद्ध में हार ही हार होती है
कोइ जीतता नहीं

'राष्ट्र' ही सर्वोपरि है तो एक ही राष्ट्र के भीतर
कई राष्ट्रेयाताओं की धारणा से आज भी
मुक्त नहीं हुए आप
व्यर्थ गयी हजारों वर्षों की यात्रा आपकी
बर्बर तंत्र से प्रजातंत्र तक की
तो फिर जाइए वापस अपने-अपने
राष्ट्रों में
लौट जाइए अंधेरी खाइयों-गुफाओं में
यही तो चाहते हैं आज भी
नए चेहरों वाले आपके पुराने विस्तारवादी
माई-बाप
कभी जो नेशन का सिद्धांत लेकर आये थे और बढाते रहे
अपना साम्राज्य

इतने वर्षों की दासता से कुछ सबक सीखा नहीं आपने
धर्म के नाम परा बांटा गया
खुशी-खुशी बाँट गए
भाषाओं के नाम पर अलग-अलग किया गया
अलग-अलग हो लिए
अब अपनी-अपनी जातियों के नाम पर भी बना लीजिये अपने- अपने, अलग-अलग राष्ट्र
और अब इस बार डूबे तो कोइ किसी को
नहीं बचा पाएगा

मैं फिर कहता हूँ की मैं किसी शब्द और किसी
नाम का अपमान नहीं कर रहा हूँ
केवल उस मानसिकता की तरफ संकेत कर रहा हूँ
जो अपनी कुलीनता के दंभ में अपने ही देश में
अपने ही बर्चस्व का
अलग राष्ट्र हो जाना चाहती है
और धीरे धीरे सारे देश को
इकहरा राष्ट्र बनाना चाहती हैं
आज भी इक्कीसवीं सदी में
ज्ञान-विज्ञान सब एक तरफ रख कर ताक में
रक्त की शुद्धता, पवित्रता की दुहाई देकर
भोले-भाले लोगों को जिन गुफाओं में ले जाकर
ज़िंदा दफन कर देना चाहते हैं वे
इतिहास गवाह है उन गुफाओं से नकलने में
सदियाँ बीत जाती हैं

आप समझ ही गए होंगे बात महज शब्दों की नहीं, प्रवृत्तियों की है
और कठिनाई यही है की उनके बारे में
शब्दों को छोड़कर बात की नहीं जा सकती
भाषा में इस प्रवृत्ति को
'तद्भव' को 'तत्सम' में जबरदस्ती रूपांतरित
करने का शीर्षासन कह सकते हैं
सभी जानते हैं की यह अस्वाभाविक प्रक्रिया है
'फज़ल' ने किस सादगी से कहा था
'पहाड़ तक तो कोइ भी नदी नहीं जाती'

यह मानसिकता देश की बहुरंगी संस्कृति को
पहले राष्ट्र की संस्कृति कहकर इकहरा बनाती है
फिर देश को एक तरफ फेंक
सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद का नारा लगाती है
मैं किसकी कसम खाऊँ
मुझे भाषा के किसी शब्द से चिढ़ नहीं है
चिढ़ है तो उस मानसिकता से जो शब्दों को
मनुष्य के विरुद्ध खड़ा कर देती है
जो सिर्फ मनुष्य को दिए गए नामों से पहचानती है
उनकी जातियों से पहचानती है,
उनके रंगों से पहचानती है
और उनकी भाषा में कभी दिए गये ‘ईश्वर’
के नाम के लिए उनके अलग-अलग शब्दों से
पहचानती है

देश देशजों से बनता है
उनकी बहुरंगी छटा देशों का इन्द्रधनुष बनती है
जो सबको अपने-अपने आसमान में दिखाई देता है
कौन होगा जिसका मन इन्द्रधनुष देखकर
इन्द्रधनुष जैसा न हो जाए

मान लिया
मान लिया कि अंग्रेजी के ‘नेशन’ शब्द के लिए हिंदी में
फिर से पैदा हुआ ‘राष्ट्र’
तो ‘नेशन’ शब्द में कौन से सुरखाब के पर लगे हैं
पश्चिमी दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में
कितना प्यारा है ‘कन्टरी’ शब्द अर्थात ‘देशज’
कब और कैसे दबोच लिया
‘कन्टरी’ जैसे आत्मीय शब्द को ‘नेशन’ ने
यह खोज का विषय होना चाहिए
जरूर उसके पीछे कोई बर्बरता छिपी होगी

इस सबके बाद भी
आपको अपना राष्ट्र मुबारक
मुझे तो अपना देश चाहिए
आपको इक्कीस तोपों की सलामी मुबारक
मुझे आसमान में मेरा लहराता तिरंगा चाहिए
बुरा लगा हो तो माफ करना
मैं तो अपने लोकतंत्र में अपनी छोटी सी
नागरिक इच्छा पूरी करना चाहता था
कि इस बार छब्बीस जनवरी पर
मैं देश के नाम सन्देश देना चाहता था

Wednesday, January 19, 2011

हिंदी कहानी

खदेरूगंज का रूमांटिक ड्रामा
दुर्गेश सिंह

युवा कहानीका दुर्गे सिं की इस पहली कहानी को 'भाषासेतु' पर प्रकाशित करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। दुर्गेश फिलहा मुंबई में 'नवभारत टाईम्स' से जुड़े हुए हैं। अभी हाल ही में दुर्गेश ने अपनी दूसरी कहानी 'जहाज़' कापा 'मुखातिब' (मुम्बई) में कर श्रोताओं का मन मोह लिया है।

रावण जल चुका था, फिर भी लोगों के मन में हाहाकार मचा हुआ था। मेला अपने चर पर था। बच्चे घुनघुने सेलेकर हवाई जहाज तक का सौदा कर लेना चाह रहे थे और महिलाएं अंदाज में अंर्तवस्त्रों के ठेले पर पिली पड़ीथी मानों उम्र भर की जवानी आज ही मुट्ठी में कैद कर लेना चाहती हो। छोटे हलवाई काली जर्द पपड़ी वाली कराहीमें लपर-लपर गुड़ की जलेबियां छान रहा था। रह-रहकर वह बाएं हाथ से पसीना पोंछ लेता था, इस प्रक्रिया में लकबाय चांस एकाध बूंद दाईं तरफ चू जाती तो कराही छन्न से कर उठती। दस साल का रमई गला फाड़-फाड़ बचपनेकी चीनी में भविष्य को भी जलेबी बनाकर बेच रहा था। बसंतू बाबू जितनी मूंगफली बेच नहीं चुके थे, उससे अधिककउर चुके थे। पप्पू पनसारी की दुकान पर ग्राम परधान सिरपत धोबी बैठे नरेगा-वरेगा जैसे सरकारी मदों सेमिलने वाले पैसों की गैर-सरकारी तरीके से जुगत भिड़ा रहे थे। बरछी और कलऊ नामक दोनों बॉडीगार्ड सिरपत केपैरों में मुंडवत गिरे ऐसे लग रहे थे मानों दो घोंघे जमीन पर आमने-सामने हो। तभी रामलीला में राम का किरदारनिभाने वाले लोकल आर्टिस्ट अशोक गुप्ता कुछ चीथड़े लपेटे हुए भीड़ को चीरते हुए निकले। पीछे की ओर भागतेहुए कुछ बच्चे हनुमान की पूंछ की तरह लगे। देखते ही सिरपत के मुंह से पान की पीक निकलकर बरछी के थोबड़ेपर चिपड़ गई जिसे उसने मुखामृत समझकर मस्तक से लगा लिया। अशोक गुप्ता के पीछे लम्बे बालों वाले लेखकबुल्ला खां, गांधी छाप झोला कंधे पर और लम्बा रजिस्टर उंगलियों में फंसाए निकले।
सिरपत ने पूछा- का भ बुल्ला जी।
बुल्ला- अरे, प्रधान अब हम का करें, सीन समझा रहे थे तब तक अशोक गुप्ता भाग निकलें।
सिरपत- (वार्निंग देते हुए) आज मेला का आखिरी दिन है, रामलीला खत्म हो रहा है, कुछ दिन बाद होने वालेनाटक में बहुत भीड़ होनी है तनिक भी गड़बड़ी भई तो आपको घर की उड़द जांगर में डालनी पड़ेगी।
एक बात अउर हम सोच रहे हैं कि इस बार नाटक में थोड़ा रूमांस हो, त मजा आ जाए। (पीक फिर से थूकते हुए)।
बुल्ला– ‘ कफन करिया का’ में।
सिरपत- हां।
बुल्ला– गरीब करिया की बीवी मर जाती है, उसके पास इतने पैसे नहीं है कि वह अपनी पत्नी के लिए कफन खरीदसके। वह गांव के हर घर जाकर भीख मांगता है कि उसे कफन खरीदने के लिए पैसे चाहिए। इसमें रूमांस कहां सेआएगा।
सिरपत- ई कहानी तो पहले भी हम सुन चुके हैं। (गंभीर तरीके से सोचते हुए)- अरे भाई इ समय नाम नहीं याद आरहा है लेकिन बड़े ही नामी लेखक थे। रिवालेशन कर दिए थे कहानी लिख-लिखकर। तो इसमें रूमांस डालिए। खैर, सुनो करिया वाला रोल कहीं अशोक गुप्ता को तो नहीं दिए हो।
बुल्ला– अरे, परधान उहै का तो रिहर्सल करा रहे थे कि उ भाग निकले। बोले सूट नहीं कर रहा रोल, नहीं करना।
सिरपत- दिमाग फिर गया है तुम्हरा मास्टर, अयोध्या नरेश श्री राम अगर घर-घर जाकर पैसा मांगेगे तो पब्लिकदू मिनट में तुम्हारा पोस्टमार्टम कर देगी।
बुल्ला- परधान हम बहुत सोच के इ फैसला लिए हैं, इसके अलावा हमरे पास कोई आयडिया नहीं है जो अपनीजिंदगी बदल सकता है।
सिरपत- उ कैसे।
बुल्ला- पब्लिक अशोक गुप्ता को लेकर पगलाई रहती है बारहों महीने। बुढ़ए उनको रामचंद का अवतार मानकरराह चलते जय श्री राम कहते हैं। उनकी दुकान में भी जय श्री राम, राधे-सीता, हरे किशना लिखे गमछों और चुनरीका पॉवरफुल बिक्री होता रहता है बारहों महीने। यही नहीं उनका हगना-मूतना तक मुश्किल करे रहते हैं नई उमरके लवंडे। कहते हैं कि हे श्री राम बस एक ठो सीता दिलवा दीजिए। आप तो एक्सपर्ट हैं, हर सलिए धनुष तोड़ते हैंऔर लहा ले जाते हैं कमर में हाथ डालकर। खिसुआ त आंदोलने कर दिया है और कहा है कि इस बार नाटक मेंकाम नहीं मिला तो धनुष टूटने पर रस्सी बम ना फाटी। अशोक गुप्ता को गरियाता भी है वह।
सिरपत- (पीक उगलते हुए) खिसुआ गरियाता है। (जोरदार ठहाका लगाते हैं)। का कहता है उ।
सिरपत के पीक उगलने और हंसने की प्रक्रिया को बरछी और कलऊ ऐसे मंत्रमुग्ध होकर देखते हैं जैसे कि ये दोनोंही अपने आप में विशिष्ट हों।
बुल्ला मास्टर- (शिकायत की मुद्रा में) नई उमर का लवंडा हऊ प्रधान उ। दू साल से जब-जब अशोक गुप्ता धनुषमंच पर तोड़ते हैं तब-तब प्राइमरी स्कूल में सुतली बम उहै फोड़त है। अब आपको तो पता है कि पूरे गांव मा देसीबम बनाने की प्रक्रिया ओकरै खानदान को पता है। फ्रस्टिया गया है, एक दुपहरिया घर आकर कहै लगा कि सुनाबुल्ला चचा, इ बार अगर रोल नहीं मिला तो कउनो धमाका ना होई। अशोक गुप्ता धनुष त जरूर तोडि़हैं लेकिनआवाज ना आई।
इतना कहने के साथ ही मास्टर बुल्ला सेंटीमेंटल हो गए और बोले- प्रधान, इहै नहीं, उ बोला कि और इ आवाजऊपर वाले की लाठी वाली आवाज टाइप होई जवन लगे तो जरूर पर कुछ ना सुनाई देई।
सिरपत प्रधान अपने जीवन काल में बड़े ही कम अशुभ मौको पर गंभीर हुए थे, खिसु प्रसंग ने उन्हें आज फिर सेगंभीर कर दिया था। दिमाग में खुराफात सूझी तो बोले- ड्रामा रोमांटिक होगा मास्टर, खिसुआ को अगर हीरो बना देतो कैसा रहेगा। हेरोईन कहीं मेले में हेरा जाएगी और उ ढूंढता रहेगा। (सीना गच्च से फूलकर पेट के लेवल में आगया) अंत मे मिल जाएंगे दोनों।
उनको यह लगा कि बुल्ला कहीं मना न कर दें, ऐसा लिखने से तो उन्होंने कहा- वैसे मास्टर एक ठो बात पूछें बुरातो नहीं मानोगे ना।
बुल्ला मास्टर- (बुरा मानने वाले मन के प्रभावी होने की दशा में मुख पर उदासीनता का मुखौटा लगाकर)
जी परधान, बोलिए।
सिरपत- (सिर खुजाते हुए ) कहानी कुछ ऐसी करिए कि खिसुआ हेरोईन को ढूंढते हुए करिया के घर पहुंच जाएगाऔर एक दिन नहर किनारे वाले खेत के मेड़ पा घास छीलती हुई हेरोईन उसको मिल जाएगी। (चेहरे पर चमक आगई थी) अंत में यही दोनों करिया के बुढापे का सहारा बन जाएंगे।
बुल्ला मास्टर (लगभग पगलाने की अवस्था में)- अरे, का कह रहे हो परधान। पिछले एक साल में स्याही सूखनेनहीं दिए हैं इसके चक्कर में। बीमार बीवी का भी ध्यान नहीं धरे। अब आप कह रहे हैं कि कहानी में रूमांस लानाहोगा।
सिरपत- (हाथ ऊपर उठाते हुए) देखिए, नर्वस मत होइए मास्टर, बहुत कुछ नहीं थोड़ा बहुत होगा। पैसे की जरूरतहमहूं को है और आपको भी। जेतना चंदा एकट्ठा होगा उतना ही फयदा होगा। परचा छप गया है, एक दिन काटाइम है आपके पास सोचके बताइगा। हो सके तो खिसु और उसकी प्रेमिका के बीच एक जर्बदस्त प्रेम प्रसंग कासीन भी लिख लीजिएगा। उस कंडेशन में हमको किसी और की मदद नहीं लेनी होगी।
बुल्ला मास्टर ने अपने झोले का टंगना मजबूती से कंधे के ऊपरी सिरे की ओर सरकाया। थूक की एक सूख चुकीपीक गटकी और एक हाथ उठाकर सिरपत परधान को नमस्ते किया। बहिनचोद नामक विशेषण उन्होंने पिछवाड़ादिखाते हुए सिरपत के लिए छोड़ दिया। बरछी और कलऊ को पता होता कि सिरपत को उत्तेजित करने वाला कोईखजाना हवा में तिर रहा है तो वे तुरंत पप्पू पनसारी की दुकान पर इक्कीसवीं सदी का काकोरी कांड कर डालते।
मेले की भीड़ से पैदल ही अपनी साइकिल लेकर मास्टर बुल्ला निकले और बाजार खत्म होते तक निरंतर चलते हीरहे। मास्टर बुल्ला की यही एक प्रॉब्लम थी कि वे डिप्रेशन में नहर किनारे वाली देसी की दुकान पर अपनी सवारीरोक देते थे। उस दिन बुल्ला को मूड में देखकर पल्लेदार हजारी राम बहुत खुश हो गया। चिकट बेवड़ों को शाम सेपिला-पिलाकर उसके दिमाग की मां-बहन-बीवी सब हो गई थी। बुल्ला को देखते ही उसने दो राजाबाबू के खंभेअपने तकिए के नीचे दबा दिए और शाम सात बजे ही दुकान बंद करने की तैयारी पूरी कर ली।
बुल्ला ने भी अपनी साइकिल टेढ़ी कर ‘आपका ध्यान किधर है, मधुशाला इधर है’ वाले बोर्ड के सहारे खड़ी कर दी।
बुल्ला मास्टर नीम के नीचे एक लावारिस गुमटी से सटे कुएं की जगत पर हताश बैठ गए। दिन भर की गर्मी खत्महो रही थी लेकिन बुल्ला के दिमाग की गर्मी भरभरा कर बाहर निकल रही थी। पल्लेदार हजारी राम ने सफेद कांचके दो मटमैले गिलास बुल्ला के सामने रख दिए। राजाबाबू बुल्ला मास्टर का फेवरेट ब्रांड हुआ करता था। सबसेतेज बिलकुल खबरिया चैनल की तरह उसका नशा बुल्ला के दिल-दिमाग पर छा जाता था और सुध-बुध खोकर वेअपनी वाली पे उतर आते थे।
कुएं की जगत पर झक्क सफेद चांदनी में आमने-सामने बैठे हजारी और बुल्ला दो देवदूत लग रहे थे।
उनके बीच में दो गिलास, एक बोतल, पेपर पर बिखरी दालमोट, नीबूं के कुछ फांके और प्याज के टुकड़े ऐसे लग रहेथे मानो वे दुनिया को सुखी करने का कोई मंतर इन्हीं संसाधनों के आधार पर पढ़ने वाले हो। दूर से देखने वालानिश्चय ही हदस जाता। एक बार बुल्ला गिलास उठाते और तो दूसरी बार हजारी। चियर्स करने की अवस्था मेंपहला दूसरे के मुंह तक गिलास ले जाता और दूसरा पहले के मुंह तक। बीच में दोनों गिलास रखते और दालमोटको फैलाकर धरती की तरह गोल कर लेते। फिर उस पर नींबू गारते और प्याज छिड़कते, मानो धरती की खुशहालीके लिए हवन कर रहे हों।
हजारी- कहानी समझ गए, इ चूतिया सिरपतवा सब बदलने के चक्कर में है। पहले पंचायत भवन मा किराने कादुकान खोलवा दिया, तेल-चीनी अपने घर से बंटवा रहा है और अब रामलीला का भी अंत करने की तैयारी में है।सुरसा लीलैं एका।
बुल्ला-पूरा एक साल लगा दिए हैं, ड्रामा का कहानी लिखने में और उ बकचोद बोलता है कि कहानी में प्रेम प्रसंगडालो। (गिलास धम्म से नीचे रखते हुए) अरे घंट से प्रेम प्रसंग डाले। कउन प्रेम करता है आजकल किसी को। खुदसाला खिसुआ की मां को दिन-दहाड़े पटक लेता है अरहर के खेत में अउर बात करता है प्रेम प्रसंग की। अच्छे, जियावन, सरजू, मदेली, सेवा और सबका एकई साझा किस्सा है।
हजारी को लगा कि अब बुल्ला मूड में आ गए हैं और किसी भी पल उसके फैमिली लाइफ का भी सी टी स्कैन कियाजा सकता है।
हजारी- (बीच में ही टोंकते हुए) तो लिखिए ना भाई सिरपतवा के हिसाब से। पइसा काटता है क्या आपको। पिछलापंद्रह साल से रामलीला लिख रहे हो, क्या मिला। अरे आपको तो इ भी नहीं पता है कि पर्चा छप गया है आपके नामसे। गांव भर में चपकवा और बंटवा रहा है- आजादी के साठ साल बाद खदेरूगंज के इतिहास में पहला थेटर ड्रामा।पहले हम सोचे कि वही पुराना ड्रामा फिर होगा लेकिन इहां तो सीन दूसरा है। आगे क्या लिखा है थामिए जराबताता हूं।
दो पेग के बाद अक्सर हजारी ऐसे ही तांडव पर उतर आते थे। दिन के उजाले और होश-हवास में वह जो काम नकर पाते थे, वह राजाबाबू की खुमारी में कर गुजरते थे।
बुल्ला मास्टर सरेंडर मोड में थे और हजारी ने दालमोट के नीचे दुबकी जा रही ड्रामा के विज्ञापन की पर्ची बाहर खींचली। उस पर लिखी दूसरी लाइन कुछ इस तरह थी कि खदेरूगंज रामलीला के मशहूर लेखक मास्टर बुल्ला कीसरफरोश लेखनी से निकला ‘ कफन करिया का ’। पहला थेटर ड्रामा जिसको देखकर आंसू की नदियां बहनिकलेंगी। रामचंद का अविस्मरणीय किरदार निभाने वाले अशोक गुप्ता पहली बार गरीब करिया के रोल में। साथही नए प्रेमी जोड़े का प्रेम प्रसंग भी। महिलाओं और बच्चों के बैठने के लिए अलग पंडाल की व्यवस्था। टिकट दर- दस रूपए। पहले आइए और पहले पाइए। विशेष निगरानी के लिए लाउडस्पीकर और होम गार्ड्स की अतिरिक्तव्यवस्था। किरपा करके अपने बच्चों और बोरों का ध्यान रखें, खो जाने पर रामलीला नाट्य समिति और पंचायतखदेरूगंज की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।
इतना कहने के साथ ही हजारी ने पर्ची मास्टर बुल्ला के हाथ में थमा दी। बुल्ला जब तक पर्ची निहारते उनकी लारटपककर पर्ची को गिला कर गई। अपने कुर्ते पर रगड़कर बुल्ला ने उसे सुखाना चाहा लेकिन तब तक उस पर्ची केचीथड़े उड़ चुके थे।
हजारी ने दोनों गिलासों को नाइंटी डिग्री एंगल पर जाकर निहारा तो पता चला कि जाम खाली हो चले थे। उन्होंनेबुल्ला मास्टर का गिलास उठाकर उनकी नाक के पास सटा दिया तो बुल्ला ने जवाब दिया- हजारी बाबू, थोड़ा सबरअली का लो।
हजारी को समझ आ गया था कि बारी बुल्ला मास्टर की है।
बुल्ला– (लरजती आवाज में) अब समझ आया कि सिरपत प्रेम-प्रसंग क्यों डलवाना चाहता है नाटक में।
हजारी- (सहजता से) क्यों।
बुल्ला– क्योंकि बुल्ला मास्टर की लेखनी का टेस्ट लेना है उसे। अब हो चली है चला-चली की बेला। बुल्ला मास्टरकी लेखनी में उ धार कहां। (पिछवाड़े का पिछला हिस्सा पीछे की तरफ शिफ्ट करते हुए)
ऐसा सिरपत को लगता होगा।
हजारी भी सीमेंट के बने चबूतरे पर एक हाथ सिर पर टिकाकर उर्ध्व लेट गए और बोले- पर मास्टर तुमको कोईयहां से खदेर नहीं सकता। खदेरूगंज का नाम खराब नहीं होने देना है मास्टर।
बुल्ला मास्टर की आंखें चटक चांदनी में चांद को निहारने लगी। बचपन में पहुंच चुके मास्टर को याद आया कि कैसेउनके गांव के ही ठाकुर गुलजार सिंह और परताप सिंह ने गोरों की एक पलटन को गांव से खदेर दिया था। तब सेगांव का नाम खदेरूगंज पड़ा और वहां के लोग हर साल कुछ न कुछ खदेरने लगे। कभी मलेरिया, कभी प्लेग, कभीसूखा, कभी बाढ़, कभी लकड़बग्घा तो कभी मुंहनोचवा, सब खदेर चुके थे यहां के लोग।
बुल्ला– हजारी, सब कुछ तियाग दिए, लिखने के चक्कर में। तड़पत विमली आज भी नाच उठती है आंखों में। सदरका डागडर कहेस, बरेस्ट कैंसर है। अरे हम सोचा (एक हाथ हवा में घुमाकर) प्लेग, हैजा, पोलियो, टायफायड, कालरा इहै बीमारी होती है। कैंसर का हुआ, हमको थोड़ा रिस्की लगा (एक गाल टेढ़ा करते हुए)। बुल्ला मास्टर नेअपनी जिंदगी में इतने रिहर्सल किए और करवाए थे कि उनकी पर्सनल बातें भी इमोशनल सीन की रिहर्सल जैसीलगती थी।
बुल्ला आगे बोले- फिर जब सरकारी से प्राइवेट में ले जाने को बोले तो हमको लगा अब क्लाइमेक्स का टाइम आगया है बिमला रानी, मोरी बिमला रानी। इतने के साथ बुल्ला मास्टर चिंघाड़ने लगे।
हजारी ने उनका मुंह दबाकर जर्बदस्ती बंद करवाया वरना पवित्र नीम के पेड़ के नीचे दारू पीने के एवज मेंखदेरूगंज की छह सदस्यीय पंचायत फैसला करने बैठ जाती।
तो लिख के दे दीजिए सीन ना, हजारी बोला।
बुल्ला- हमारी खुद की जिंदगी मा एतना ट्रेजडी रहा है और हम आज तक लव सीन नहीं लिखे हैं।
हजारी- त एक बात कान में घुसेड़ ला बुल्ला मास्टर, एई बार ना लिखबा त अगली दाईं से रामलीला के पंडाल माबोरा बिछाई के बैठबा।
राजाबाबू को बुल्ला ने पूरी तरह से अपनी गिलास में उड़ेल लिया।
हजारी- अरे, मास्टर दिमाग फिर गया है आपन, पानी कहां है अपने पास, एक बोतल लाए थे उहौ खत्म हो गया है।
बुल्ला (गिलास नीचे पटकते हुए)- त अब का सुच्चै दारू अंदर जाई।
आधी शराब उन्होंने हजारी के गिलास में डाल दिया।
हजारी (चबूतरे पर से कूदते हुए)- दबे पांव चला मास्टर नहर की ओर, उहीं पानी मिली।
अपना-अपना गिलास हाथ में पकड़े बुल्ला और हजारी नहर की ओर चल पड़े। रात अपने शबाब पर थी, अब येदोनों देवदूत नहर के पुलिए पर बैठकर किसी दैत्य से कम नहीं लग रहे थे।
राजाबाबू का रंग और नहर के पानी का रंग एक जैसा था, उन्होंने एक गिलास पानी नहर से निकाला और दारू केसाथ मिक्स कर लिया। दोनों ने साथ में चियर्स किया, गिलास आपस में टकराने के बाद दोनों के होंठों तक पहुंचगए। करेजे में हलकी सी हूक उठी लेकिन तक तक सरकारी पानी से उनके अंतडि़यों की सिंचाई हो चुकी थी।

हजारी- पहले इ तो बताओ लव सीन अकेले खिसुआ थोड़ू न करेगा, केऊ लड़की भी तो चाहिए।
बुल्ला के दिमाग में सिरपत को नीचा दिखाने की आकांक्षा प्रबल हो चुकी थी और वे अब कुछ भी करके अपने अहमको संतुष्ट करना चाह रहे थे।
बुल्ला पुलिया से एकाएक उठ खड़े हुए बिलकुल हिंदुस्तानी छुटभैये नेताओं के अंदाज में और बोले- खिसुआ कीप्रेमिका का किरदार निभाएगी नगीना।
नाम सुनते ही हजारी हिल गए। नशा काफूर हो गया।
हजारी (रिएक्ट करते हुए)- चढ़ गई है तुमको, घर जाकर सीन लिखो।
इतने के साथ ही हजारी ने अपनी साइकिल उठाई और भाग निकले, भागने की प्रक्रिया के बीच ही हजारी ने कहा- नगीना क सोचिहा, मत मास्टर। सिरपतवा बुढौती खराब कई देई।
हजारी के जाने के बाद बुल्ला कुछ देर तक पुलिया पर बैठे रहे। नहर के पानी से जमकर मुंह धोने के बाद पैदल कुएंकी तरफ चल दिए जहां वे अपना झोला भूल गए थे। कुएं तक पहुंचते-पहुंचते बुल्ला ने ड्रामा का लव सीन सोचलिया था। उन्होंने यह भी तय कर लिया था कि नगीना को काम करने के लिए सिरपत से कैसे बात करना होगा।जगत पर पहुंचकर उन्होंने अपना टेरीकाट का कुर्ता निकाल दिया, पसीने से तरबतर बुल्ला झोले और कुर्ते कोसिरहाने दबाकर आकाश को ताकने लगे। तारों के बीच उन्हें बिमली की सूरत झिलमिलाती दिखी। बिमली खुशलग रही थी, उन्हें लगा कि वह उनसे बात करना चाह रही हो। बुल्ला बोले- का निहार रही हो।
बिमली- परशान हो, कपार दबा दें।
बुल्ला- परशान तो हम तबहूं हुए थे जब तुमसे पूरे गांव का खिलाफ जाकर बियाह किए थे।
बुल्ला खां-बिमली कुमारी का बियाह आसान तो न था ना। रामचंद्र ने हमको बचा लिया था, आज भी बचाते आए हैं।बुल्ला लगातार बोले जा रहे थे ऊपर की तरफ निहारते हुए)
बिमली- रामचंद तो आज भी तुम्हरे साथ हैं, तुम लिख सकते हो। प्रेम तो तुम हमसे भी किए थे।
बुल्ला मास्टर की आंखें मूंदने लगी थी और बिमली उनकी आंखों में पूरी तरह समा गई थी। भोरहरे नींद में ही बुल्लामास्टर पसीना-पसीना होने लगे। नींद उचट गई और उनके दिमाग में चल रहा सीन अब कागज पर उतरने कोव्याकुल हो उठा था।
उठते से ही उन्होंने अपना झोला टटोला, रजिस्टर और कलम लेकर लिखने बैठ गए। सुबह के सात बजे तक वेकरिया के गांव जाने के बाद की घटनाओं का विस्तार करते रहे ताकि खिसु और नगीना का प्रसंग उसमें जोड़ सके।
सूरज देवता मुंह पर चमक रहे थे। बुल्ला ने अपने जीवन का पहला लव ड्रामा पूरा कर लिया था, अब बस मंजूरी केलिए उन्हें सिरपत परधान के पास जाना था। गांव निपटान की प्रक्रिया में ही था कि इससे पहले बुल्ला सिरपतपरधान के घर पहुंच चुके थे।
सिरपत ने बुल्ला को आते देख बरछी से कहा- जो बे, एक ठो कुर्सी त लेई आउ।
(सिरपत की तरफ देखते हुए)- आवा मास्टर, (बरछी की तरफ देखते हुए चिल्लाकर) एक ठो चाई लाना मास्टर केलिए।
बुल्ला– नाहीं मास्टर, चाय-वाय बाद में। लव सीन लिख लिए हैं, बस एक बार सुन लें तो रिहर्सल शुरू कर दियाजाए। समय बहुत कम बचा है।
सिरपत- (हंसते हुए), अरे एतना जल्दी, हम तो आपसे मजाक किए थे। खैर अब सुना ही दीजिए।
बुल्ला ने रजिस्टर निकालकर पूरी कहानी फिर से एक बार सिरपत धोबी को सुना दी। साथ ही यह भी बता दिएखिसु की प्रेमिका वाले रोल के लिए कोई लड़की ही चाहिए।
सिरपत एक बार फिर से सिर खुजा रहे थे और साथ ही बुल्ला की तरफ ऑप्शन वाली निगाहों से देख रहे थे।
बुल्ला तपाक से बोले- एक बार ड्रामा हिट भया न, तो लड़़का और लड़की दूनू क फूचर ब्राइट बा परधान।
सिरपत ने दो-तीन मिनट के अंदर ही आंटी-भाभी टाइप्स के चार-पांच नाम गिना दिए। बुल्ला ने इन सभी नामोंको पहले से फिक्स की गई वजहों के आधार पर खारिज कर दिया। सिरपत एक बार फिर से गंभीर हो रहे थे आौरलगने लगा था कि कोई अशुभ घड़ी आ रही है।
हारकर सिरपत बोले- आप ही बताएं मास्टर, किसको लें।
बुल्ला मास्टर के पाले में गेंद पहली बार आई और उन्होंने तुरंत ही नगीना के नाम का सुझाव दे डाला।
पहले तो सिरपत चकरा गए लेकिन बाद में बुल्ला से इसकी वजह पूछी तो उन्होंने कहा- देखा, परधान एक तोआपकी बेटी और दूसरे आपके सानिध्य में पूरा ड्रामा होगा। (बुल्ला लगातार सिरपत की आंखों में आंख डालकरबोले जा रहे थे)- ड्रामा हिट हुआ तो बिटिया आज ब्लॉक, कल जिला और परसों स्टेट लेवल पर पहचान बनाई।
बुल्ला की जुबानी जादू का सिरपत पर असर बढ़ रहा था और सिरपत की गंभीरता नगीना में राजनीतिक विरासतकी तलाश कर रही थी। अखबारों और टीवी चैनलों में उन्हें बदलते राजनीतिक दौर की बू तो पहले ही आ चुकी थी।
भरी दोपहर में अशोक गुप्ता और खिसु को बुलावा भेजा गया। रामलीला मंच पर ही ड्रामा करने की जगह मुकर्ररकर दी गई। मंच के पीछे दो कपड़ों के पर्दों को घेरकर रिहर्सल रूम बना दिया गया जहां मास्टर बुल्ला, खिसु औरनगीना के अलावा किसी को आने की मंजूरी नहीं थी। सिरपत परधान की बेटी का ड्रामा में रोल होने की वजह सेआस-पास के गांवों में खदेरूगंज के लव ड्रामा की जोरदार चर्चा और आलोचना हुई। गांव के लोग बीपीएल कार्ड , नरेगा, इन्दिरा आवास, जवाहर रोजगार, लाडली बेटी, कन्या धन और हरित तालाब जैसी योजनाओं का लाभ नपाने के डर से सिरपत के खिलाफ नहीं बोलते थे, गांव के बाहर के लोग बरछी और कलऊ के डर से। मास्टर बुल्लाकड़ी मेहनत करके खिसु और नगीना के प्रेम प्रसंग को जीवंत बनाने में लगे रहते।
सिरपत भी कभी-कभार दशा-दिशा देखने के लिए रिहर्सल रूम आ जाते थे।
अठारह का खिसु और पंद्रह की नगीना न चाहते थे और न ही प्रेमी-प्रेमिका बन पाते थे। फिर भी मास्टर बुल्लाहिम्मत ना हारते, दिन का खाना सिरपत के घर से वहीं मंगवा लेते थे। सिर खपा के वहीं पड़े रहते, चेहरे पर पिसीसुतही घिस-घिसकर नगीना और खिसु के चेहरे आसमानी चमकीले रंग के हो रहे थे।
रिहर्सल के पांचवें दिन दोपहर में डेढ़ और पौने दो बजे के बीचोंबीच पहली बार खिसु और नगीना की निगाहें मिलीथी। बुल्ला मास्टर अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे उंघ रहे थे। लम्बा सा, पीले फूलों की छाप वाला फ्रॉक पहने नगीनानीलम नामक अभिनेत्री लग रही थी और हॉफ आस्तीन की शर्ट-चिपकी पतलून पहने खिसु गोविंदा नामकअभिनेता। दोनों ने एक दूसरे को दूर से ही चुम्बन दिया, इतने में मास्टर बुल्ला उठ बैठे और रिहर्सल करने केआदेश दे दिए। एक घंटे में न जाने ऐसा क्या हुआ था कि बुल्ला मास्टर का लव सीन एकदम रियल सा हो चला था।एकबानगी कुछ ऐसी थी-
खिसु- तुम मेरे पास क्यों नहीं आती।
नगीना- छोड़ों, करिया चचा देख लेंगे। उनके ही पीठ पीछे हम ऐसा करेंगे।(नोट- खिसु ने कुछ ऐसा नहीं पकड़ा थाजो नगीना उसे छोड़ने के लिए कह रही थी)
खिसु- हमको भाग चलना चाहिए। ये गांव वाले हमारे प्यार को नहीं समझेंगे। मेरा कुछ सपना भी तो है, हम जीलेंगे जिंदगी।
नगीना- कैसे।
खिसु- तुम जिंदगी की बात करती हो, मैं सपनों की। तुम जिंदगी जी रही हो और मैं सपना देख रहा हूं। हमारीजिंदगी भी तो वहीं से शुरू हुई थी जहां से हमने सपना देखा था।
इतना सुनते ही बुल्ला मास्टर बोल पड़े थे- शाबाश। बच्चों। उस दिन के रिहर्सल का सीन यहीं से कट हो जाता है।
बुल्ला मास्टर कुएं पर बैठे हैं और हजारी पेग लगा रहे हैं। चांद उतरा आया है और चांदनी छिटकी हुई है।
कुछ पन्ने हाथ में पकड़े हुए वे बोलते हैं- बात साथ देने की नहीं थी, साथ निभाने की थी। मैं तो किसी का साथ ना देपाया। अपना भी बड़ी मुश्किल से दे पा रहा हूं।
इतना कहने के साथ ही मास्टर बुल्ला ने पहला पेग गटक लिया। हजारी ने भी पहला पेग गटकते हुए कहा- वाहमास्टर, छा गए। कउन से सीन का डाइलॉग हउ इ।
बुल्ला– खिसु और नगीना के जुदाई वाला सीन। मतलब यहीं से उनको बिछड़ना है।
आगे की कहानी ना हजारी ने पूछी और ना ही बुल्ला ने बताई।
हजारी और बुल्ला को राजाबाबू ने जैसे ही अपने आगोश में लिया वैसे ही आकाश में भी चांदनी डूबने लगी। मानोंकुछ बताना चाह रही हो, जल्दीबाजी का संकेत दे रही हो, क्या पता बेमौसम बरसात तो नहीं आने वाली थी।
सूरज सर पे आ गया था, बुल्ला को नींद में ही कोलाहल सुनाई दिया। आवाज सिरपत परधान के घर के तरफ से आरही थी। आंख खोली तो बरछी और कलऊ सामने खड़े थे। हजारी और बुल्ला पीछे-पीछे सिरपत परधान के घर तकपहुंचे। गांव की हिंदू बस्ती अलग उमड़ रही थी और मुस्लिम बस्ती अलग। छह सदस्यीय पंचायत में शब्बीर अली, पल्लू साईं, रेहान शेख के अलावा खुद सिरपत परधान, बड़कऊ दूबे और राम बचावन सिंह थे। मास्टर बुल्ला परआरोप लगाया गया कि इन्होंने खिसुआ आतिशबाज को पहले उकसाया और फिर नगीना को भी ड्रामा में कामकरने के लिए प्रेरित किया। साथ ही हिंदु-मुस्लिम भाईचारे से भी उन्होंने भड़काने की कोशिश की है। इसी कानतीजा है कि दोनों आज रात गांव छोड़ फरार हो गए। नगीना अपने साथ गहना-रूपया लेकर भागी है जबकिखिसुआ धनुष टूटने पर भड़ाम की आवाज निकालने वाले बम का नुस्खा लेकर फरार भया है। नया बम तो कोई भीबना सकता है लेकिन उस परंपरागत बम को बनाना आसान नहीं है। परधान सिरपत के साथ ही पूरी ग्राम पंचायतखदेरूगंज को इस फरारी प्रक्रिया से घोर नुकसान हुआ है। इस जघन्य कर्म की पूरी जिम्मेदारी मास्टर बुल्ला परआती है, अतएव यह पंचायत उन्हें पांच सालों के लिए गांव बदर करती है। इस दौरान कुर्क की गई उनकी संपत्तिग्राम पंचायत भवन में सुरक्षित रखी जाएगी।
सिरपत ने बुल्ला से पूछा- कुछ कहना चाहते हो अपनी सफाई मा मास्टर।
बुल्ला- मुजरिम सफाई नहीं देते परधान। आरोपी तो हमसे बिना कुछ पूछे ही बना दिया आप लोगों ने।
पंचायत खत्म हुई। बुल्ला के घर में एक बक्से, एक बिमली की फोटो और दो-पांच बर्तनों के अलावा कुछ भी नहींमिला। ‘कफन करिया का’ की पहली कहानी जो उन्होंने अशोक गुप्ता के लिए भिखारी के रोल को आधार बनाकरलिखी थी, उसकी पांडुलिपि भी ग्राम पंचायत खदेरूगंज ने जब्त कर ली थी।
बुल्ला अपना बिस्तर समेट उसी रात ग्राम पंचायत खदेरूगंज की सरहद से बाहर निकल पड़े। उनके साथ उनकीसाइकिल भी थी। उसी पुरानी पुलिया पर वे फिर से बैठ गए।
बुल्ला ने नीले आसमान की ओर देखा, बिमली मुस्करा रही थी।
बुल्ला ने चुटकी लेते हुए कहा- बात साथ देने की नहीं थी, बात साथ निभाने की थी।
हजारी बोले- सठिया गए हो मास्टर और चारों तरफ राजाबाबू की खुशबू फैल गई।
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Wednesday, January 12, 2011

हिंदी कविता

जैसा कि 'भाषासेतु' के पाठकों से हमारा वायदा था कि अब से हम हर हफ्ते बुधवार के दिन एक नए पोस्ट के साथ हाजिर होंगे, तो इस बार आपके समक्ष हैं हिंदी के जाने माने कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की चन्द कविताएँ। 'इन दिनों हालचाल', 'अनभै कथा', 'असुंदर सुन्दर' नामक तीन संग्रहों के 'मालिक' जितेन्द्र पेशे से प्राध्यापक हैं। कविता के अलावा आलोचना पर भी समान अधिकार। भारत भूषण अग्रवाल सम्मान, कृति सम्मान, भारतीय भाषा परिषद के युवा पुरस्कार समेत कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से नवाजे गए जितेन्द्र की प्रेम कविताओं का एक संग्रह 'बिलकुल तुम्हारी तरह' जल्दी ही प्रकाशित होने वाला है। पेश है इसी संग्रह से कुछ प्रेम कविताएँ।

जितेन्द्र श्रीवास्तव
पहचानना हथेली की तरह

तुम्हें पहचानता हूँ
अपनी हथेली की तरह

तुम्हारे माथे पर
उभर आईं रेखाएँ
मेरे हाथ की लकीरों की तरह हैं।

तुम्हारे नाम


भीगी सी शाम
तुम्हारे नाम

पात पात पर पानी फिसले
आँखों में कुछ आये मचले
इधर उधर की बातें प्यारी
सुबह सांझ में कैसी यारी

वह देखो बेवक्त
निकला है घाम।

पहाड़

ये पहाड़ हैं प्रिये
देश की देह पर ढाल से

यहाँ गाती हैं युवतियां मौसम के गीत
करते हुए काम
गाती हैं मेरे गाँव के पहाड़ कितने सुन्दर हैं
इन दिनों दृश्य कितना मनोरम है
ऐसे में फौजी पिया घर आ जा
दिल के करार आ जा
जीवन के बहार आ जा।

इन दिनों हालचाल
काँप रहा है दिन
और धुप भी पियराई है
न जाने
कौन ऋतु आई है!

उजास
तुम्हें फूल होना था
तुम पत्ती हुई

मुझे रंग होना था
मैं पानी हुआ

पानी-पानी जवानी-जिंदगानी हुई!

Wednesday, January 05, 2011

मलयाली कविता


अयप्प पणिक्कर
पणिक्कर मलयाली कविता में आधुनिक कविता के जनक माने जाते हैं। वे पहले कवि हैं, जिन्होंने मलयाली मेंपूर्ण यथार्थवादी, समसामयिक और रोज़मर्रा की बोलचाल में कविताई का साहस किया। वैसे तो पणिक्कर कोअनुवाद करना मुश्किल है, पर रति सक्सेना ने यह कष्टसाध्य कार्य बखूबी किया है। उनकी बहुचर्चित लम्बी कविता 'कुरुक्षेत्र' मलयाली साहित्य में आधुनिक कविता का प्रवेशद्वार कही जाती है। केरल साहित्य अकादेमी, कबीर सम्मान, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद् पुरस्कार, कुमार आशानपुरस्कार आदि से सम्मानित

वह मर गया
वह मर गया
वह रोई नहीं
वह मर गया
फिर भी वह रोई नहीं
वह मर गया
लेकिन वह रोई नहीं

पहला प्यार
दुनिया में कुछ भी नहीं है
पहले प्यार जैसा
यदि कुछ है तो
वह है दूसरा प्यार।

दूसरे प्यार की तरह
केवल एक चीज़ है इस संसार में
वह है-
यदि मौक़ा मिले तो तीसरा प्यार।

इतना जान गए तो
सबकुछ जान लिया
दार्शनिक बन जाओगे
मुक्ति मिल जाएगी।

भेड़
एक प्यारी सी भेड़
दुलारी सी भेड़
पकने पर कितनी
स्वादिष्ट भेड़।


बरररसात
बरसात जैसे
रिम झिम झिम झिम

नहर जैसे
हर हर हरा हर

कीड़े जैसे
कुर्र कुर्र कुर्र्रू रु रु रु

सड़क जैसे
सर्रर्र सररर सरा

बरसती है
बहती है
रेंगती है
सरकती है
खूबसूरत जैसे...

मौत
हम कल नहीं मिले होते तो
ढेर सी शंकाएं मेरे मन में बनी रहतीं
अच्छा ही हुआ कि हम मिले और बातचीत की
मैंने तुझे अपना दुश्मन समझा था
आज मैं बहुत करीब महसूस कर रहा हूँ
तेरे बिना ज़िन्दगी, खूबसूरती और प्यार
काफी घुटा घुटा महसूस करता
तेरी बनाई सीमाओं में
लेकिन आज समझ रहा हूँ तेरी भलाई
तेरी अनुपस्थिति से होने वाली घुटन ने
डरा दिया मुझे, मेरी दोस्त!
तू मेरी आत्मा का दूसरा रूप, मेरा आधार
तेरे बिना क्या खूबसूरती, क्या प्यार और क्या ज़िन्दगी!
वही कर जो तू चाहती है।

Friday, December 31, 2010

कैरेक्टर्स आल्सो ब्रीद एंड फील

हम जब पढ़ रहे होते है तो अपने भौतिक जीवन के समानांतर दरअसल एक दूसरी दुनिया भी गढ़ रहे होते हैं। उस गढ़ी दुनिया में फूल, बारिशें, लोग चौराहे, दुख-दर्द सब होते हैं, और हकीकत की ही तरह जीवंत भी। मतलब ‘कैरेक्टर्स आल्सो ब्रीद एंड फील’। ‘भाषासेतु’ के इस नए स्तंभ में विश्व साहित्य के ऐसे यादगार किरदारों पर लिखे जाने की योजना है। जिसकी पहली किस्त में ‘लीविंग लीजेंड’ मार्केस के सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास ‘एकांत के सौ वर्ष’ की नायिका ‘उर्सुला’ पर लिख रहे हैं अनिल। 'अनिल' बिना लाग लपेट के सीधी बात करने वाली प्रजाति के तेज तर्रार युवा पत्रकार हैं, साहित्य से भी खासा लगाव रखते हैं। ‘नए साल की शुरुआत नई चीज़ के साथ’ करने की हमारी सोच को कार्यरूप देने में सहयोग के लिए अनिल का आभार। सभी पाठकों को ‘भाषासेतु’ की तरफ से नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।


उर्सुला : रौशन ख़यालों की बेमिसाल जिंदगी


विश्व साहित्य में ऐसे कई पात्र हैं जिनकी नायाब विशेषताएं रचना को विलक्षण बनाती हैं. पात्रों की हाज़िर जबावी पाठकों को न सिर्फ़ विस्मित करती हैं, बल्कि विपत्तियों और निपट अकेलेपन में भी जीवन के प्रति उनकी लगन देखते बनती है. भारी मुश्किल क्षणों और प्रसंगों में आप उनकी सहजता, दृढ़ता और धैर्य से मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते. पात्रों के जीवन मूल्य की ऐसी अनोखी विशेषताएं किसी रचना को यादगार बनाती हैं. इन पात्रों के ज़रिए समय और समाज के वितान को पाठक गहराई से महसूस करते हैं. ऐसे पात्र रचना को हमेशा, और कभी भी, पठनीय और प्रासंगिक बनाते हैं.

नोबल पुरस्कार से सम्मानित कोलंबिया के सर्वकालिक लेखक गैब्रियल गर्सिया मार्क्वेज़ (दोस्ताना नाम, गाबो) का उपन्यास ’एकांत के सौ वर्ष’ उनकी सर्वाधिक चर्चित रचनाओं में प्रमुख है. यह उपन्यास लैटिन अमरीका के मिथकीय आख्यानों और स्मृतियों का पुनर्लेखन है.

माकान्दों इतिहास की तारीखों में स्थापित कोई काल्पनिक नगर है जिसके संस्थापक खोसे अर्कादियो बुएनदिया साहस और खोजी मिज़ाज के धनी व्यक्तित्व हैं. उनकी चीज़ों और घटनाओं के बारे में ज्ञान हासिल करने की अलहदा ललक ने मकान्दों का एक अलग और अनन्य तेवर निर्मित किया है. मकान्दों नगर में बहुत कम समय में ही सुव्यवस्था क़ायम कर ली गई है. वहां नागरिकों के घर ऐसी जगह निर्मित किए गए जहां से सभी नदी तक पहुंच सकते हों और गलियों की क्रम व्यवस्था इस सूझ-बूझ से बनाई गई कि गर्मी के मौसम में किसी एक के घर में दूसरे से ज़्यादा धूप न आती हो. मकान्दों के संस्थापक खोसे अर्कादियो बुएनदिया के इस परिश्रमी (और कुछ मायनों में एक हद तक सनकी भी) मिज़ाज की साथी हैं, उनकी पत्नी उर्सुला इगुआरान जो ’एकांत के सौ वर्ष’में सबसे जुदा नज़र आती हैं. वह पति की अजीबोग़रीब हरकतों को सही, नियंत्रित दिशा देने के बेमिसाल काम करती हैं.

’उर्सुला की काम करने की क्षमता अपने पति जितनी ही थी. फुर्तीली, छरहरी और गंभीर, अटूट धैर्यवाली वह स्त्री, जो आजीवन एक पल भी चैन की सांस लेते नहीं देखी गई थी, अपने कामों से हर जगह मौजूद रहती. भोर से लेकर गई रात तक.’ अपने झालरदार लंहगे की हल्की सरसराहट लिए वह खोसे बुएनदिया की अजूबी हरकतों को भी परखती हैं.

खोसे अर्कादियो बुएनदिया अनजाने समुद्रों को पार करने, निर्जन प्रदेशों के दौरे करने और अपने उपकरणों के प्रयोग और संचालन में मसरुफ़ रहने वाले इंसान हैं. इन सक्रियताओं की वजह से कई बार वे पारिवारिक दायित्वों तक को भूल जाते हैं. उनके अभियानों के बारे में उर्सुला यह भलीभांति समझती है कि वे बंजारों के प्रभाव में आकर ऐसे कर रहे हैं. ये वे बंजारे थे जो कुछेक सालों के अंतराल पर मकान्दों आते और विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्रों को बजाते हुए आश्चर्यजनक खोजें दिखाने की मुनादी करते. खोसे अर्कादियो की इन बंजारों से महान उपलब्धियों वाली दोस्ती की शुरूआत होती है. और वे इनके प्रभाव में रोमांचक, असामान्य आविष्कारों की बाज़ीगरी के क़ायल हो जाते हैं और अपने घर में उनके प्रयोगों के परीक्षण दोहराने के लिए एकांत चुन लेते हैं.

उर्सुला परिवार और बच्चों के भविष्य के बारे में चिंतित है. कई दिनों की बेगानगी के बाद, अपनी खोजी यंत्रणाओं का बोझ उतारने के लिए बुएनदिया जब एक दिन बुख़ार की हालत में बच्चों के सामने अपनी खोजों का रहस्य खोलते हैं कि ’दुनिया संतरे की तरह गोल है.’ तो उर्सुला का एक और रूप देखने को मिलता है. वह धैर्य खो बैठी, ’अगर दिमाग़ ख़राब करना है तो अपना ही करो’ वह चिल्लाई, ’अपने बंजारे ख़यालात बच्चों के सिर में मत ठूंसों.’

उर्सुला को ख़ुद पर ग़ज़ब का यक़ीन है. शादी के समय उर्सुला की मां उसे अनर्थकारी भविष्यवाणियों से आतंकित कर देती है. उर्सुला अपने बलिष्ठ पति से आशंकित रहती है कि रात में कहीं वह उसका बलात्कार न कर ले. इसलिए वह विशेष तरह की मोटे कपड़े की बनी जांघियां पहन कर सोती है. जिसमें लोहे की पट्टियां लगी थीं और जिसे मोटे बकलस से कसा जा सकता था. विवाह के एक साल बाद तक उर्सुला जब कुमारी बनी रही तो लोक की सहज बुद्धि भांप लेती है कि दाल में कुछ काला है. नगर-वासी अफ़वाह उड़ाते हैं कि उर्सुला का पति नपुसंक है. खोसे शांतचित्त होकर जब उर्सुला से कहते हैं,
’देख रही हो न उर्सुला, लोग क्या बकते फिर रहे हैं’, ’बकने दो’, वह बोली, ’हम तो जानते हैं न कि सच क्या है.’

उर्सुला का नगर की महिलाओं के बीच में भी काफ़ी प्रभाव है. वह मर्दों के आसमानी ख़यालों को तुरंत भांप जाती है. होता यूं है कि खोसे अर्कादियों अपनी ख़ब्ती ईजादों में उलझे रहते हैं. समुद्री जल से घिरे होने के कारण मकान्दों के संस्थापक को एक बार भ्रम हो जाता है कि उनका नगर सब तरफ़ पानी से घिर गया है तो वे ख़ुद को दंडित महसूस करते हुए कहते हैं कि ’हम विज्ञान के लाभों का भोग किए बिना ज़िंदगी भर यहीं सड़ते रहेंगे.’

वे मकान्दो को स्थानांतरित करने की कल्पना करने लगते हैं. लेकिन ’उर्सुला उनके बेचैन मंसूबों का अंदाज़ा लगा लेती है और इसके पहले कि वे स्थानांतरण की तैयारियां शुरू कर पाते, चींटी के-से गुप्त और कठोर श्रम द्वारा उसने नगर की औरतों को अपने मर्दों की अस्थिरवृत्तिता के प्रति सचेत कर देती है. खोसे बुएनदिया को भनक तक नहीं लग पाती कि कौन सी घड़ी और किन बलाओं के चलते उनकी योजनाएं, बहानों और टालमटोल के जाल में फंसती चली गईं जब तक कि वे निरा भ्रम न साबित हो गईं.

उर्सुला संकल्प और विनम्र दृढ़ता की मिसाल है. वह ख़तरे उठाने में कई बार वह खोसे अर्कादियो से आगे जाती है. एक बार जब उसका बेटा औरलियानों खोसे अर्कादियो के दुश्मन की बेटी से प्रेम के लिए घर से भाग जाता है तो उर्सुला उसे खोज निकालने और मदद करने के लिए बिना किसी को बताए समुद्री अवरोधों को पार करने का निर्णय लेती है. ‘बूएनदिया’, ज़ाहिर सी बात है, प्रेम का खुले दिल से समर्थन नही करते लेकिन उर्सुला के संकल्प से वे अच्छी तरह परिचित है, वे अपनी जिद पर झूलते नहीं. उत्तरदायित्व और शालीनता में उर्सुला का कोई सानी नहीं. उर्सुला का अपने स्वभाव पर गंभीर नियंत्रण है. इसीलिए वह ’बुएनदिया के अतिवादी परिवार में अपनी व्यवहारिक बुद्धि बनाए रखने के लिए जूझती है और इसमें सफल होती है.’

उर्सुला की विशेषताएं खोसे अर्कादियो बुएनदिया के व्यवहार के आलोक में और स्पष्ट होती हैं. काल्पनिक नगर मकान्दों के ये संस्थापक दंपति लैटिन अमेरिकी धरती की एक जादुई सैर कराते हैं.



*किताब का नाम : एकांत के सौ वर्ष***

*लेखक : गैब्रियल गर्सिया मार्क्वेज़***

*मूल स्पेनिश से अनुवाद : सोन्या सुरभि गुप्ता***

*प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली***