Friday, February 26, 2010

शुभकामनाएं


भाषासेतु के पाठकों को हमारी तरफ से होली की अनंत शुभकामनाएं अब तक आपलोगों ने इस ब्लॉग की मार्फ़त एक बांग्ला और एक स्पैनिश कहानी पढ़ी है। जल्दी ही हम आपके समक्ष हिंदी के युवा कथाकार शशिभूषण द्विवेदी की एक कहानी लेकर उपस्थित होंगे।

Wednesday, February 10, 2010

गाब्रिएल गार्सिया मार्कस




गांव में कुछ बहुत बुरा होने वाला है
एक बहुत छोटे से गांव की सोचिए जहां एक बूढ़ी औरत रहती है, जिसके दो बच्चे हैं, पहला सत्रह साल का और दूसरी चौदह की। वह उन्हें नाश्ता परस रही है और उसके चेहरे पर किसी चिंता की लकीरें स्पष्ट हैं। बच्चे उससे पूछते हैं कि उसे क्या हुआ तो वह बोलती है - मुझे नहीं पता, लेकिन मैं इस
पूर्वाभासके साथ जागी रही हूं कि इस गांव के साथ कुछ बुरा होने वाला है।
दोनों अपनी मां पर हंस देते हैं। कहावत हैं कि जो कुछ भी होता है, बुजुर्गों को उनका पूर्वाभास हो जाता है। लड़का पूल’ खेलने चला जाता है, और अभी वह एक बेहद आसान गोले को जीतने ही वाला होता है कि दूसरा खिलाड़ी बोल पड़ता है- मैं एक पेसो की शर्त लगाता हूं कि तुम इसे नहीं जीत पाओगे।
आस पास का हर कोई हंस देता है। लड़का भी हंसता है। वह गोला खेलता है और जीत नहीं पाता। शर्त का एक पेसो चुकाता है और सब उससे पूछते हैं कि क्या हुआ, कितना तो आसान था उसे जीतना। वह बोलता है-.बेशक, पर मुझे एक बात की फिक्र थी, जो आज सुबह मेरी मां ने यह कहते हुए बताया कि इस गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है।
सब लोग उस पर हंस देते हैं, और उसका पेसो जीतने वाला शख्स अपने घर लौट आता है, जहां वह अपनी मां, पोती या फिर किसी रिश्तेदार के साथ होता है। अपने पेसो के साथ खुशी खुशी कहता है- मैंने यह पेसो दामासो से बेहद आसानी से जीत लिया क्योंकि वह मूर्ख है।
“और वह मूर्ख क्यों है?”भई! क्योंकि वह एक सबसे आसान सा गोला अपनी मां के एक एक पूर्वाभास की फिक्र में नहीं जीत पाया, जिसके मुताबिक इस गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है।आगे उसकी मां बोलती है-तुम बुजुर्गों के पूर्वाभास की खिल्ली मत उड़ाओ क्योंकि कभी कभार वे सच भी हो जाते हैं।
रिश्तेदार इसे सुनती है और गोश्त खरीदने चली जाती है। वह कसाई से बोलती है-एक पाउंड गोश्त दे दोया ऐसा करो कि जब गोश्त काटा ही जा रहा है तब बेहतर है कि दो पाउंड मुझे कुछ ज्यादा दे दो क्योंकि लोग यह कहते फिर रहे हैं कि गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है।
कसाई उसे गोश्त थमाता है और जब एक दूसरी महिला एक पाउंड गोश्त खरीदने पहुंचती है, तो उससे बोलता है- आप दो ले जाइए क्योंकि लोग यहां तक कहते फिर रहे हैं कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है, और उसके लिए तैयार हो रहे हैं, और सामान खरीद रहे हैं।
वह बूढ़ी महिला जवाब देती है- मेरे कई सारे बच्चे हैं, सुनो, बेहतर है कि तुम मुझे चार पाउंड दे दो।
वह चार पाउंड गोश्त लेकर चली जाती है, और कहानी को लंबा न खींचने के लिहाज से बता देना चाहूंगा कि कसाई का सारा गोश्त अगले आधे घंटे में खत्म हो जाता है, वह एक दूसरी गाय काटता है, उसे भी पूरा का पूरा बेच देता है और अफवाह फैलती चली जाती है। एक वक्त ऐसा जाता है जब उस गांव की समूची दुनिया, कुछ होने का इंतजार करने लगती है। लोगों की हरकतों को जैसे लकवा मार गया होता है कि अकस्मात, दोपहर बाद के दो बजे, हमेशा की ही तरह गर्मी शुरू हो जाती है। कोई बोलता है- किसी ने गौर किया कि कैसी गर्मी है आज?
लेकिन इस गांव में तो हमेशा से गर्मी पड़ती रही है। इतनी गर्मी, जिसमें गांव के ढोलकिये बाजों को टार से छाप कर रखते थे और उन्हें छांव में बजाते थे क्योंकि धूप में बजाने पर वे टपक कर बरबाद हो जाते।
जो भी हो, कोई बोलता है, इस घड़ी इतनी गर्मी पहले कभी नहीं हुई थी।लेकिन दोपहर बाद के दो बजे ऐसा ही वक्त है जब गर्मी सबसे अधिक हो।हां, लेकिन इतनी गर्मी भी नहीं जितनी कि अभी है।वीरान से गांव पर, शांत खुले चौपाल में, अचानक एक छोटी चिड़िया उतरती है और आवाज उठती है- चौपाल में एक चिड़िया है।और भय से काँपता समूचा गाँव चिड़िया को देखने आ जाती है।लेकिन सज्जनों, चिड़ियों का उतरना तो हमेशा से ही होता रहा है।हां, लेकिन इस वक्त पर कभी नहीं।
गांव वासियों के बीच एक ऐसे तनाव का क्षण आ जाता है कि हर कोई वहां से चले जाने को बेसब्र हो उठता है, लेकिन ऐसा करने का साहस नहीं जुटा पाता।मुझमें है इतनी हिम्मत, कोई चिल्लाता है, मैं तो निकलता हूं।
अपने असबाब, बच्चों और जानवरों को गाड़ी में समेटता है और उस गली के बीच से गुजरने लगता है जहां से लोग यह सब देख रहे होते हैं। इस बीच लोग कहने लगते हैं- अगर यह इतनी हिम्मत दिखा सकता है, तो फिर हम लोग भी चल निकलते हैं।और लोग सच में धीरे धीरे गांव को खाली करने लगते हैं। अपने साथ सामान, जानवर सब कुछ ले जाते हुए।
जा रहे आखिरी लोगों में से एक, बोलता है- ऐसा न हो कि इस अभिशाप का असर हमारे घर में रह सह गई चीजों पर आ पड़े .और आग लगा देता है .फिर दूसरे भी अपने अपने घरों में आग लगा देते हैं।
एक भयंकर अफरा तफरी के साथ लोग भागते हैं, जैसे कि किसी युद्ध के लिए प्रस्थान हो रहा हो। उन सब के बीच से हौले से पूर्वाभास कर लेने वाली वह महिला भी गुजरती है- मैंने बताया था कि कुछ बहुत बुरा होने जा रहा है, और लोगों ने कहा था कि मैं पागल हूं।
(इस कथा का स्पेनिश मूल से हिन्दी अनुवाद श्रीकांत का है। बाईस वर्ष के इस नौजवान ने एक डिप्लोमा कोर्स और अकूत मेहनत के सहारे स्पेनिश भाषा पर जो पकड़ हासिल की है, काबिले तारीफ है।)

Saturday, January 30, 2010



बरगद
ऋत्विक घटक
बांग्ला से अनुवाद : सुशील कान्ति

गाँव के सीवान का वह बरगद का पेड़ बहती नदी में अपना सिर झुकाए खड़ा था।
पेड़ों में वह पेड़, कुछ खास तो नहीं था।
बहुत पुराना पेड़ था, जड़ों में कीड़े लग गये थे, डालियाँ सडऩे लगी थीं। मगर किसी ज़माने में यह पेड़ ताज़ादम हुआ करता था, पर आज नहीं। यह पेड़ लोगों के किसी काम नहीं आता, मगर गाँव में आनेवाले लोग इस पेड़ को भलीभाँति पहचानते थे। वे जानते थे कि इसके बाद वाले मोड़ पर ही हारु लोहार की दुकान है और उसके बाद ही उसका गाँव शुरू हो जाता है।
साल में केवल एकबार इस पेड़ की किस्मत फिरती थी। चड़क (बंगाल का एक पारम्परिक त्यौहार)के वक्त। उस पेड़ की जड़ों में न जाने कौन आकर, तेल-सिन्दूर लगाकर चमका जाता, दूर-दराज गाँवों के लोग आ जुटते। गाँव के मैदान में मेला-सा लग जाता और वह पेड़ लोगों की नज़रों में नुमाया हो जाता। इसके बाद फिर पूरे साल वह पेड़ नदी में झुका रहता। उसके आसपास की परती पड़ी ज़मीन पर गायें चरा करतीं, वहाँ से गुज़रते पथिक उसकी शीतल छाया में बैठकर पोटली खोलते, चिउड़ा-गुड़ खाते और नदी का पानी पीकर आगे अपनी यात्रा शुरू करते। चाँदनी रातों में वह पेड़ मैदान के किनारे खड़े-खड़े अपने आगोश में अँधेरे उजाले का अद्भुत संसार रचता और कुछ ज़्यादा ही झुककर उस चंचला नदी में, न जाने कैसा एक रहस्यभरा स्वप्न देखता।
छह-छह ऋतुएँ उस पेड़ के ऊपर से गुज़र जातीं। नदी से नावों का गुज़रना जारी रहता, नावों पर सवार बच्चे अजब कुतूहल से उस पेड़ को निहारते।
छोटे-छोटे बच्चों की भी अड्डा-स्थली थी इसी पेड़ की तलहटी। पेड़ की टेढ़ी-मेढ़ी डालों पर चढ़कर बच्चे खेलते रहते। डालों से नदी में कूदते, स्कूल से भागकर यहीं जुड़ाते।
गाँव के बड़े बुज़ुर्ग अपने बचपन के दिनों से ही इस पेड़ के नीचे आकर सुस्ताया करते थे। गरमी की ढलती शाम में कोई कोई तो नदी के बिलकुल किनारे, जहाँ पेड़ की जड़ें आपस में गुत्थम-गुत्था होतीं, उस पर बैठकर नदी की कल-कल सुना करते।
वहाँ रहने वाले मछुआरों को मालूम था कि पेड़ की जड़ों में छोटी-बड़ी मछलियाँ फँसी होती हैं। उनके बच्चे स्नान करने आते तो गमछे से छानकर मछली पकड़ते। जाल में भी का$फी मछलियाँ फँसती।
बूढ़े भी इन्हें पहचानते थे। वे भी जड़ों से अपनी पीठ टिकाये इनके खेल देखते, मछुआरों का मछली पकडऩा देखते और मस्ती में अपना सिर हिलाते। शायद अपने जीवन के गाढ़े वक्तों को याद करते।
मगर वे खुद भी नहीं जानते थे कि उनके मन में इस बूढ़े बरगद का क्या स्थान है। वे तो केवल इसे बूढ़े शिव का बरगद कहते। यह हमेशा से यहीं था और रहेगा। इसका अस्तित्व बस इतना कि लोग कहते, ''हारु काका के मोड़ पार करते ही बूढ़े शिव का बरगद है।''
सम्भव था— यह पेड़ कई पीढिय़ों तक यहीं खड़ा रहता और आने वाले यात्रियों के लिए विश्राम स्थल बना रहता मगर अचानक ही एक दिन नया सरकारी फरमान आ पहुँचा। मौजूदा सिंचाई व्यवस्था को बेहतर करने के लिए नदी का पाट चौड़ा करना पड़ेगा। बस, का$फी शोरगुल के बीच अपनी मौन आपत्ति प्रकट करते हुए बूढ़े शिव का बरगद एक दिन धराशायी हो गया। नदी के दोनों किनारों को समान रूप से काटकर नये ढंग की नहर तैयार की गयी।
समूचा गाँव जैसे जाग उठा था। लोगों को उस बरगद के पेड़ का मतलब समझ में आ गया। सबके मन में विरोध का स्वर उमडऩे-घुमडऩे लगा। उन लोगों ने सस्वर आपत्ति भी प्रकट की।
मगर उनका विरोधी स्वर भिनभिनाहट बनकर रह गया। पेड़ को आखिर धराशायी होना ही था...। धीरे-धीरे उस बरगद की याद गाँव वालों के मन से भी विलुप्त होने लगी। नये चेहरे, नये मकान, सब कुछ नया-नया था। बस गाँव के बूढ़े जब वहाँ से गुज़रते तो नदी का किनारा उन्हें बेहद वीरान-सा लगता। इसकी व्याख्या वे लोग अपने हाथ-पाँव हिला-हिलाकर नयी पीढिय़ों से करते। ये उनकी चर्चा का नया विषय बन गया था।
पर, आखिर कितने दिन!
इतने दिनों तक वह बरगद लोगों को विश्राम का सुख देते देते आज सबके मन-मस्तिष्क से बेआवाज अन्तर्धान हो चुका है।
sushil kanti
Mob- 06868303104, email: sushil.kanti@gmail.com

Wednesday, January 27, 2010

Transformation







सुप्रकाश नाथ पिछले २० सालों से चित्रकारी कर रहे हैं, मूल रहनवारी पश्चिम बंगाल के उत्तर २४ परगनास में, फिलहाल दिल्ली में डेरा । (पता - 77A, प्रथम तल, हरिनगर आश्रम, दिल्ली-14, मो, 09911079473 ) यहाँ प्रदर्शित हैं उनके कुछ चित्र -

Wednesday, January 20, 2010

ब्लॉग है लोकतंत्र का पांचवां स्तम्भ


अखबार को अगर लोकतंत्र का चौथा खम्भा माना जाता है तो आज के बदले युगीन सन्दर्भों में ब्लॉग को लोकतंत्र का पांचवां खम्भा माना जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह मानना है प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह का। अभी हाल ही में महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की अलाहाबाद इकाई ने 'ब्लौगिंग' पर राष्ट्रीय स्तर के सेमीनार का आयोजन किया। इस अवसर पर नामवर जी के साथ विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय भी उपस्थित थे। साथ ही देश के भिन्न भिन्न हिस्सों से तकरीबन पैंतीस ब्लौगर भी आये हुए थे। दो दिवसीय इस आयोजन में 'हिंदी : ब्लॉग विचार अभिव्यक्ति का नया माध्यम', 'अन्तर्जाल पर हिंदी भाषा और साहित्य' एवं 'ब्लॉग का तकनीकी पक्ष' जैसे विषयों पर विचार किया गया।

हिंदी ब्लौगरों के लिए निश्चित रूप से इसे एक खुशखबरी के तौर पर लिया जाना चाहिए, कि ब्लॉग को अब मुख्यधारा के साहित्यकारों ने गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है।

Tuesday, January 19, 2010

कामरेड को अंतिम लाल सलाम


भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष कामरेड ज्योति बसु का जाना एक किंवदंती का मिट जाना है। पिछले दो दिनों से हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों में पोलिटिकल स्पेक्ट्रम की ओर से ज्योति बसु को जितनी श्रद्धांजलियां दी जा रही हैं, ज़ाहिर है कि उनका क़द क्या था! आप अगर उनकी विचारधाराओं से इत्तेफाक न भी रखते हों, तो भी उनके जाने से उपजे शून्य का एहसास आपको ज़रूर होगा।
कामरेड बसु की अनुपस्थिति को महसूस करने का अपना एक राजनीतिक अर्थ है। भारतीय राजनीति पिछले कुछ दशकों से जिस स्खलन का शिकार हुई है, और ऐसे समय में वे अपने जिन गुणों के लिए जाने जाते थे, उनके जाने का क्या ये अर्थ है कि भारतीय राजनीति से उन गुणों की भी विदाई हो चुकी। याद करें, एक बार उन्होंने कहा था- 'आई एम नाट अ जेंटलमैन, आई एम अ कम्युनिस्ट।' आज कितने लोग हैं जो अपने वजूद से अपनी विचारधारा को चस्पां कर सकें। जहाँ तक उनके व्यक्तित्व का सवाल है, उनके जैसे जेंटलमैन भी भारतीय राजनीति में कम हुए।
एक तरफ तो ये, दूसरी तरफ उनके बारे में कई ऎसी चीजें भी मशहूर हैं जो एक राजनीतिज्ञ के लिए अवांछित हैं। पिछले तीस सालों में बंगाल की राजनीति का जिस तरह से अपराधीकरण हुआ, उसकी शुरुआत ज्योति बाबू के कार्यकाल में ही हुई। कई मिल-कारखाने बंद हुए, और कलकत्ते की उपमा एक 'सिंकिंग शिप' से दी जाने लगी। सरकारी महकमे में कार्य क्षमता में लगातार गिरावट और ट्रेड यूनियन की ज्यादतियों के लिए भी ज्योति बाबू का कार्यकाल ही दोषी है।
फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि विपक्षी एकता को संचालित-संयमित करने में जो भूमिका साठ के दशक में लोहिया और सत्तर के दशक में जे पी ने निभायी थी, वही भूमिका १९७७ से २००३ तक ज्योति बाबू की रही।
ज्योति बाबू का जाना निश्चित रूप से भारतीय राजनीति की एक अपूर्णीय क्षति है।

Monday, January 18, 2010

बोधि


कुमार अनुपम की कविता

अपना ही डमी हूँ
कि
आदमी हूँ।




বোধি

আমি আমারই ডামী

কেননা

আমী মানুষ.


(অনুবাদ : পিঙ্কি মাহাতো)