Friday, December 31, 2010

कैरेक्टर्स आल्सो ब्रीद एंड फील

हम जब पढ़ रहे होते है तो अपने भौतिक जीवन के समानांतर दरअसल एक दूसरी दुनिया भी गढ़ रहे होते हैं। उस गढ़ी दुनिया में फूल, बारिशें, लोग चौराहे, दुख-दर्द सब होते हैं, और हकीकत की ही तरह जीवंत भी। मतलब ‘कैरेक्टर्स आल्सो ब्रीद एंड फील’। ‘भाषासेतु’ के इस नए स्तंभ में विश्व साहित्य के ऐसे यादगार किरदारों पर लिखे जाने की योजना है। जिसकी पहली किस्त में ‘लीविंग लीजेंड’ मार्केस के सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास ‘एकांत के सौ वर्ष’ की नायिका ‘उर्सुला’ पर लिख रहे हैं अनिल। 'अनिल' बिना लाग लपेट के सीधी बात करने वाली प्रजाति के तेज तर्रार युवा पत्रकार हैं, साहित्य से भी खासा लगाव रखते हैं। ‘नए साल की शुरुआत नई चीज़ के साथ’ करने की हमारी सोच को कार्यरूप देने में सहयोग के लिए अनिल का आभार। सभी पाठकों को ‘भाषासेतु’ की तरफ से नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।


उर्सुला : रौशन ख़यालों की बेमिसाल जिंदगी


विश्व साहित्य में ऐसे कई पात्र हैं जिनकी नायाब विशेषताएं रचना को विलक्षण बनाती हैं. पात्रों की हाज़िर जबावी पाठकों को न सिर्फ़ विस्मित करती हैं, बल्कि विपत्तियों और निपट अकेलेपन में भी जीवन के प्रति उनकी लगन देखते बनती है. भारी मुश्किल क्षणों और प्रसंगों में आप उनकी सहजता, दृढ़ता और धैर्य से मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते. पात्रों के जीवन मूल्य की ऐसी अनोखी विशेषताएं किसी रचना को यादगार बनाती हैं. इन पात्रों के ज़रिए समय और समाज के वितान को पाठक गहराई से महसूस करते हैं. ऐसे पात्र रचना को हमेशा, और कभी भी, पठनीय और प्रासंगिक बनाते हैं.

नोबल पुरस्कार से सम्मानित कोलंबिया के सर्वकालिक लेखक गैब्रियल गर्सिया मार्क्वेज़ (दोस्ताना नाम, गाबो) का उपन्यास ’एकांत के सौ वर्ष’ उनकी सर्वाधिक चर्चित रचनाओं में प्रमुख है. यह उपन्यास लैटिन अमरीका के मिथकीय आख्यानों और स्मृतियों का पुनर्लेखन है.

माकान्दों इतिहास की तारीखों में स्थापित कोई काल्पनिक नगर है जिसके संस्थापक खोसे अर्कादियो बुएनदिया साहस और खोजी मिज़ाज के धनी व्यक्तित्व हैं. उनकी चीज़ों और घटनाओं के बारे में ज्ञान हासिल करने की अलहदा ललक ने मकान्दों का एक अलग और अनन्य तेवर निर्मित किया है. मकान्दों नगर में बहुत कम समय में ही सुव्यवस्था क़ायम कर ली गई है. वहां नागरिकों के घर ऐसी जगह निर्मित किए गए जहां से सभी नदी तक पहुंच सकते हों और गलियों की क्रम व्यवस्था इस सूझ-बूझ से बनाई गई कि गर्मी के मौसम में किसी एक के घर में दूसरे से ज़्यादा धूप न आती हो. मकान्दों के संस्थापक खोसे अर्कादियो बुएनदिया के इस परिश्रमी (और कुछ मायनों में एक हद तक सनकी भी) मिज़ाज की साथी हैं, उनकी पत्नी उर्सुला इगुआरान जो ’एकांत के सौ वर्ष’में सबसे जुदा नज़र आती हैं. वह पति की अजीबोग़रीब हरकतों को सही, नियंत्रित दिशा देने के बेमिसाल काम करती हैं.

’उर्सुला की काम करने की क्षमता अपने पति जितनी ही थी. फुर्तीली, छरहरी और गंभीर, अटूट धैर्यवाली वह स्त्री, जो आजीवन एक पल भी चैन की सांस लेते नहीं देखी गई थी, अपने कामों से हर जगह मौजूद रहती. भोर से लेकर गई रात तक.’ अपने झालरदार लंहगे की हल्की सरसराहट लिए वह खोसे बुएनदिया की अजूबी हरकतों को भी परखती हैं.

खोसे अर्कादियो बुएनदिया अनजाने समुद्रों को पार करने, निर्जन प्रदेशों के दौरे करने और अपने उपकरणों के प्रयोग और संचालन में मसरुफ़ रहने वाले इंसान हैं. इन सक्रियताओं की वजह से कई बार वे पारिवारिक दायित्वों तक को भूल जाते हैं. उनके अभियानों के बारे में उर्सुला यह भलीभांति समझती है कि वे बंजारों के प्रभाव में आकर ऐसे कर रहे हैं. ये वे बंजारे थे जो कुछेक सालों के अंतराल पर मकान्दों आते और विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्रों को बजाते हुए आश्चर्यजनक खोजें दिखाने की मुनादी करते. खोसे अर्कादियो की इन बंजारों से महान उपलब्धियों वाली दोस्ती की शुरूआत होती है. और वे इनके प्रभाव में रोमांचक, असामान्य आविष्कारों की बाज़ीगरी के क़ायल हो जाते हैं और अपने घर में उनके प्रयोगों के परीक्षण दोहराने के लिए एकांत चुन लेते हैं.

उर्सुला परिवार और बच्चों के भविष्य के बारे में चिंतित है. कई दिनों की बेगानगी के बाद, अपनी खोजी यंत्रणाओं का बोझ उतारने के लिए बुएनदिया जब एक दिन बुख़ार की हालत में बच्चों के सामने अपनी खोजों का रहस्य खोलते हैं कि ’दुनिया संतरे की तरह गोल है.’ तो उर्सुला का एक और रूप देखने को मिलता है. वह धैर्य खो बैठी, ’अगर दिमाग़ ख़राब करना है तो अपना ही करो’ वह चिल्लाई, ’अपने बंजारे ख़यालात बच्चों के सिर में मत ठूंसों.’

उर्सुला को ख़ुद पर ग़ज़ब का यक़ीन है. शादी के समय उर्सुला की मां उसे अनर्थकारी भविष्यवाणियों से आतंकित कर देती है. उर्सुला अपने बलिष्ठ पति से आशंकित रहती है कि रात में कहीं वह उसका बलात्कार न कर ले. इसलिए वह विशेष तरह की मोटे कपड़े की बनी जांघियां पहन कर सोती है. जिसमें लोहे की पट्टियां लगी थीं और जिसे मोटे बकलस से कसा जा सकता था. विवाह के एक साल बाद तक उर्सुला जब कुमारी बनी रही तो लोक की सहज बुद्धि भांप लेती है कि दाल में कुछ काला है. नगर-वासी अफ़वाह उड़ाते हैं कि उर्सुला का पति नपुसंक है. खोसे शांतचित्त होकर जब उर्सुला से कहते हैं,
’देख रही हो न उर्सुला, लोग क्या बकते फिर रहे हैं’, ’बकने दो’, वह बोली, ’हम तो जानते हैं न कि सच क्या है.’

उर्सुला का नगर की महिलाओं के बीच में भी काफ़ी प्रभाव है. वह मर्दों के आसमानी ख़यालों को तुरंत भांप जाती है. होता यूं है कि खोसे अर्कादियों अपनी ख़ब्ती ईजादों में उलझे रहते हैं. समुद्री जल से घिरे होने के कारण मकान्दों के संस्थापक को एक बार भ्रम हो जाता है कि उनका नगर सब तरफ़ पानी से घिर गया है तो वे ख़ुद को दंडित महसूस करते हुए कहते हैं कि ’हम विज्ञान के लाभों का भोग किए बिना ज़िंदगी भर यहीं सड़ते रहेंगे.’

वे मकान्दो को स्थानांतरित करने की कल्पना करने लगते हैं. लेकिन ’उर्सुला उनके बेचैन मंसूबों का अंदाज़ा लगा लेती है और इसके पहले कि वे स्थानांतरण की तैयारियां शुरू कर पाते, चींटी के-से गुप्त और कठोर श्रम द्वारा उसने नगर की औरतों को अपने मर्दों की अस्थिरवृत्तिता के प्रति सचेत कर देती है. खोसे बुएनदिया को भनक तक नहीं लग पाती कि कौन सी घड़ी और किन बलाओं के चलते उनकी योजनाएं, बहानों और टालमटोल के जाल में फंसती चली गईं जब तक कि वे निरा भ्रम न साबित हो गईं.

उर्सुला संकल्प और विनम्र दृढ़ता की मिसाल है. वह ख़तरे उठाने में कई बार वह खोसे अर्कादियो से आगे जाती है. एक बार जब उसका बेटा औरलियानों खोसे अर्कादियो के दुश्मन की बेटी से प्रेम के लिए घर से भाग जाता है तो उर्सुला उसे खोज निकालने और मदद करने के लिए बिना किसी को बताए समुद्री अवरोधों को पार करने का निर्णय लेती है. ‘बूएनदिया’, ज़ाहिर सी बात है, प्रेम का खुले दिल से समर्थन नही करते लेकिन उर्सुला के संकल्प से वे अच्छी तरह परिचित है, वे अपनी जिद पर झूलते नहीं. उत्तरदायित्व और शालीनता में उर्सुला का कोई सानी नहीं. उर्सुला का अपने स्वभाव पर गंभीर नियंत्रण है. इसीलिए वह ’बुएनदिया के अतिवादी परिवार में अपनी व्यवहारिक बुद्धि बनाए रखने के लिए जूझती है और इसमें सफल होती है.’

उर्सुला की विशेषताएं खोसे अर्कादियो बुएनदिया के व्यवहार के आलोक में और स्पष्ट होती हैं. काल्पनिक नगर मकान्दों के ये संस्थापक दंपति लैटिन अमेरिकी धरती की एक जादुई सैर कराते हैं.



*किताब का नाम : एकांत के सौ वर्ष***

*लेखक : गैब्रियल गर्सिया मार्क्वेज़***

*मूल स्पेनिश से अनुवाद : सोन्या सुरभि गुप्ता***

*प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली***

Thursday, December 16, 2010

निजार कब्बानी की कविताएँ

मनोज पटेल के सौजन्य से निजार कब्बानी की ये कवितायेँ। हम हिंदीपाठियों के लिए एक खुशखबरी बतौर मनोज ने कब्बानी की किताब 'On Entering The Sea' का अनुवाद पूरा कर लिया है, जो शीघ्र प्रकाश्य है।

साथ ही साथ पाठकों के लिए एक सूचना भी : अब से ‘भाषासेतु’ पर कोई भी पोस्ट सप्ताह में एक बार ‘बुधवार’ के दिन लगाई जाएगी। इस सिलसिले की पहली कड़ी (श्रीकांत द्वारा अनूदित) गार्सिया लोर्का की कविताएँ होंगी।



दुनिया की उत्पत्ति का एक नया सिद्धांत

एकदम शुरूआत में...... फातिमा थी सिर्फ
उसके बाद बने तत्व सभी
आग और मिट्टी
पानी और हवा
और फिर आए नाम और भाषाएँ
गरमी और बसंत ऋतु
सुबह और शाम
फातिमा की आँखों के बाद ही
खोजी गई दुनिया सारी,
राज काले गुलाब का
और फिर...... हजारों सदियों के बाद
आईं दूसरी औरतें.
* *



फातिमा

फातिमा खारिज करती है उन सभी किताबों को संदिग्ध है जिनकी सच्चाई
और शुरू करती है पहली पंक्ति से
वह फाड़ डालती है पुरुषों द्वारा लिखी सभी पांडुलिपियों को
और अपने स्त्रीत्व की वर्णमाला से करती है शुरू.
फेंक देती है वह अपने स्कूल की किताबों को
और पढती है मेरे होंठों की किताब में.
छोड़कर धूल भरे शहरों को
पानी के शहरों को चली आती है नंगे पाँव मेरे पीछे-पीछे.
प्राचीन रेलगाड़ियों से बाहर कूद
बोलती है मेरे साथ समुन्दर की जुबां
तोड़कर अपनी रेतघड़ी
ले चली जाती है मुझे समय से परे.

Thursday, December 02, 2010

सूरज की कविता : मेरे खरीददार


मौसम ने, जबकि समूचे उत्तर भारत को अपनी ठंडी हथेलियों से सहलाना शुरू कर दिया है, ऐसे में प्रेम की सुख(!)दायी ऊष्मा से लबरेज, सूरज की यह कविता। सूरज हमारे समय के कितने महत्वपूर्ण कवि हैं, इसे उनकी रचनाओं से ही जाना जा सकता है. ‘तहलका’ के बहुचर्चित साहित्य विशेषाँक तथा ‘साखी’ के ताजे अंक के अलावा उनकी कविताएँ ‘नयी बात’ और ‘सबद’ पर प्रकाशित हो चुकी हैं।

मेरे खरीददार


(किसी ढाबे से रात का खाना पैक करा रही सुन्दरतम युवती के लिये, जो उस दरमियान तन्दूर के पास खड़ी अपने कोमल हाथ सेंक रही है और शर्तिया मुझे याद कर रही है, जबकि मैं हूँ कि वहीं हूँ – उसी तन्दूर में..)

तुमने मेरी कीमत नींद लगाई थी
जो स्वप्न हमने देखे वो सूद थे
जब स्वप्न चूरे में बिखर गया
तुमने मुझे समुद्र के हाथों बेच दिया

मेरी स्त्री!
बिकना मेरे भाग्य का अंतिम किनारा रहा
पर तुम ऐसा करोगी इसका भान नहीं था,
लगा तुम गुम हो गई हो
किसी बिन-आबादी वाले इलाके में

मैने समुद्र से लड़ाई मोल ली
उसे पराजित किया
तुम्हारे लिये तोड़ लाया समुद्र से चार लहरें
जैसे मैं जानता था तुम्हारे सलोने
वक्षों को होगा इन लहरों का इन्तजार

तब,
मेरी स्मृतियों को औने पौने में खरीद
तुमने मुझे बर्फ को बेच दिया
जो तुम्हारी लम्बी उंगलियों के
पोरों की तरह ठंढी थी

बर्फ के लिये मैं बेसम्भाल था
उसने मुझे पर्वत को बेच दिया
पर्वत ने शाम को
शाम ने देवदार को
देवदार ने पत्थरों को
और पत्थरों ने मुझे नदी को बेच दिया

स्मृतिहीन जीवन के लिये धिक्कारते हुए
नदी ने मुझे पाला अपने गर्भ की मछलियों,
एकांत,
और शीतल आसमान के सामियाने के सहारे

नदी को आगे बहुत दूर जाना था
उसने मुझे कला को बेच दिया
मात्र एक वादे की कीमत पर

कला के पास रोटी के अलावा देने के लिये सबकुछ था
कला ने साँस लेने की तरकीब सिखाई
फाँकों में सम पर बने रहने का सलीका
और तुम्हे याद कर सकूँ इसलिये कविता सिखाई

अनुपलब्ध रोटी के लिये कला उदास रहती थी
उसने विचार से सौदा किया
और जो मौसम उन दिनों था
उस मौसम ने विचार के कान भरे
विचार ने मुझे अच्छाईयों का गुलाम बनाना चाहा
मैने यह शर्त अपने पूरेपन नामंजूर की

मेरे इंकार पर विचार ने मुझे गुलाम
बताकर बाज़ार को बेच दिया

बाजार ने मुझे रौँदा
शत्रु की तरह नही
मिट्टी की तरह और ऐसा करते हुए
वो आत्मीय कुम्हार की धोती बान्धे था
जिसमें चार पैबन्द थे

चार पैबन्द से
चार लहरों की स्मृति मुझे वापस मिली
जिसकी सजा में बाजार ने
मेरा सौदा आग से कर लिया

बाजार को कीमत मिली और
मुझे अपने नाकारा नहीं होने का
इकलौता सबूत

तब मुझे तुम्हारी बहुत याद आई

आज शाम जब आग मुझे
तन्दूर में सजा रही थी
मैं तुम्हे याद कर रहा था

उपलों के बीच तुम्हारी याद सीझती रही
सीझती रही
सीझती रही...

जिसकी आंच में सिंक रहे थे
तुम्हारे कोमल हाथ
और सिंक रही थीं
तुम्हारे लिये रोटियाँ
..................................................................



प्रस्तुति : श्रीकांत


Monday, November 29, 2010

बंगाल की कविता

(मिहिर सरकार की कविता बाघ। मिहिर सरकार का जन्म १० नवम्बर १९५३ को हुआ था. अबतक उनके ७ काव्य संग्रह और कहानियों की किताब भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका संपर्क सूत्र : ०९८३०३४७८७५)

बाघ

हो सके तो बाघ पालिए
घर में अगर बाघ हो तो देनदार नहीं आते
तंग नहीं करते छोटे-मोटे जानवर
नाप-तौलकर, हंसकर बातें करेंगे
शत्रु-मित्र सभी

इसीलिए अब बाघ पाल सकते हैं
समाज के सारे बघा ऐसे ही जीते हैं.

अनुवाद : सुशील कान्ति

Wednesday, November 24, 2010

निकानोर पार्रा की कवितायेँ

चिली के अनिवार्य कवि निकानोर पार्रा की इन चार कविताओं का अनुवाद 'मनोज पटेल' का है। मनोज ने थोड़े ही समय में अनुवाद की दुनिया में एक अच्छा मुकाम हासिल कर लिया है। अनुवादों में भाव को मूल कथ्य के बेहद करीब तक पहुंचाते हुए, उनकी कड़ी मेहनत साफ़ झलकती है। दूसरी अनेक भाषाओं से बहुतेरी रचनाओं के अनुवाद के लिए मनोज का ब्लॉग http://www.padhte-padhte.blogspot.com देख सकते हैं।

निकानोर पार्रा के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस
हाइपर लिंक पर क्लिक करें।



ताकीद



अगर यह चुप्पी को पुरस्कृत करने का मामला है
जैसा कि यहाँ मुझे लग रहा है
तो किसी और ने नहीं बनाया है खुद को इतना काबिल
सबसे कम फलदायी रहा हूँ मैं
सालों साल छपाया नहीं कुछ भी


आदी मानता हूँ खुद को
कोरे कागजों का
उसी जान रुल्फो की तरह
जिसने लिखा नहीं उससे ज्यादा एक भी लफ्ज़
जितना कि था बहुत जरूरी.
* *


शांतिपूर्ण रास्ते पर आस्था नहीं मेरी


हिंसक रास्ते पर आस्था नहीं है मेरी
होना चाहता हूँ किसी चीज पर आस्थावान
लेकिन नहीं होता
आस्थावान होने का मतलब है आस्था ईश्वर में

ज्यादा से ज्यादा
झटक सकता हूँ अपने कंधे
माफ़ करें मुझे इतना रूखा होने की खातिर
मुझे तो भरोसा नहीं आकाशगंगा में भी.
* *


पखाने पर मक्खियाँ


इन कृपालु सज्जन से - पर्यटक से - क्रांतिकारी से
करना चाहता हूँ एक सवाल :
क्या देखी है कभी आपने मक्खियों की एक सेना
पखाने के ढेर पर चक्कर लगाती
उतरती फिर काम को जाती पखाने पर ?
क्या देखी हैं आपने पखाने पर मक्खियाँ आज तक कभी ?


क्योंकि मैं पैदा और बड़ा हुआ
पखाने से घिरे घर में मक्खियों के साथ.
* *


ईश्वर से प्रार्थना


परमपिता जो विराजते हैं स्वर्ग में
हैं तरह-तरह की मुश्किलों में
त्योरी से तो लगता है उनकी
कि हैं वो भी एक आम इंसान.
ज्यादा फ़िक्र न करें आप हमारी प्रभु.


हमें पता है कि हैं आप कष्ट में
क्योंकि घर अपना व्यवस्थित नहीं कर पा रहे आप.


पता है हमें कि शैतान नहीं रहने देता आपको चैन से
बरबाद कर देता है आपकी हर रचना को.


वो हंसता है आप पर
मगर रोते हैं हम आपके साथ.


परमपिता आप जहां हैं वहां हैं
गद्दार फरिश्तों से घिरे.
सचमुच
हमारे लिए कष्ट मत उठाइए ज्यादा.
आखिर समझना चाहिए आपको
कि अचूक नहीं होते ईश्वर
और हम माफ़ कर देते हैं सबकुछ.





Sunday, November 21, 2010

गौरव सोलंकी की कविताएँ


अभिव्यक्ति की राह में, शब्द दर शब्द, दूर से दूर तक की यात्राओं को सहज ही पूरा करते चलने वाले विरले कवि हैं गौरव सोलंकी। बिलकुल नया कवि होना इनके परिचय में कहा जाने वाला दूसरा वाक्य है। कहानियाँ भी लिखते हैं। 'भाषासेतु' पर उनकी दो कवितायें... जिनमें से एक, ‘सौ साल फिदा’, उनके पहले काव्य संग्रह का भी नाम होने जा रहा है। ‘सौ साल फिदा’ की पांडुलिपि लगभग तैयार है। भाषासेतु की तरफ से गौरव को ढेर सारी शुभकामनाएँ....

सौ साल फ़िदा

तुम अचानक अँधेरे का बटन दबाओ
पट्टियाँ उतारो, पहनो कपड़े
हम अपने भविष्य पर न फेंके चबे हुए नाखून
देर से जगें तो पछताएं नहीं
इधर कुछ दिन, जब भूख उतनी पुख़्ता नहीं लगती
हम दीवारों में सूराख करना सीखें
एक रंग पर होना सौ साल फ़िदा
एक ज़िद पर रहना आत्मघाती होने की हद तक कायम

जब मैं तुम्हारे बारे में बता रहा होऊँ
तब मेरी आँखें खुली रहें
मैं पानी मांगूं और हंसूं, खनखनाऊं
फिर मांगूं पानी, भर लूं आँख
और रोशनी हो जब डरने के नाटक के बीच
तब हम किसी फ़साद में अपने नामों के साथ मारे जा रहे हों
नाम चिढ़ाने के हों तो बेहतर है
शहादत महसूस हो ग़लतफ़हमी की तरह
जैसा उसे अक्सर बताया जाता है
बच्चों को बचाने के इंतज़ाम करते हुए न चला जाए सारा बचपना
दर्द इतना ही हो कि ख़त्म हो जाए कहानियों में
पिंजरे इतने छोटे पड़ें कि पैदा होते ही उनसे खेला जा सके बस
शहर इतने बड़े हों, लोग इतने ज़्यादा कि उम्र बीते उन्हें भुलाने में
बर्फ़ इतनी थोड़ी हो कि उसे माँगते हुए झगड़े हों, पहले मिन्नतें और शर्म आए
शरबत की ख़्वाहिश में कटे पूरा जून
नहर के किनारे बैठी हो मौत
उसकी उम्मीद में तकते हुए लड़कियाँ
हम अपना डरपोक होना जानें
खिड़कियों की नाप लेते हुए
जरूरी है कि हम खुलकर साँस ले रहे हों
जब जीतें तो हौसले की बातें न करें

करोड़ों साल बाद की किसी रेलगाड़ी की सुबह के चार बजे
काँपते हुए सर्दी, बाँधते हुए बिस्तर
याद आएं तुम्हारे सोने के ढंग

सोना आदत न बने।



उसके पीछे हमारी पागल गायें

हम सुबह से सोचते थे कि मारे जाएंगे

बिजली भागती थी
उसके पीछे हमारी पागल गायें
और इस तरह हम अनाथ होते थे
बाड़ में कुछ फूल उग आए थे
जिनका नाम रखा गया इंदिरा गाँधी के नाम पर
होते गए हमारे नाक बन्द मरते गए डॉक्टर
एक गाली लगातार तैरती थी क्रिकेट मैचों के बीच
मेरी बहन ने पहले हमारे खेल देखना
फिर रस्सी कूदना छोड़ा
खुले दरवाजे से बिस्किट खाते हुए आए पिता
और पीली दीवार के सामने फेरे हुए
जिस पर से शाहरुख ख़ान की तस्वीर सुबह हटाई गई थी
मुझे लगी थी भूख और सारी तस्वीरें उदास आईं
एलबम बाँधकर हमने सोचा कि तीन हजार में खरीदा जा सकता था कूलर
बाद में तीन अच्छी लड़कियों की एक-एक रात
पहले कभी पिताजी के लिए नौकरी
या कभी भी साढ़े चार पुलिस वाले

शोर जब खूब होता था
मैंने तुम्हारे गले पर रखा अपना चुभने वाला हाथ
और यूँ तुम्हारी आवाज को खा गया बिल्कुल मासूम

पापा जब बिस्किट खरीद रहे थे खुश
तब मैंने खोला था दरवाजा
और तुम बन्द हो गई थी
हम सबने शुरु से तय किया था
कि तुम्हारी हर चिट्ठी पढ़ा करेंगे
खूब था गोंद और खोलकर चिपकाते थे

उत्सव हुआ जैसे थी आदत
फिर पीछे फूल और चांदी फेंकी गई
जब सब लौटे
तब दूर से हमें रोते हुए दिखाई देना था

वीडियो कैसेट में हम गोरे लग रहे थे
नए थे गाने

Monday, November 15, 2010

बनारस : होर्खे लुइस बोर्खेस की कविता!



दर्शन के लिये दृश्य की भौतिक मौजूदगी कतई अनिवार्य नहीं. बल्कि कल्पना के सहारे भी उसका विधान किया जा सकता है. और द्रष्टा जब ‘समय और भूगोल’ से परे के समय और भूगोल को देख सकने की सलाहियत रखता हो, तो यथार्थ के दृश्य और कल्पना के दृश्य के बीच भेद की गुंजाइश ऐसे ही न्यूनतम हो जाती है. बनारस शहर पर, लिखने वालों ने यूँ तो बहुत कुछ लिखा है, वहाँ रहकर और वहाँ से जाकर भी, लेकिन बोर्खेस ने यह कविता उस बनारस पर लिखी है, जिसे उन्होंने अपनी आँखों से कभी नही देखा...

बनारस

कोई भ्रम, कोई तिलिस्म
जैसे आईने में उगता किसी उपवन का बिंब,
इन आँखों से अदेखा
एक शहर, शहर मेरे ख्वाबों का,
जो बटता है फासलों को
रेशों से बटी रस्सी की मानिंद
और करता रहता है परिक्रमा
अपने ही दुर्गम भवनों की.

मंदिरों, कूडे के पहाडों, चौक और कारागारों तक से
अंधेरे को खाक करती
चटकार धूप
चढ आती है दीवारों के ऊपर तक
और चमकती रहती है
पावन नदी के छ्ल छल पानी में.

गहरी उसाँसें भरता शहर,
जो बिखेर देता है समूचे क्षितिज पर
सितारों का घना झुंड,
नींद और चहलकदमी से सनी
एक उनींदी सुबह में
रोशनी उसकी गलियों को
खोलती है
मानो खोलती हो अपनी बाहें.

ठीक तभी उठता है सूर्य,
पूर्व में देखती चीजों के कपाट पर
डालता है अपने उजाले की दृष्टि.
मस्जिदों के शिखर से उठती अजान
हवा को गंभीर बनाती
करने लगती है जय-जयकार
एकांत के देवता की
अन्यान्य देवों के उस नगर में।

(और जबकि मैं खेल रहा हूँ
उसके अस्तित्व की ख़ालिश कल्पनाओं से,
वह शहर अब भी आबाद है
दुनिया के तयशुदा कोने में,
अपने निश्चित भूगोल के साथ
जिसमें मेरे सपनों की तरह भरे लोग हैं,
और हैं अस्पताल, बैरक और पीपल के छाँव वाली
सुस्त गलियाँ
और पोपले होंठों वाले लोग भी
जिनके दाँत हमेशा कठुआए रहते हैं)।


प्रस्तुति तथा (मूल स्पैनिश से) अनुवाद : श्रीकांत दुबे

Thursday, November 11, 2010

उपन्यास अंश

देह
मिलान कुन्देरा
अनुवाद : कुणाल सिंह

मिलान
कुन्देरा मेरे प्रिय उपन्यासकार रहे हैं। पिछले दिनों उनके शुरुआती उपन्यासों में से ए Immortility को फिर से पढ़ रहा था। मिलान में ऐसा क्या है जो उन्हें जितनी बार पढ़ो मन नहीं भरता। वे ए ऐसे लेख हैं जिनसे मुझे ईर्ष्या होती है। मार्केस, काल्विनो भी मुझे पसन्द हैं, नये लेखकों में रोबेर्तो बोलान्यो (हालाँकि यदि वे होते तो पचास पार कर गये होते) का भी जवाब नहीं, लेकिन रश्क सिर्फ कुंदेरा से होता है। ‘इम्मॉर्टैलिटी’ वस्तुत: दो बहनों एग्नेस और लॉरा की हानी है, जो सगी होते हुए भी स्वभाव के दो अतिछोरों पर खड़ी हैं। पेश है इस उपन्यास का एक छोटा सा अंश। प्रसंगवश, इस अंश के शुरुआती हिस्से में दाली दम्पती का जो वर्णन है, मुझे बारहाँ उस पगले बंगाली संत की याद दिलाता है जो श्री रामकृष्ण परमहंस के समकालीन थे और माँ काली के अनन्य भक्त। वे कहते थे कि काली से वे इतना प्रेम करते हैं कि उनका जी करता है वे काली को खा जाएँ— ‘ए बार काली तोमाय खाबो।’
यारो, मेरा भी मन
करता है कि मैं कुंदेरा को मार कर खा जाऊँ। कसम से...
कुणाल सिंह

अपने बुढ़ापे में मशहूर चित्रकार सल्वादोर दाली और उसकी बीवी गाला ने एक खरगोश को पाला। कुछ ही दिनों में वह खरगोश दाली दम्पती से काफी घुल-मिल गया, उन्हीं के बिस्तर में सोता, वे जहाँ कहीं जाते पीछे-पीछे लग लेता। पति-पत्नी भी उससे बहुत प्यार करते थे, बल्कि कहें कि उनकी जान बसती थी उस खरगोश में।
एक बार लम्बे अरसे के लिए उन्हें कहीं बाहर जाना था। रात में सोने से पेश्तर उनके बीच इस बात को लेकर देर तक बहस हुई कि इस दौरान खरगोश का क्या किया जाए। उसे साथ लिये जाना मुश्किल था और उतना ही मुश्किल यह भी था कि इस बीच के लिए उसे किसी और को सिपुर्द कर दिया जाए, क्योंकि अजनबियों के साथ उस खरगोश की क्या हालत होती थी, पति-पत्नी से यह छिपा न था। दूसरे दिन निकलने से पहले गाला ने भोजन तैयार किया। निहायत ही सुस्वाद भोजन था और दाली ने खूब चाव से खाया। इस बात का उसे बाद में पता चलना था कि वह जो खा रहा है, कुछ और नहीं उसी खरगोश का गोश्त है। जब गाला ने बताया, वह मेज़ से उठकर बाथरूम की तरफ भागा, कै करने लगा। सामने बेसिन में उस अजीज खरगोश के चन्द लोथड़े पड़े थे।
दूसरी तरफ गाला खुश थी। वह खुश थी कि उसने जिस खरगोश को इतना प्यार दिया था, उस लाडले ने कहीं और नहीं, अन्तत: उसके पेट में शरण पायी। अब वह खुद उसकी देह का हिस्सा है, अमर्त्य होकर शिराओं-धमनियों में उसके लहू के साथ बहता हुआ, उसके हृदय में धड़कता हुआ। कहना न होगा, गाला के लिए प्यार की इससे बढ़कर और कोई तृप्ति न थी कि जिसे प्यार किया जाए उसे खा लिया जाए, पूरी तरह अपने अमाशय में पचा लिया जाए। दो देहों का यह जो एकमेक होना था, उसे फिलवक्त वैसे ही गुदगुदा रहा था जैसे वह संसर्ग कर रही हो।
लॉरा का स्वभाव गाला की तरह था, जबकि एग्नेस की तबीयत दाली से मिलती-जुलती थी। यह ठीक था कि लोगों से मिलना, बातें करना, दोस्ती इत्यादि की शमूलियत एग्नेस की पसन्द में थी, लेकिन वह सोचती थी कि एक बार अगर किसी व्यक्ति से उसकी प्रगाढ़ता हो गयी तो इस मैत्री की पूर्वशर्त है कि आइन्दा वह उस व्यक्ति की सेवाटहल करे, मसलन उसे उसकी बहती हुई नाक को पोंछना होगा। इसलिए वह इस झंझट से दूर ही रहना चाहती थी। दूसरी तरफ लॉरा के लिए यह सब सहज स्वीकार्य था। वह देह को, अपनी और उस ‘दूसरे’ की देह को नकारना नहीं जानती थी। वह एग्नेस से पूछा करती थी : जब तुम्हें कोई आकर्षित करे तो तुम्हारे लिए इसका क्या मतलब होगा? ऐसी भावनाओं को महसूस करते वक्त तुम देह को, देह की शर्तों को क्यों दरकिनार कर देती हो? एक व्यक्ति, जिसकी देह की स्मृतियों को तुम पूरी तरह से मिटा दो, वह एक व्यक्ति के तौर पर आखिर कितना बचा-खुचा रह सकेगा?
हाँ, लॉरा एकदम गाला की तरह थी। वह अपनी देह को अपनी पहचान में शामिल रखती थी। देह उसके लिए एक घर था जहाँ उसकी आत्मा की रहनवारी होती थी और वह बखूबी जानती थी कि आईने के आगे खड़े होने से उसमें जो अक्स दिखता है, महज उतने भर के आयतन में ही देह नहीं होती, देह जितनी बाहर छलकी पड़ रही होती है उतनी भीतर भी धँसी हुई। इसी वजह से उसकी दैनन्दिन बातचीत में आंगिक प्रत्ययों और सन्दर्भों की भरमार होती है। अगर उसे कहना हो कि गयी रात उसे उसके प्रेमी ने निराश किया तो वह कहेगी कि वह मेरे अंग-अंग में आग लगाकर चला गया। यहाँ तक कि वह अक्सर उल्टी या दस्त के बारे में बेधड़क बातें छेड़ देती, भले (एग्नेस को लगता था) उसे उन दिनों उल्टियाँ आती हों या नहीं। उल्टी आये या नहीं, क्या फर्क पड़ता है! लॉरा के लिए कै करने के बारे में कहना कै करने की सचाई का मुहताज नहीं, उसके लिए यह ‘तथ्य’ नहीं, ‘काव्य’ है, एक रूपक है, उसकी पीड़ा और घृणा जैसी भावनाओं की एक प्रगीतात्मक छवि है।
एक बार दोनों बहनें एक दुकान में गयीं जहाँ उन्हें अपने लिए कुछ अधोवस्त्र खरीदने थे। एग्नेस ने देखा कि लॉरा उस ब्रेसरी को बहुत दुलार से सहला रही है जिसे दुकान पर बैठी हुई औरत दिखा रही थी। यह उन कुछ दुर्लभ क्षणों में से एक था जब एग्नेस को, उसकी बहन और उसमें क्या अन्तर है, प्रत्यक्षत: दिख जाता है। एग्नेस के लिए ब्रेसरी एक ऐसी चीज है जिसका आविष्कार औरतों की देह में किसी कुदरती कमी को दुरुस्त करने के लिए हुआ है— मसलन घाव के लिए बैंडेज या किसी लँगड़े के लिए नकली पाँव, मसलन नजर का चश्मा या गरदन में मोच आने के बाद लोगों द्वारा पहना जाने वाला मोटा कॉलर। एग्नेस यह मानती थी कि ब्रेसरी को महज इसलिए पहनना चाहिए कि वे उस अंग को सँभाले रखे जो भूलवश अपना प्राकृतिक आकार विद्रूप कर चुका है, ठीक वैसे जैसे किसी गलत तरीके से निर्मित परछत्ती को सँभाले रखने के लिए मेहराबों की जरूरत पड़े।
देह के मामले में एग्नेस को अपने पति पॉल से ईर्ष्या होती थी। पुरुष होने के नाते उसे दफ्फातन अपनी देह की फिक्र में जुते नहीं रहना पड़ता था। वह बेलौस अपने फेफड़ों में साँसें भरता था, जम्हुआई लेता था, कहें खुशी-खुशी अपनी देह को भूले रहता था। न ही एग्नेस ने उसके मुँह से कभी सुना कि उसे कोई शारीरिक तकलीफ है। उसका स्वभाव भी कुछ ऐसा था कि वह बीमारी को किसी शारीरिक अपूर्णता की तरह लेता था। वर्षों से उसके पेट में अल्सर था लेकिन एग्नेस को इस बाबत तब पता चला जब एक दिन उसके दुआर पर एम्बुलेंस आकर रुका। एग्नेस को प्रतीत होता था कि यद्यपि इस मामले में पॉल को दूसरे मर्दों के बनिस्पत अपवाद माना जाए, फिर भी उसका यह ‘अभिमान’ बहुत कुछ जतला देता है कि एक मर्द और स्त्री की देहों के विभेद क्या और कैसे हैं! एक स्त्री अपनी दैहिक तकलीफों के बारे में अक्सर बतियाती रहती है, उसे यह वरदान नहीं मिला कि एक क्षण के लिए भी वह अपनी देह को बिसार सके। वय:सन्धि से ही इस चौकन्नेपन की शुरुआत हो जाती है जब पहली बार अपनी देह का खून उसे लिजलिजे सन्दर्भ से रिसता दिखता है। वहीं से देह अपनी विकरालता के साथ उसके समक्ष उपस्थित हो जाता है और उसकी हालत उतनी ही दयनीय हो उठती है जितनी किसी उस मरियल मजदूर की हो जिसे अकेले ही एक कारखाना चलाने के लिए छोड़ दिया जाए। हर महीने पट्टियों को बदलते रहना, गर्भ निरोधक गोलियों को निगलना, ब्रेसरी को सुव्यवस्थित रूप से गाँठना, बच्चे जनने के लिए तैयार होना। शायद इसी वजह से एग्नेस बूढ़े लोगों को ईर्ष्या की नजरों से देखती है। उसे लगता है कि बूढ़े किसी और जहान में रहते हैं। खुद उसके पिता बढ़ती उम्र के साथ अपनी ही प्रतिछाया में सिमट कर रह गये थे। यह किसी भौतिक का अभौतिक में रूपान्तरित हो जाना था, यह कुछ वैसे था जैसे दुनिया में एक आत्मा विचर रही हो जिससे उसकी देह का विसर्जन हो चुका हो। इसके विपरीत, औरतें जैसे-जैसे बुढ़ाती जाती है वैसे-वैसे उनकी आत्मा में देहतत्त्व और से और चस्पाँ होता जाता है। उसकी देह भारी और बोझिल होती जाती है—जैसे कोई पुराना कारखाना अपनी विनष्टि के कगार पर है और विडम्बना देखिए कि खुद उस औरत को किसी केयरटेकर की मानिन्द उस कारखाने का समूल उजडऩा देखना होता है—अन्त तक।

Monday, November 08, 2010

हिंदी कविता


विपिन चौधरी
हिंदी की चर्चित युवा कवयित्री। दिल्ली में रहनवारी। मीडियाकर्मी। 'भाषासेतु' पर पहली बार प्रकाशित हो रही हैं।


एक रिश्ता

एक रिश्ता जिसके पायदान पर कदम रखने से ही तस्वीर अपना पुराना अक्स खोने लगी
निश्चित समय के बाद वह रिश्ता डसने लगा बार- बार
हर बार जैसे मैं अजगर के मुँह से घायल हो कर बाहर निकली

बदलाव से इंकार करते हुये मै बदली
ठीक वैसे ही जैसे
पानी में जमा धूल-मिटटी तलछटी में जमा हो जाती है
मेरा भीतर भी पाक-साफ हो कर
मुझे मरियम की तरह बेधडक हो कर
जीना एक बार तो सीख ही गयी

इंसान बनने की प्रक्रिया में
किसी रिश्ते ने शैतान बनने पर मजबूर किया
तो किसी ने देवत्व की राह दिखाई
सिर्फ आदमी ही रिश्ते बना सकता है
यह धारणा पक्की होने से पहले ही धूमिल हो गयी
जब पेड-पौधों, हवा-पानी से भी बेनाम सा रिश्ता सहजता से बना
इसी क्रम में सबसे नज़दीक का रिश्ते को सबसे दूर जाते हुए भी देखा

एक रिश्ता जो हमने बडे मनोयोग से बनाया
उनमें नमक कुछ ज्यादा था
जब वो रिश्ता टूटा
तो दिल में ही नहीं, आँखों तक में
नमक उतर आया

जिन रिश्तों में खाली जगह थी
झाडियाँ बेशुमार उग आयी
बारिश के मोसम मै खरपतवारें बढती गयी
और हमारे नजदीक आने की संभावना
कम होती गई

एक वक्त था जब मैं रिश्ते जोड सकती थी
आज सिर्फ तोड सकती हूँ
सावधानी वश कुछ पुराने रिश्ते
दीमक और सीलन से बचने के लिये धूप में सुखाने के लिये रख दिए
और कुछ को दुनिया की टेढी नज़र से बचाने के लिये ऐयर टाईट डिब्बे में कस के बंद कर दिये

रिश्तो की इसे उहापोह में
एक अनोखे रिश्ते की डोर मेरे हाथ से छूट कर पंतग की तरह आसमान में जा अटकी
उसी को तलाशती मै आज तक आकाश मै गोते लगा रही हूँ।

Sunday, November 07, 2010

गाब्रिएल गार्सिया मार्केस

1) कोई भी इस लायक नहीं होता जिसकी वजह से तुम्हारी आँखों में आंसू आ जाएँ। जो इस लायक हैं वे कभी भी तुम्हारी आँखों को आंसुओं से भरने नहीं देंगे।

2) वह जो ज्यादा इंतज़ार करता है, उसे उतनी ही कम अपेक्षाएँ पालनी चाहिए।

3) शादी के साथ सबसे बड़ी दिक्क़त यह है कि यह रोजाना रात में सम्भोग के बाद ख़त्म हो जाती है और हमें रोजाना सुबह नाश्ते से पहले उसे शुरू करना पड़ता है।

4) मैं ईश्वर में यकीन नहीं करता, बल्कि उससे डरता हूँ।

5) किस्सागोई की शुरुआत तब हुई जब एक बार जोनस घर लौटा और अपने तीन दिन बाद लौटने की सफाई में उसने अपनी पत्नी से कहा कि उसे एक व्हेल ने निगल लिया था।

6) अनिवार्यता के पास किसी कुत्ते का चेहरा होगा।


मिलान कुन्देरा

1) प्रेम हमारे उस अर्धांग की तलाश है जिसे हमने कहीं गुमा दिया था।

2) शक्ति के विरुद्ध आदमी का संघर्ष वस्तुतः भूल गए के विरुद्ध याद आने का संघर्ष है।

3) देखे जाने की मधुर अनुपस्थिति को हम चाहें तो एकांत कह सकते हैं।

4) शारीरिक संसर्ग हिंसा के बगैर संभव नहीं।

5) सुख हमेशा दुहराव का आकांक्षी होता है।

इतालो काल्विनो

1) झूठ का निवास शब्दों में नहीं, चीज़ों में होता है।

2) मैं इस उद्घोषणा के साथ इस शाम की शुरुआत करना चाहता हूँ : फैंटेसी एक ऐसी जगह का नाम है जहाँ बारिश होती है।

हारुकी मुराकामी

1) सुनो- ऐसा कोई युद्ध नहीं जो दुनिया के तमाम युद्धों को ख़त्म कर सके।

2) सुबह की रौशनी हमारे आसपास की समस्त चीज़ों को विखंडित कर देती है।

3) समुद्र और आकाश के बीच क्या अंतर है, यह कहना बहुत कठिन है।

4) व्हिस्की, किसी सुन्दर स्त्री की तरह आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती है, इसलिए पीने से पहले आपको उसे कुछ देर तक निहारना चाहिए।

Monday, October 25, 2010

सुधांशु फिरदौस की कवितायेँ!

सुधांशु हिंदी के उभरते युवा कवियों में से हैं. अब तक उनकी कुछ ही कविताएँ प्रकाशित हुई हैं. फिलहाल वे दिल्ली में रहते हैं और जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के अंतर्गत कंप्यूटर साइंस में स्नातकोत्तर के छात्र हैं. यहाँ उनकी कुछ कविताएँ...

दवा

दुःख के आकाश में
प्यार का चीरा लगा के
उम्मीद ने पूछा -
अब, कैसा लग रहा है?..


बाज़ार

मैं उड़ रहा हूँ
आसमाँ में,
तू निगल रहा है जमीं पे
मेरी परछाई!

अकेलापन

रात
में
रेत
पे
लेट
के
प्यास
ने
सोचा,
दिन
कितना अच्छा होता है...


उम्मीद

शहतीर से टंगी लालटेन
रात भर जलती रहती है

उसी उम्मीद की तरह
जो छोड़ आया था,
तुम्हारी आँखों में
आखिरी बार...

फ़रिश्ता

उसे पता था
वह कभी नहीं आएगा

फिर भी उसने, उसके आने की अफवा फैलाई
ताकि उम्मीद जिन्दा रहे!

पता

मै वहाँ नहीं रहता
जिस घर का पता मेरे पहचान पत्र में लिखा है
मै वहाँ भी नहीं रहता जहां से ये पंक्तियाँ लिखी जा रही है
मै कहाँ रहता हूँ
यह कोई नहीं जानता
खुद मैं भी नहीं।

दोस्ती

औंधे मुँह लेटे आकाश ने
सीधे मुँह लेटे आदमी से कहा -
‘कितने अकेले हो तुम?’
...
एक फुसफुसाहट हुई -
‘तुम भी तो...’
और दोनों हँसने लगे।

Thursday, October 21, 2010

शुभ समाचार


'भाषासेतु' के दोस्तों को बताते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है कि आज के बाद इस ब्लॉग के दो नहीं, तीन सम्पादक होंगे। हमारे तीसरे साथी हैं श्रीकांत दुबे। श्रीकांत मूलतः कवि हैं। उन्होंने इधर कुछ कहानियां भी लिखी हैं, जो 'तद्भव', 'नया ज्ञानोदय' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपी हैं, चर्चित-प्रशंसित हुई हैं। अभी हाल में ही उन्हें भोपाल में कहानी पाठ के लिए भी आमंत्रित किया गया था। श्रीकांत का एक अवदान और है कि वे मूल स्पैनिश से अनुवाद का काम भी कर लेते हैं। आशा है, श्रीकांत के इस ब्लॉग से जुड़ने के बाद 'भाषासेतु' में गतिशीलता आएगी, जिसका अभाव पिछले कुछ समयों से देखने को मिल रहा है।
कुणाल सिंह

Friday, September 17, 2010

हिंदी कविता


कुणाल सिंह
नोकिया 6300

नाईन एट थ्री वन जीरो...

मैंने जोर से सटा लिया कानों पर और सुनने लगा
रिंग टोन
जैसे कम्बल में लिपटी आवाज़
गझिन, गर्म-गुदाज़
सुदूर बजती जाने कौन से स्वर में
सचमुच की आवाज़ के बदले, तब तक के लिए
आवाज़ की प्रतिकृति- हैलो ट्यून
तब तक के लिए उतावली प्रतीक्षा में एक तुतलाता ढाढस

तब तक के लिए घिर आते हैं बादल
अपने अक्ष पर दौड़ते दौड़ते थम जाती है पृथ्वी
एक चिड़िया का चहचहाना रुक जाता है कहीं
कहीं एक फूल का खिलना स्थगित हो जाता है तब तक के लिए
ट्रैफिक की बत्ती पीली है और अब तक अवरुद्ध सा कुछ
मचल पड़ता है खुल पड़ने को, चारों तरफ
मेरी सांस तेज तेज चलती है
शिराओं-धमनियों में दौड़ता है लहू तेज तेज
रोमकूपों में समा जाते हैं रोमांच के छोटे छोटे दाने अनगिन

यह सब एकदम शुरू शुरू का होना है
ऊपर के सख्त परत के एक बार हटते ही
गरगर बहने लगता है भीतर का तरल
लेकिन यह हर बार का होना है, ऐसे ही
हर बार का यह प्रतीक्षित, रुका सा
हर बार ऐसे ही पुनर्नवा

एकाएक चुकने लगेंगे सारे शब्द, सारी ध्वनियाँ, अर्थ सारे
भाषा का पृष्ठ जैसे कोरा हो चलेगा एकाएक
पृथ्वी नयी नकोर

अभी थोड़ी देर में
छटेंगे यही बादल
यहीं से निकलेगा जाना पहचाना सूरज रोज का
यहीं से विकसेगी सभ्यता, संतति के बीज अन्खुवायेंगे यहीं से
अभी थोड़ी देर में शुरू होगा सब, फिर से
एक भाषा का निर्माण होगा
और पहली बार हव्वा कहेगी आदम से
भाषा का पहला पवित्र शब्द- हैलो!


नाटक
सियालदह से लास्ट लोकल के छूटने में अभी देर है
खिड़की वाली सीट पर बैठे बैठे रमापद
सो गया है या केवल सोने का नाटक करता है कौन जाने

1989 में जब रमापद छोटा था
मोहल्ले के लोगों के बीच बहुत फेमस था
लोग कहते थे कालोशशि तुम्हारा छोटा लड़का
क्या ही खूब नाटक करता है मरने का
जान डाल देता बस!
दुर्गापूजा में बारीपाडा हाईस्कूल माठ में
नाटक खेला जाता था तो रमापद को
रोल दिया जाता था मरने का
कालोशशि तब मन ही मन जरूर डर जाती थी
लेकिन उसे और भी ज्यादा डर लगता था रमापद के बाप हरिपद से
अपनी छाती से सटाकर कहती थी क्या बताऊँ रमा
तुम्हारे बाप की अंतड़ी में दो घूँट शराब के पड़ते ही
वह जैसे शैतान का रूप धर लेता है
वास्तव में रमापद का बाप हरिपद शैतान था
या शैतान होने का नाटक करता था कौन जाने

1989 नहीं रहा, रमापद का बाप
हरिपद कभी का मर गया ज़हरीली शराब से
कालोशशि भी एक बार मर ही गयी थी लेकिन
फिर यह कहकर जी उठी कि रमापद की शादी हो जाये
बहू का मुंह देख ले फिर मारेगी चैन से
अभी कौन सी लास्ट लोकल छूटी जा रही है- हाँ तो!
यही सब सोचता है रमापद नींद में
खिड़की वाली सीट पर बैठकर

रमापद की बीवी मुनमुन ने
लौकी की डंठल और रोहू की एक साबुत मूडी डालकर
दाल बनायीं है क्या ही स्वादिष्ट
पोस्ते का दाना भूनेगी रोटी सेंकेगी गरमागरम
रमापद के आ जाने के बाद
रमापद की बीवी मुनमुन
लौकी कि डंठल और रोहू की मूडी डली दाल बनाकर
'स्वीट ड्रीम्स' कढ़े तकिये पर सर रखकर
सो गयी है या सोने का नाटक करती है कौन जाने

1989 में मुनमुन ने प्रेम किया था
नागा घोष के मंझले लड़के सन्नी देओल से
मोहल्ले में क्या ही हो-हल्ला मचाया था मुनमुन के बाप सुमन सरकार ने
स्कूल से पीठ पर बस्ता टाँगे लौटती मुनमुन को
अपनी साईकिल के कैरियर पर बिठाकर
भाग चलने को कहा था सन्नी देओल ने बहुत दूर सूरत को जहाँ
उसका ममेरा भाई राजू नौकरी करता था किसी कपड़ा मिल में
रिजर्वेशन, कोर्ट मैरिज, जेरोक्स, एसटीडी कॉल-
उस उम्र में मुनमुन डर के मारे थर थर कांपने लगी थी यह सब सुनकर
'जमाने की दीवार', 'अरमान', 'मियां-बीवी राजी',
'दो दिलों का बिछड़ना सदा सदा के लिए', 'बर्दाश्त से बाहर'
और अपनी बांहों की मछलियाँ दिखाने के बाद भी निराश
साईकिल के कैरियर पर बिठाकर
छोड़ गया था सन्नी देओल उसे उसके बाप के घर
कई दिनों तक रोती-सुबकती रही थी मुनमुन
सन्नी देओल के बनाए दिल और उसमें बिंधे तीर को देख देख
कई दिनों तक सुनती रही थी लोगों के बोल-
साली नाटक करती है!

1989 नहीं रहा, नागा घोष सुमन सरकार मर-खप-बिला गए
सन्नी देओल बहुत दूर सूरत में, या कि दिल्ली में
नौकरी करता है या नौकरी का नाटक कौन जाने
यही सब सोचती है रमापद कि बीवी मुनमुन
'स्वीट ड्रीम्स' कढ़े तकिये पर सर रखकर सोते हुए

हुर्र हुर्र भागती है लास्ट लोकल
रमापद खटखटाता है घर का दरवाज़ा
खूब चाव से खाता है रमापद, मुनमुन के
हाथ के बने खाने की तारीफ़ करता है खूब
बिस्तर पर पड़ते ही सो जाता है, आधी रात
झकझोड़कर जगाती है मुनमुन रमापद को
1989 1989 1989 -हुर्र हुर्र भागता है 1989
खूब प्यार करती है मुनमुन रमापद को- देर तक।

Saturday, August 07, 2010

असहमति पत्र

पिछले दिनों, हिंदी पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित एक साक्षात्कार के प्रसंग में असहमतियों के बिन्दुओं पर सैद्धांतिक विचार विमर्श की बजाय व्यक्तिगत विद्वेष और अतिचार अमर्ष की अभिव्यक्ति साहित्यिक बहस की मर्यादा का उल्लंघन कर रही है। साक्षात्कार में उपयुक्त आपत्तिजनक शब्दों की हम भर्त्सना करते हैं, फिर भी संपादक और लेखक द्वारा खेद प्रकट करने के बावजूद कुछ रचनाकारों द्वारा एक संचार पत्र समूह विशेष में लगातार गरिमाहीन आक्रमण से हम सभी रचनाकार क्षुब्ध अनुभव कर रहे हैं और अपनी असहमति व्यक्त कर रहे हैं।
हस्ताक्षर
1 महाश्वेता देवी
2 अमरकांत
3 रामदरस मिश्र
4 शहरयार
5 काजी अब्दुसत्तार
6 महीप सिंह
7 पद्मा सचदेव
8 नित्यानंद तिवारी
9 चित्रा मुद्गल
10 मत्स्येन्द्र शुक्ल
11 ममता कालिया
12 कन्हैयालाल नंदन
13 राजी सेठ
14 अखिलेश
15 आलोकधन्वा
16 अजय तिवारी
17 मधु कांकरिया
18 द्रोणवीर कोहली
19 अ अरविंदाक्षण
20 दिनेश कुमार शुक्ल
21 कुणाल सिंह
22 यू के एस चौहान
23 उपेन्द्र कुमार
24 गंगा प्रसाद विमल
25 सतीश जमाली
26 कृष्णा अग्निहोत्री
27 प्रियदर्शन मालवीय
28 सौमित्र
29 से रा यात्री
30 मधुर कपिला
31 शम्भू गुप्त
32 नवारुण भट्टाचार्य
33 बुद्धिसेन शर्मा
34 मनोरमा विस्वाल महापात्र
35 मनोरमा दीवान
36 मीरा सीकरी
37 यश मालवीय
38 बलदेव बंशी
39 अशोक त्रिपाठी
40 मनोज कुमार पाण्डेय
41 प्रियंकर पालीवाल
42 राजेंद्र राजन
43 बलराम
44 ज्ञान प्रकाश विवेक
45 पंकज सुबीर
46 राकेश मिश्र
47 विनोदिनी गोयनका
48 एहतराम इस्लाम
49 संजय कुंदन
50 भारत भारद्वाज
51 सुशील सिद्धार्थ
52 प्रदीप सौरभ
53 प्रांजल धर
54 गजाल जैगम
55 कुमार अनुपम
56 वाजदा खान
57 फूल चन्द मानव
58 राजेंद्र राव
59 वंदना मिश्र
60 साधना अग्रवाल
61 दयानंद पाण्डेय
62 बोधिसत्व
63 बद्रीनारायण
64 नीरजा माधव
65 सूरज पालीवाल
66 नरेन्द्र मोहन
67 विमल चन्द्र पाण्डेय
68 गौरव सोलंकी
69 श्रीकांत दुबे
70 मीनाक्षी जोशी
71 विजेंद्र नारायण सिंह
72 केशुभाई देसाई
73 मेवाराम
74 दीपक शर्मा
75 आभा बोधिसत्व
76 कृष्ण कुमार सिंह
77 नीलम शंकर
78 नेहा चौहान
79 राज कुमार राकेश
80 रामबीर सिंह
81 अरुणेश नीरन
82 विजय शर्मा
83 कमलनयन पाण्डेय
84 विजय काका
85 हरीश नवल
86 राज मणि त्रिपाठी
87 बरखा पुंडीर
88 अनय
89 हिमांशु
90 मिथिलेश कुमार
91 बिमलेश त्रिपाठी
92 रविन्द्र आरोही
93 पराग मांदले
94 अशोक मिश्र
95 संदीप मधुकर सपकाले
96 सीमा रावत
97 ध्यानेन्द्र मणि त्रिपाठी
98 डॉ सौम्य शास्वत
99 राहुल सिंह
100 प्रो सुवास कुमार
101 महेश्वर
102 राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय
103 पंकज मिश्र
104 विवेक निराला
105 चारुलता
106 श्रुति
107 ज्योतिष पायेंग
108 मनोज चौधरी
109 अवधेश मिश्र
110 महावीर राजी
111 चन्द्र प्रकाश पाण्डेय
112 विजय शंकर चतुर्वेदी
113 जितेन्द्र चौहान
114 अंशुल त्रिपाठी
115 बहादुर पटेल
116 हितेंद्र पटेल
117 रूपा गुप्ता
118 शैलेश कदम
119 नीलेश ठाकुर
120 अनिल जनविजय
121 श्रीप्रकाश शुक्ल
122 भालचंद्र जोशी
123 हृदयेश मयंक
124 नासिर अहमद सिकंदर
125 भास्कर लाल कर्ण
126 बसंत त्रिपाठी
127 अरुण प्रकाश मिश्र
128 रमण मिश्र
129 धीरज शंकरवार
130 राहुल चौहान
131 महीधर सिंह चौहान
132 अशोक सिंह
133 नरेन्द्र सैनी

Thursday, July 29, 2010

बंगला कविता

एक ज़माने पहले जब स्नातकोत्तर का विद्यार्थी हुआ करता था, कुछ दोस्तों ने मिलकर कविता की एक पत्रिका निकाली थी- 'कविताई' के नाम से। सीमित संसाधनों में सिर्फ चार अंक तक ही यह पत्रिका निकली। लेकिन इन चार अंकों में हिंदी के लगभग सभी जाने माने कवियों की कविताएँ उसमें शामिल हुईं। त्रिलोचन शास्त्री, कुंवर नारायण, विनोदकुमार शुक्ल, अनामिका, अरुण कमल, प्रयाग शुक्ल, मंगलेश डबराल से लगाकर पवन करण, प्रेम रंजन अनिमेष, आर चेतनक्रांति आदि न जाने कितने कवि। याद पड़ता है, इस पत्रिका में अनूदित कविताओं के लिए 'अंतर' नाम से एक कॉलम हुआ करता था, जिसमें पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, बंगलादेश के कुछ कवियों की कविताओं का अनुवाद भी प्रकाशित हुए थे। शुरूआती तीन अंकों का सम्पादन मैंने ही किया था, अंतिम अंक (तब किसे पता था कि यह अंतिम अंक होगा) के वक़्त मैं साहित्य मासिक 'वागर्थ' से जुड़ गया था, तो इसका सम्पादन युवा कवयित्री विजया सिंह ने किया।
आज जब अपने कुछ पुराने दस्तावेजों को उलट पुलट रहा था तो 'कविताई' का चौथा अंक मिला। पृष्ठ २४ पर बंगला के बुद्धदेब दासगुप्ता की दो कविताएँ देखीं। मेरी एक दोस्त हुआ करती थी- नबारूणा भट्टाचार्य। उसी ने इन कविताओं का सुन्दर अनुवाद किया है। इससे पहले भी आप बुद्धदेब की कविताएँ पढ़ चुके हैं। आइए एक बार फिर से उन्हें पढ़ते हैं। - कुणाल सिंह

बुद्धदेब दासगुप्ता
अनुवाद : नबारुणा भट्टाचार्य

एकान्य महाकाश
बोसपुकुर, पति के घर से मुर्दाघर
जब तुम्हें ले जाया गया
बेला, तुम्हारी उम्र तब सत्ताईस से
घटते घटते पहुंची है सत्रह में
शांत पृथ्वी अद्भुत सुन्दर बन
खिल गयी है तुम्हारी देह में।
गोद में लिए हुए तुम्हारी बेटी को
हरिपद के मन से लोभ अभी गया नहीं।
सोच रहा है
मुंह पर तकिया दबाकर तुम्हें मार डालने से पेश्तर
क्यों नहीं भोग लिया तुम्हारी देह को आखिरी बार!
अस्सी साल का बाप हरिपद का-
निमाई मल्लिक भी सोचता है यही
पुत्रवधू बेला का तजा शरीर।

जानता है हरिपद
कुछ नहीं होगा उसे, वह
चलाता है गाड़ी मंत्रीजी कि
मंत्रीजी के लिए औरत से लेकर माल तक का
वही करता है इन्तेजाम
जुलूस में काकद्वीप से लोगों के जुगाड़ का
वोटों की फुहार का
नोटों के अम्बार का- सभी सभी।

हरिपद के बिना कुछ नहीं सधता, यहाँ तक कि
कुसुम भी नहीं हिलती एक पग
कुसुम से ब्याह रचा लेना अब उसकी मुट्ठी में है
लेकिन केवल चार दिन पहले आई है कुसुम की छोटी बहन
अपनी दीदी के पास, नहीं देखा था हरिपद ने
उसे पहले कभी।
वह हंसी थी उस दिन
नज़रें बचाकर सबसे
और तभी से सोचने लगा है वह सब नए सिरे से।

क्या करे हरिपद
हरिपद क्या करे
यदि कुसुम भी बेला की तरह
'वैनिश...?'
गुनगुनाते हैं मंत्रीजी, हरिपद गुनगुना रहा है
चल रही है गाड़ी तूफ़ान मेल की तरह
रिक्त करते हुए गाँव का कण कण
सब उठाते चलते हैं तारे
दौड़ रहे हैं सब पीछे पीछे गाडी के
और गुनगुना रहे हैं सब
पीछे पीछे, पीछे पीछे।
पृथ्वी से छिटक कर निकल रही है पृथ्वी
किसी एक अन्य महाकाश में
धीरे धीरे, धीरे धीरे।

रात
नींद में लथपथ निखिल। उड़ चली निखिल की पत्नी खिड़की खोलकर
तारों के पास। तारों ने अचंभित होकर जानना चाहा- नाम क्या है?
निखिल की पत्नी बोली- तारा।
सुबह हुई। निखिल दौड़ा बाज़ार। दौड़ा दफ्तर। ट्यूशन। नाटक
के रिहर्सल और देर बाद खाना खाकर पड़ रहा बिस्तर पर।
आधी रात, हडबडाकर उसकी नींद टूटी। देखा, उसका सारा मुंह-गाल
भीग रहा है जल में। वक्ष पर न जाने कब उडती हुई तारा
आकर सो गयी थी।
तारा की देह का नीर, निर्झर बन निखिल पर बरस रहा है
अविराम।

बंगाल से कुछ फोटोग्राफ्स











ये फोटोग्राफ्स पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के अंतर्गत कल्याणी शहर के निवासी श्री संदीप सहा के कैमरे से हैं। संदीप पिछले १५ सालों से फोटोग्राफी कर रहे है। हम उनके और कुछ फोटोग्राफ्स समय समय पर देते रहेंगे।
संदीप सहा
मोब 09836789775




Tuesday, July 20, 2010

स्पहानी कविता


फेदेरिको गार्सिया लोर्का
अलविदा

बीच चौराहे पर
कहूंगा
अलविदा
चल निकलने के लिए
अपनी आत्मा की रहगुजर।

स्मृतियों और बीत चुके कठिन दौर को
जगाता हुआ
पहुचूंगा
अपने (सफेद से)
उदास गीत के
छोटे से बगीचे में
और कांपने लगूंगा
भोर के तारे जैसा।

भाषासेतु के लिए इस कविता का खासतौर से अनुवाद किया है युवा कवि कथाकार श्रीकांत दुबे नेकविता का अनुवाद कितना कठिन होता है, ये कौन नहीं जानता, तिस पर श्रीकांत मूल स्पहानी से अनुवाद का कार्य करते हैं. तस्वीर लोर्का की है

Friday, June 25, 2010

दूसरे सीजन के सपने
रघुराई जोगड़ा
(रघुराई की यह कविता कलकत्ता से प्रकाशित होनेवाली एक पत्रिका "निशान" में छपी थी.
युवा कवि, कहानी भी लिखते रहते हैं.
फिलहाल भारतीय भाषा परिषद् में नौकरी करते हैं )

तब हम किसान थे
हम बो देते थे
खेतों में अपने जीवन के
तमाम रंगीन सपने
और बरसात की पहली फुहार में
अंखुआ जाते थे, वे
रंगीन सपने,

तब हम खेतों से भागते
आते थे घर
और बैलों को सनी
चलाती पत्नी के कानों में
कह देते थे चुपके से
अन्खुआये सपनों की बात
(किसी अत्यंत गोपनीय रहस्य की तरह)
और हमारे बच्चे, एक दूसरे की
आँखों में झांक कर
समझ जाते थे सबकुछ
वे मुस्कुराते हुए पीठ पर पटरी लादे
चल देते थे पाठशाला.

फिर कुछ दिनों बाद
हमारे लहलहाते हरे सपनों को
मार जाते पाला, सूखा या बाढ़
और हम चुपके से
रात में घर आकर ओसारे में
निढाल पड़ जाते थे.
पत्नी जान जाती थी
हमारे सपनों के मरने की बात
बच्चे सुबह चले जाते थे
भटठा पर ईंट पाथने
पत्नी बबुआनों की गरूआरी में
और हम कलकत्ता,
दूसरे सीजन के सपनों की तलाश में

Monday, June 14, 2010

हिंदी कविता


मंजुलिका पाण्डेय

'भाषासेतु' के हमारे दोस्तों को याद होगा, अभी हाल ही में हमने युवा कवयित्री-कथाकार मंजुलिका पाण्डेय की दो कविताएँ प्रकाशित की थीं। इस बीच 'नया ज्ञानोदय' के युवा पीढ़ी विशेषांक में मंजुलिका की एक कहानी 'उस दिन' प्रकाशित हो चुकी है। एक बार फिर मंजुलिका की दो कविताएँ यहाँ दी जा रही हैं। प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं।


कही अनसुनी

एक दूसरे के कन्धों पर झुके
हम तुम हैं बिलकुल पास पास
(लगता सचमुच ऐसा ही है देखकर)
एक दूसरे के कानों में बोलते हुए
बिलकुल एक जैसे लगते शब्द
मैं सोचता हूँ...
तुम थाम रहे हो मेरे शब्द
और कर रहे हो अर्थों की बुनाई

तुम्हें लगता है मैं पी रहा हूँ तुम्हारे शब्द
और भर रहा हूँ उसके भावों से
पर...
एक सी आवाज़ एक सी ध्वनि, एक से अक्षरों वाले
शब्दों की भाषा ऐसी
कि मेरे लिए तुम्हारे शब्द
सिर्फ एक आकारहीन चित्र
तुम्हारे लिए मेरे शब्द
सिर्फ एक शोर।

नयी फसल
हवा में टंगे हुए धड
उड़ रहे हैं
फर्लांग रहे हैं सीमायें
जूझ रहे हैं खूब
हवा की गति को पछाड़ने के लिए
धकिया रहे हैं एक दूसरे को
चाँद पे ज़मीन हथियाने के लिए

और धरती पर हो रही है खेती
उखडे हुए टांगों की।

Sunday, June 06, 2010

होस्टल की दुनिया





दिल्ली यूनिवर्सिटी होस्टल : पढाई, प्रेम और पोलिटिक्स

विनीत कुमार

दोस्तो, भाषासेतु के पाठकों के लिए ये एक्सक्लूसिव आलेख हमारे ब्लोगर साथी विनीत कुमार ने लिखा है। अगर आपने अपने जीवन का कुछ हिस्सा होस्टल में बिताए हों तो ये लेख कमोबेश आपकी आपबीती की तरह लगेगी। विनीत एक लम्बे समय से दिल्ली विश्वविद्यालय के ग्वायेर होस्टेल में रहे हैं, अभी हाल में उन्होंने मॉलरोड पे कमरा लिया है। अगली किस्त में युवा कथाकार आलोचक राहुल सिंह आपको जेएनयू के होस्टल की सैर कराएँगे। मजे लिजीये फिलहाल विनीत के इस आलेख का।

जेएनयू की तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी क्लोज कैंपस नहीं है। यहां दिनभर ऐसे लाखों लोगों और हजारों गाड़ियों का आना-जाना लगा रहता है जिनका कि यूनिवर्सिटी से कोई लेना-देना नहीं है। फिर भी इनकी आवाजाही और हो-हल्लों से बेअसर यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में एक ऐसी दुनिया बसती है जो कि दिल्ली की दुनिया से बिल्कुल जुदा है। इस हॉस्टल की दुनिया में न तो दिल्ली की भीषण गर्मी का एहसास होता है, न पानी के लिए कभी मारामारी करनी होती है, न ही बिजली की भारी कटौती के बीच आधी-आधी रात उफ्फ करके गुजारनी पड़ती है और न ही क्लास के लिए घंटों बसों में फंसे रहने की नौबत आती है। पूरी दिल्ली में दाल की कीमतों में कितना इजाफा हो गया,सब्जियों के दामों में कितनी आग लग गयी है,प्रोपर्टी की कीमतों में कितना उछाल आ गया, इन सबसे अंजान हॉस्टलों के भीतर करीब दो हजार ऐसी जिंदगियां सांसें लेती है जो कि दुनियादारी की झंझटों से बिल्कुल मुक्त हैं। इन जिंदगियों में एक आम दिल्लीवाले का कोई भी संघर्ष शामिल नहीं है। आप इसे फैंटेसी की दुनिया कह सकते हैं। लेकिन यकीन मानिए इन सुविधाओं के बीच डीयू के हॉस्टलों की जिंदगी महज तीन शब्दों के इर्द-गिर्द चक्कर काटती है- प्रेम, पॉलिटिक्स और पढ़ाई। इन तीन शब्दों के बीच से होकर ही यहां रहनेवाले लोगों की रुटीन,लाइफ-स्टाइल,जिंदगी के प्रति नजरिया और भविष्य की आड़ी-तिरछी रेखाएं बनती-बिगड़ती है।

छात्रों के बीच की कैटेगरी भी इन्हीं तीन शब्दों को लेकर बनती है। एक जो प्रेम करते हैं और जिन्हें गृहस्थ जीवन का एहसास अभी से ही होने लगता है,दूसरे जो पॉलिटिक्स करते हैं और उसे वे अपने करियर के तौर पर लेते हैं,तीसरे जो दिन-रात किताबों में सिर गड़ाए रहते हैं और कोर्स खत्म करके इसी यूनिवर्सिटी में खपना चाहते हैं और आखिरी कैटेगरी जो प्रेम भी करते हैं,पॉलिटिक्स भी करते हैं और इग्जाम आने पर जमकर पढ़ाई करते हैं। जिनकी संख्या बहुत कम होती है। कई बार इस तरह का विभाजन एक-दूसरे से गड्डमड्ड हो जाता है और सबको अलग-अलग करके देखना मुश्किल भी। इसलिए यहां के छात्रों के बारे में यह कहना ज्यादा सही होगा कि हर किसी की जिंदगी में ये तीनों शब्द किसी न किसी रुप में शामिल हैं। यह संभव है कि इनमें से कईयों का संबंध किसी भी राजनीतिक संगठन से न हो, लेकिन हॉस्टल की छोटी-छोटी बातों को लेकर घरेलू स्तर की राजनीति में इनका सक्रिय नजर आना स्वाभाविक है। यही आप जातिगत और क्षेत्रीय राजनीति के समीकरण को समझना शुरु करते हैं। कईयों की जिंदगी में कोई लड़की न हो लेकिन प्रेम,अफेयर और सौन्दर्य को लेकर सबसे ज्यादा कविताएं और नज्में लिखते-बांचते नजर आ जाना मामूली बात है। प्रेम और पॉलिटिक्स तो फिर भी बहुत ही व्यक्तिगत अभिरुचि से जुड़े सवाल हैं लेकिन पढ़ाई सबके लिए कॉमन है। ऐसा इसलिए कि हॉस्टल मिलने और उसमें बने रहने का जो प्रावधान है कि उसमें हमेशा खतरे की घंटी सिर पर लटकती रहती है। अगले साल जहां कोई हॉस्टल में रहनेवाले से अच्छे रैंक पाता है तो पहलेवाले का बाहर हो जाना तय है। इसलिए यहां रहकर चाहे आप जो करें,अपनी रैंक हर हाल में बनाये रखनी होगी।
यूनिवर्सिटी के हॉस्टल दिल्ली के लोगों के लिए नहीं है। इसलिए यहां स्थानीय और एक किस्म की भाषा-बोली के बजाय देशभर की भाषा और बोलियों का जमघट लगा रहता है। कोई गुजराती में अभिवादन करे और उसका जवाब बांग्ला में मिले तो आश्चर्य की बात नहीं। नागालैंड से आनेवाला छात्र भोजपुरी गीतों पर ताल ठोकने लग जाए तो कोई अजूबा नहीं लगता। हॉस्टल में रहने का सबसे बड़ा फायदा यही पर आकर समझ आता है जहां आप एक ही बिल्डिंग में रहते हुए भी देशभर की भाषा और संस्कृति के थोड़े-थोड़े ही सही लेकिन जानकार होते चले जाते हैं। पूरे देश की अलग-अलग मांओं के हाथों के व्यंजन का मजा ले सकते हैं। जहां से निकलने पर पूरे देश का कोई भी इलाका,वहां का रहन-सहन,विचार-व्यवहार आपको अजनबीपन का एहसास नहीं कराता।
हॉस्टल में पढ़ाई,राजनीति और प्रेम के अलग-अलग समय सालों से निर्धारित है। कोर्स शुरु होते ही कुछ महीने सिर्फ और सिर्फ एक-दूसरे के अफेयर की चर्चा होती है। कई दिनों तक कई लड़के और लड़कियां साथ मिलते-बैठते और अफेयर के पर्सनल होने से पहले उसका एक सामाजिक रुप दिखायी देता है। फिर चुनाव का समय आता है। वहां भी यह संबंध राजनीति से गुजरते हुए भी साथ चलते है। चुनाव के बाद गहरी दोस्ती या फिर मनमुटाव की स्थिति होती है जो कि लंबे समय तक जाती है। इतना सब होते ही हर हॉस्टलों के कल्चरल नाइट का समय आ जाता और फिर जमकर मस्ती का दौर शुरु होता है। बौद्धिक विमर्शों से लेकर डीजे,खाना,शास्त्रीय संगीत सबकुछ शामिल होता। यही एक दिन होता जबकि लड़के और लड़कियां एक-दूसरे के हॉस्टल में बेहिचक शाम को भी आते हैं और जिसका कि लोगों का इंतजार होता है। इस दिन सारे अफेयर करनेवाले हॉस्टल दोस्तों के संबंधों पर सामाजिक मुहर लगती है। इस कल्चरल नाइट के बाद फिर किसी तरह का हो-हल्ला नहीं। सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई। आपको देखकर आश्चर्य होगा कि जो स्टूडेंट कल तक सिर्फ बातें बनाता रहा जिसे कि कैंपस में हवाबाजी करना कहते हैं अब वह ग्राम्शी और देरिदा पर विमर्श कर रहा है,घंटों बॉलकनी में फोन से चिपके रहनेवाला शख्स पूरी तरह किताबों में खो गया है। इस तरह हॉस्टल की जिंदगी का सालभर का चक्र पूरा होता है। अब भी सबकुछ पहले की तरह ही होते हैं लेकिन छात्र राजनीति कमजोर होने से हॉस्टल के बीच से घरेलू स्तर की राजनीति के अलावे पार्टी की राजनीति गायब है। धीरे-धीरे सेमेस्टर सिस्टम लागू होते जा रहे हैं,कई प्रोफेशनल कोर्स आ गए हैं जिनका कि अतिरिक्त दवाब होता है इसलिए लगभग सालोंभर की पढ़ाई करनी पड़ती है,ऐसे में लोगों का पहले से एक-दूसरे से बातचीत की गुंजाईश कम हुई है। वो जमाना गया कि एक लैंडलाइन पर ही करीब सौ छात्रों के फोन कॉल आते। महज चार डेस्कटॉप से पूरा हॉस्टल टेक्नोसेवी हो जाता। इंटरनेट के चलन ने लोगों को बहुत पर्सनल बना दिया है,अधिकांश लोग अपने-अपने लैपटॉप के सामने डूबते-उतरते रहते हैं। मध्यवर्ग के बीच बदलती जीवन-शैली का असर कमोवेश यहां भी हुआ है जो उन्हें अधिक सोशल होने के बजाय करियर के प्रति ज्यादा फोकस्ड बनाती है।

इन सबके बीच भी कुछ कॉमन बातें होती हैं जिनमें कि सब समान रुप से शामिल होते हैं। मसलन हॉस्टल के अधिकांश लोग देर रात तक जागते रहते हैं। दिन में अधिकांश कमरों में लगे ताले एक स्वर में जहां कहते हैं-यहां कोई नहीं है,वहीं कोई काफ्का को पढ़ने के लिए,कोई अपनी गर्लफ्रैंड की दिनभर की गतिविधियों और पल-पल की खबर लेने और शेयर करने के लिए तो कोई पार्टी मीटिंग,पोस्टर बनाने और पर्चा तैयार करने के लिए रात-रातभर जागते लोग आपको मिल जाएंगे। देर रात तक जागने की उनकी इस आदत ने कैंपस के भीतर एक नए किस्म की संस्कृति को पैदा की है। रात के ढाई बजे कोई अपने कमरे में मैगी खाता नजर आ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। बल्कि अतर की कैंटीन तो रातभर गुलजार रहती है। पराठे,मैगी,सैंडविच,ऑमलेट के आर्डर देने की आवाज रात के सन्नाटे में आप साफ सुन सकते हैं। दिन की झंझटों से बचने के लिए देर रात कार्यक्रमों,मीटिंगों की पोस्टर लगाते लोगों को देख सकते हैं, टैरिस पर फोन से चिपके साथियों की फुसफुसाहट पर कमेंट पास कर सकते हैं और कभी ऐसा भी हो कि डेढ़ बजे रात आपको अपने फ्लैंग का कोई भी ट्वायलेट खाली न मिले। हॉस्टल में रहनेवाले स्टूडेंट को डेस्कालर्स निशाचर कहकर बुलाते हैं। इस रतजग्गा कार्यक्रम ने आज से चार-पांच साल पहले कई खाने के ठिकानों को जन्म दिया। मिसराइन का ढाबा, मॉरिशनगर थाने का ढाबा,पटेल चेस्ट के डिवाइडर पार मैगी-पराठे का अड्डा। इनमें से कुछ अब भी बरकरार हैं लेकिन कुछ तो सख्ती और कुछ कॉमनवेल्थ को लेकर तहस-नहस हो गए। रात में जागने का सबों के पास एक ही तर्क है- इस समय इत्मिनान लगता है,कोई डिस्टर्ब नहीं करता। ये अलग बात है कि डिस्टर्ब करनेवाले और होनेवाले लोग सबसे ज्यादा रात में ही डिस्टर्ब होते हैं। अगर कोई रात के तीन बजे हिन्दू कॉलेज के हॉस्टल से कोठारी हॉस्टल में रहनेवाले दोस्त से फैवीकॉल और कैंची मांगने आ जाए तो फिर कोई क्या कर लेगा? नजदीक से देखें तो कई बार महसूस होता है कि हॉस्टल में कई बार रात में जागना मजबूरी से कहीं ज्यादा फैशन का हिस्सा हो गया है। आप पढ़े या न पढ़े देर रात तक जागने के बाद नाश्ते की मेस टेबल पर आंख रगड़ते हुए पहुंचते हैं तो आप करियर और जिंदगी के प्रति सीरियस करार दिए जाते हैं। जिसकी एक सच्चाई यह भी है कि सालों से रतजग्गा करनेवाला एक हुजूम न तो एडीसन बन पाया और न ही अमर्त्य सेन। रोमैंटिसिज्म के दौर में कला कला के लिए की तरह जागना जागने के लिए होकर रह जाता है।

बहरहाल यूनिवर्सिटी हॉस्टल में जो भी लोग पहुंचते हैं,उनके बीच करियर को लेकर बहुत अधिक दुविधा नहीं होती। मोटे तौर पर उन्हें या तो सिविल सर्विसेज में,एकेडमिक्स में,रिसर्च में,मैनेजमेंट या फिर ज्यूडिश्यरी में जाना होता है। यहां आकर बहुत कम ही लोग कोई नया कोर्स चुनते हैं। इसलिए देर-सबेर हॉस्टल में रहनेवाले अधिकांश लोग प्रेम करते हुए,पॉलिटिक्स करते हुए और जाहिर तौर पर पढ़ाई करते हुए वो सबकुछ हासिल कर लेते हैं जिसका सपना लेकर वे हजारों किलोमीटर दूर चलकर दिल्ली का हो जाने के लिए आते हैं। अगर उनके सपने थोड़े-बहुत इधर-उधर डगमगाते भी हैं तो यह हॉस्टल उन्हें बेहतर तरीके से बोलने,अपनी बात रखने और चीजों को विश्लेषित करने की तमीज तो जरुर दे देता है कि वे सिर्फ इसके दम पर मीडिया, कन्सल्टेंसी, काउंसलिंग,राजनीति और स्वयंसेवी संस्थाओं में अच्छा कर जाएं। कुल मिलाकर डीयू हॉस्टल में रहने का यह अनुभव जिंदगी के प्रति कभी निराश होने नहीं देता।

Wednesday, June 02, 2010

हिंदी कहानी

माधवराव सप्रे
टोकरी भर मिट्टी
माधवराव सप्रे की इस कहानी को हिंदी की शुरुआती कहानियों में गिना जाता है। बल्कि कुछ आलोचकों ने इसे ही हिंदी की पहली कहानी माना है। भाषासेतु के पाठकों के लिए विशेष रूप से।

किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास गरीब विधवा की झोंपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता झोंपड़ी तक बढाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई ज़माने से वहीं बसी थी। उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोंपड़ी में मर गया था। पतोहू भी पांच बरस की एक कन्या को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। जब कभी उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दुःख के फूट फूट के रोने लगती। और जब से उसने अपने श्रीमान पडोसी की इच्छा का हाल सुना तब से वह मृतप्राय हो गयी थी। उस झोंपड़ी में उसका ऐसा कुछ मन लग गया था कि बिना मरे वहां से निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए, तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकलने वाले वकीलों की थैली गरम कर उनहोंने अदालत में उस झोंपड़ी पर अपना कब्ज़ा कर लिया और विधवा को वहां से निकाल दिया।
बेचारी अनाथ तो थी ही, पांडा पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी। एक दिन श्रीमान उस झोंपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बता रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहां पहुंची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहाँ से हटा दो। पर वह
गिड़गिड़ाकर बोली, 'महाराज, अब तो झोंपड़ी तुम्हारी ही हो गयी है। मैं उसे लेने नहीं आई हूँ। महाराज, क्षमा करें तो एक विनती है।' जमींदार साहब के सर हिलाने पर उसने कहा, 'जब से यह झोंपड़ी छूटी है तब से पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत समझाया, पर एक नहीं मानती। कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊँगी। अब मैंने सोचा है कि इस झोंपड़ी में से एक टोकरी मिट्टी लेकर, उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊँगी। इससे भरोसा है कि यह रोटी खाने लगेगी। महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिये तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊँ।
श्रीमान ने आज्ञा दे दी।
विधवा झोंपड़ी के भीतर गयी। वहां जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और आँखों से आंसू की धारा बहने लगी। अपने आतंरिक दुःख को किसी तरह संभालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आई। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी,' महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगायें, जिससे कि मैं उसे अपने सर पर धर लूँ।' जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज़ हुए, पर जब वह बार बार हाथ जोड़ने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गयी। किसी नौकर से न कह कर आप ही स्वयं टोकरी उठाने को आगे बढे। ज्यों ही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे, त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति से बाहर है। फिर तो उनहोंने अपनी सब ताक़त लगाकर टोकरी को उठाना चाह, पर जिस स्थान में टोकरी रखी थी, वहां से वह एक हाथ भर भी ऊंची न हुई। तब लज्जित होकर कहने लगे कि, नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।
यह सुनकर विधवा ने कहा, 'महाराज, नाराज़ न हों। आपसे तो एक टोकरी भर मिट्टी उठाई जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी है। उसका भार जनम भर क्योंकर उठा सकेंगे। आप ही इस बात का विचार कीजिए।'
जमींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्त्तव्य भूल गए थे, पर विधवा के उक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गयीं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उनहोंने विधवा से क्षमा मांगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी।

Saturday, May 29, 2010

अंग्रेजी कविता

महिमा का मिथ
(वियतनाम युद्ध से सम्बंधित कविताएँ)
जॉन केंट
अंग्रेजी से अनुवाद : कुमार अनुपम

एक
एक अनाथ लड़का
जिसकी एक ही बांह,
मुझे एकटक घूरता रहता है

घृणा की एक लम्बी उम्र
इन आठ संक्षिप्त सालों में...

दो
हम जीत लेते हैं गाँव के गाँव
वीसी के नाते प्रतिष्ठित है जो
ग्रामीण कपड़ों में लिपटा होने के बावजूद

वे दागते एके ४७
जवाब में हम उन्हें मार डालते

'हुच्च' की आवाज़ सुनते हम चीखते-
अपने हथियार डाल दो, बाहर आओ, अपने हाथ ऊपर उठाए हुए!
(वियतनामी कबूतरों!)

वे जवाब देते अपशब्द और आग के साथ

बारूद से भर देते हम उनकी 'हुच्च'
बस एक ग्रेनेड उछालकर

सन्नाटा...

सावधानी से हम झांकते भीतर
सभी तो मृत...

एक नवयुवती
नवजात शिशु को जकड़े हुए अपनी छाती से
एकमेक
रक्त की नदी में।

तीन
लड़का जो दस से अधिक का नहीं
कुझे चकाचौंध करता अपने कपड़ों तले से
हथियार चमकाता है

मुझे एक उदार आश्वस्ति दो
पूछो मुझसे क्यों
मौत के घाट उतारा मैंने एक दस साल के लड़के को!

Thursday, May 20, 2010

फिलिस्तीनी कविता


बहुत दिनों के बाद 'भाषासेतु' के पाठकों से रू ब रू हुआ जा रहा है। दरअसल इन कुछ दिनों पढाई लिखी को लेकर कुछ व्यस्तता रही और हमारे दूसरे संपादक सुशील जी ने कलकत्ते में नयी नयी नौकरी संभाली है तो इत्तेफकान वे भी व्यस्त ही रहे।
बहरहाल, देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पे इस बार पेश है फिलिस्तीन के कवि ताहा मुहम्मद अली की कविता। इसका अनुवाद किया है मेरी एक 'प्राचीन' दोस्त विजया सिंह ने। विजया कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं। खुश्कमिजाज़ (खुशमिजाज़ पढने की गलती मत कीजियेगा) विजया खुद बहुत अच्छी कवयित्री हैं। तो आइए पढ़ते हैं ताहा मुहम्मद अली की कविता। -कुणाल सिंह

ताहा मुहम्मद अली
अनुवाद : विजया सिंह

पेट्रोलियम की नसों में जमा खून
मैं बचपन में अतल गड्ढे में गिर पड़ा लेकिन
मैं नहीं मरा
जवानी में पोखर में डूब कर भी मैं नहीं मरा
और अब ईश्वर हमारी मदद करें-
मेरी आदतों का एक विद्रोही सैनिक
सीमा से लगे ज़मीनी विस्फोटकों की पलटन में दौड़ रहा है
जैसे मेरे गीत
मेरे युवा काल के दिन
तितर-बितर हो गए हैं
यहाँ एक फूल है, वहां एक चीख
और फिर भी मैं नहीं मरा

उन्होंने मेरी हत्या कर दी
दावत के लिए काटे गए मेमने की तरह-
पेट्रोलियम की नसों में जमा खून
ईश्वर का नाम लेकर उन्होंने मेरा गला चीरा
एक कान से दूसरे कान तक
हज़ारों बार
और हर बार गिरती रक्त की बूँदें
पीछे से आगे तक छलछला पड़ीं
जैसे फांसी लगे इंसान का आगे पीछे झूलता पैर
जो तभी स्थिर होता है
जब बड़े, रक्तिम औषधि वृक्ष पर फूल लग जाते हैं-
उसी आकाशदीप की भांति
जो भटके जलयानों को रास्ता दिखाता है
और राजभवनों तथा दूतावासों की
स्थिति चिह्नित करता है

और कल
ईश्वर हमारी मदद करें-
फोन नहीं बजेगा
फिर चाहे वह वेश्यालय में हो या किले में
या एकाकी पड़े बादशाह के पास
वह मेरे पूर्ण विनाश का इच्छुक है
लेकिन
जैसा कि औषधि वृक्ष ने बताया है
और जैसा सरहदें भी जानती हैं
मैं नहीं मरूँगा! मैं कभी नहीं मरूँगा!
मैं सतत रहूँगा-
हथगोलों में छर्रों की तरह
गर्दन पर टिके चाकू की तरह
मैं हमेशा रहूँगा-
रक्त के एक धब्बे में
एक बादल के आकार में
इस संसार की कमीज़ पर!
(तस्वीर विजया की है)

Thursday, May 06, 2010

उर्दू कविता

'भाषासेतु' पर गुलज़ार एक बार फिर।
गुलज़ार

इक नज़्म यह भी
छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूंथा करते थे
आँख लगाकर, कान बनाकर
नाक सजा कर
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला
तेरा उपला
अपने अपने जाने पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे
हँसता खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पर खेला करता था
मेरा उपला सूख गया
उसका उपला टूट गया
रात को आंगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर कर बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आई
किसका उपला राख हुआ
वह पंडित था
वह मास्टर था
इक मुन्ना था
इक दशरथ था
बरसों बाद
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक़्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!

Friday, April 30, 2010

औरों के बहाने




गिरिराज किराडू हमारे समय के जाने माने कवि हैं। 'मेज़' शीर्षक शुरुआती कविता पर ही प्रतिष्ठित 'भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार' मिला। संकोची इतने कि अपना लिखा बहुत कम दिखाते और उससे भी कम छपवाते हैं। शायद इसी वजह से अब तक पहली किताब ने अपने 'नौ महीने' पूरे नहीं किये। बीकानेर, राजस्थान के रहने वाले गिरीराज फ़िलहाल जयपुर में अंग्रेजी के व्याख्याता हैं।


छुपी हुई चीजों का संग्रहालय
गिरिराज किराडू
फ्लाबेयर का उपन्यास 'मादाम बोवारी' एक विवाहिता के तीन पुरुषों से प्रेम की कथा है। तोलस्तोय के 'अन्ना कारेनिना' में अन्ना की प्रेमकथा उसके विवाह के कई बरस बाद तब शुरू होती है जब उसका बेटा बारह बरस का होने को आया है। शरतचंद्र का देवदास अपनी प्रेमिका की ससुराल के बाहर अपनी अंतिम साँस लेता है। गार्सिया मार्केस के 'लव इन टाइम ऑफ़ कॉलरा' का नायक फ्लोरेंतिनो एरिज़ा एक विवाहिता के पति के मरने का इंतजार पचास बरस तक करता है और इन पचास बरसों में ६२१ स्त्रियाँ उसके जीवन में आती हैं। माइकल ओन्दत्ज़ी के दूसरे महायुद्ध की पृष्ठभूमि में घटित हो रहे उपन्यास 'द इंग्लिश पेशेंट' में अल्मासी अपने सहकर्मी की पत्नी से प्रेम करता है और अरुंधती रॉय के 'मामूली चीजों के देवता' में एक दूसरे से प्रेम करने वाले राहेल और एस्था भाई बहन हैं जबकि उनकी माँ अम्मू एक दलित वेलुथा से प्रेम करती है।
१८५६ में पहली बार प्रकाशित 'मादाम बोवारी' से १९९६ में प्रकाशित अरुंधती रॉय के उपन्यास तक लगभग डेढ़ सौ बरसों में, और पहले भी, प्रेमकथाएं बार बार हमें उस इलाके में ले जाती रही हैं जहाँ हमें चेक उपन्यासकार मिलान कुंदेरा के शब्दों में नैतिक निर्णय को स्थगित करना पड़ता है। न्यायालय या धर्मतंत्र के लिए मादाम बोवारी या अन्ना कारेनिना या अल्मासी या राहेल और एस्था का आचरण अनैतिक था और रहेगा। एक आधुनिकतम समाज व्यवस्था और सर्वाधिक न्यायपूर्ण राजनैतिक व्यवस्था भी विवाहित व्यक्तियों के प्रेम या अगम्यागमन को दंडनीय ही मानेगी, लेकिन एक कलाकृति की दृष्टि में उन पात्रों पर नैतिक निर्णय आरोपित करने से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और होता है। वह हमें मनुष्य होने के कुछ अधिक संश्लिष्ट अँधेरे-उजाले में आने के लिए उकसाती है। हमारे समाज-नैतिक बोध को असमंजस में डालती है और हमें जीवन की एक सरलीकृत समझ में गर्क होने से बचाने का प्रयास करती है। हमारे समय में समाज-नैतिक दबाव एक तरफ जहाँ कम हुआ है वहीँ दूसरी तरफ प्रेम को किसी सामाजिक या मजहबी या सांस्कृतिक आचार संहिता से दमित करने वाली ये संस्थाएं नियंत्रण करने की पुरुष फंतासी से निकली हुई संरचनाएं ही हैं। कलाकृतियां कभी मुखर और कभी गुपचुप तरीके से वैकल्पिक नैतिकता और वैकल्पिक सामाजिकता का निर्माण करती रही हैं। मुखर तरीके से जब वे ऐसा करती हैं तो उनको लेकर बहुत त्वरित और उत्तेजित प्रतिक्रिया होती है और तब सामान्यतः उन्हें अनैतिक और सनसनीखेज कृति करार दिया जाता है। लेकिन कलाकृतियां हमारे बिना जाने और अक्सर बिना चाहे भी अपना काम करती रहती हैं और हम ये पाते हैं कि कभी अनैतिक ठहरा दी गयी कृति प्रेम और नैतिकता का सबसे मर्मस्पर्शी आख्यान बन गयी है। वो चुपचाप अपना काम करते हुए अस्तित्वा के बारे में हमारी समझ को ही इस तरह बदल देती है कि हम अन्ना या बोवारी को दुराचारिणी स्त्रियों की तरह या राहेल या एस्था को पापपूर्ण और घृणित वासना के शिकार चरित्रों की तरह देखने की बजाय ऐसे मनुष्यों की तरह समझने की कोशिश करते हैं जिनकी आस्त्वित्विक परिस्थिति का समाज-नैतिक पर्यावरण के साथ सम्बन्ध असमंजस या तनाव का होता है। उनकी कथाएँ जितना उनके भीतर के संसार से हमारा परिचय कराती है उतना ही उस पर्यावरण की अपनी संरचना से भी। उन चरित्रों की विडम्बना में हम समाज-नैतिक पर्यावरण की अपनी विडंबनाओं को, उसके छल और उसकी असहिष्णुताओं को झांकता हुआ पाते है।
समय में भी प्रेमकथाओं ने अपना काम करने का यह खास ढंग बनाए रखा है। इयान मैकिवान के उपन्यास 'अनटोनमेंट' (2001) के एक दृश्य में एक पुस्तकालय में प्रेम-क्रीडा कर रहे दो पात्रों रोबी और सिसिलिया को तेरह वर्षीया ब्रियोनी देख लेती है। वह सिसिलिया की छोटी बहन है और इस दृश्य को ऐसे समझती है कि साधारण परिवार से आने वाला रोबी उसकी बहन के साथ जबरदस्ती कर रहा है। बाद में ब्रियोनी की गवाही पर रोबी को बच्चों का अपहरण करने के ऐसे अपराध में जेल हो जाती है जो उसने किया ही नहीं। ब्रियोनी को नहीं मालूम कि वह अपराध किसने किया लेकिन पुस्तकालय वाले दृश्य का असर उसके चित्त पर ऐसा है कि वह रोबी को उसके 'मूल अपराध' के लिए दंड देती है। एक तेरह वर्षीया अल्पवयस्क को प्रेम के 'अपराध' को नियंत्रित करने वाली नैतिक और अंशतः एक कानूनी शक्ति की तरह प्रस्तुत करते हुए मैकिवान ने एक ऐसा दृश्य घटित किया है जो हमारी चेतना को एक तरफ ब्रियोनी और दूसरी तरफ रोबी और सिसिलिया की यातनाओं का हिस्सा बना देता है। ब्रियोनी बाद में एक उपन्यासकार बनती है और अपने उपन्यास में युद्ध में अकाल मर चुके रोबी और सिसिलिया के साथ 'न्याय' करती है : उपन्यास में उनका मिलन हो जाता है।
गार्सिया मार्केस के 'माई मेलंकली व्होर्स' (2004) का मुख्य पात्र नब्बे बरस का होने वाला है और अपने जन्मदिन पर वह खुद को एक कुंवारी लड़की का संसर्ग उपहार में देता है। यह अविवाहित अनाम पात्र जो धन के बदले में पांच सौ से अधिक स्त्रियों के साथ संसर्ग कर चूका है, सीधे सीधे एक पतित चरित्र जान पड़ता है और उसकी कामना बहुत विकृत किस्म की वासना। लेकिन मार्केस ने इस चरित्र को इस प्रकार रचा है कि वह प्रेम के सच्चे, परिपूर्ण करने वाले अनुभव से वंचित एक पात्र है। एक गहरे अर्थ में खुद भी एक कुंवारा, जो अपनी मृत्यु का सामना करते हुए अपने 'पहले' प्रेम का आविष्कार करता है।
ये उपन्यास इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे समय में गंभीर कलाकृतियाँ प्रेम को एक सपाट सनसनीखेज किस्से में बदल दिए जाने का एक सर्जनात्मक प्रतिवाद बनी हुई हैं। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक की प्रेमकथाओं का कोई भी जिक्र ओरहन पामुक के नवीनतम उपन्यास 'द म्यूजियम ऑफ़ इन्नोसेंस' (२००८) के बिना अधुरा होगा। इस उपन्यास में व्यवसाई कमाल की अपने से बारह बरस छोटी, खुद उसके मुकाबले में बहुत 'गरीब' और दूर की रिश्तेदार फुसुन से प्रेम की कथा तीन बरस के लम्बे वक़्त में फैली हुई है। कमाल फुसुन को जब पहली बार देखता है, वह अपनी मंगेतर सिबिल के साथ है। 'बहुत आसानी से' दोनों के बीच शारीरिक प्रेम घटित होता है। फुसुन की आधुनिकता- स्विम सूत पहनना, ब्यूटी कोंटेस्ट में भाग लेना, विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध को लेकर सहज होना- से अचंभित कमाल उससे दूर भागने की, अंततः असफल, कोशिश करता है। वह जब तक फुसुन के जीवन में लौट पाटा है, उसकी शादी हो चुकी है और अब उसकी 'पारम्परिकता' उन्हें एक दूसरे से दूर रखेगी। कमाल हर उस चीज़ का संग्रह करने लग जाता है जिसे फुसुन ने कभी छुआ हो और उसका संग्रह ही 'अबोधता का संग्रहालय' है।
प्रेमकथाएं भी शायद एक तरह का संग्रहालय होती हैं; हमारे और समाज के चेतन-अवचेतन का संग्रहालय, जो प्रदर्शित चीजों से कहीं ज्यादा छुपी हुई चीजों सजा रहता है। अगर आपका कुछ खो गया हो तो एक बार वहां हो आये, हो सकता है मिल जाए।

Monday, April 26, 2010

हिंदी कविता

गौरव सोलंकी हमारे समय के चुनिन्दा कथाकारों में से हैं। लिखने की शुरुआत कविता लिखने और प्रेम करने से की। तद्भव, ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश आदि पत्रिकाओं में छप चुके हैं। फिल्मों के खासे शौकीन। जल्दी ही कहानियों की आपकी पहली किताब छपने वाली है। 'भाषासेतु' के पाठकों के लिए पेश है गौरव की कुछ ताज़ातरीन कविताएँ।





गौरव सोलंकी

चूमना और रोते जाना
गोल घूमता आकाश,
उजाला और ईमान,
मेरा खत्म होना, शुरू होना, तुम्हारा माँगना पानी,
देर और डर होना,
हम चले आते हैं ऐसे
जैसे जाना जाना न हो, हो श्मशान, ज्वालामुखी, घोड़ा आखिरी या ईश्वर ख़ुद।

बेहतरीन होने की जिद में
चप्पलें घर पर ही भूल जाना,
खींचना सौ किलो साँस, बाँटना शक्कर, देखना अख़बार।
हो जाना अंधा और खराब,
बिगड़ना जैसे कार,
भींचना मुट्ठी और गोली मारना,
सच बोलना और खाना जहर।

करारे परांठे और किताबें खाना,
बेचना दरवाजे, तोड़ना खिड़की,
घर होना या कि शहर,
तुम्हारी बाँहों में नष्ट होना,
जैसे होना स्वर्ग, लेना जन्म, माँगना किताबें, देखना जुगनू और बार बार वही आकाश।

शहर से बाहर आकर
अपने चश्मे और मतलब आँखों में लौट जाना।
माँगना माफ़ी।

चूमना और रोते जाना।


जहाँ से सड़क शुरू होती है
जहां से सड़क शुरू होती थी
वहां पहली दफ़ा मैंने जानी
कोई राह न बचने वाली बात
और यह कि मजबूर होना किसी औरत का नाम नहीं है।
जब सब मेरे सामने थे
तब मैं रुआंसा और कमज़ोर हुआ
और शोर बहुत था
कि गर्मियां आती गईं गाँव के न होने पर भी।

भूल जाऊँ मैं अँधेरा, हँसी और डिश एंटिने,
पक्षियों से मोहब्बत हो तो जिया जाए,
हवास खोकर पानी ढूँढ़ें, मर जाएँ
और किसी बस में न जाना हो हमेशा अकेले।

वे सराय, जिनमें हम रुकते किसी साल
अगर हम जाते कहीं और रात होती,
वे पहाड़, जिन पर टूटते हमारे पैर,
वे चैनल, जिन्हें प्रतिबंधित किया जाता और हम करते इंतज़ार,
वे चूहे, जो घूमते मूर्तियों पर सुनहरे मन्दिर में,
वे शहर, जिनमें रंग और सूरज हों, रिक्शों के बिना,
हम अगले साल धान बोते तुम्हारे खेत में
और उनमें वे सब हमारे दुख के साथ उगते।

अकाल हो विधाता!

Saturday, April 24, 2010

জীবনগীতিকা

মৃনালেন্দু দাশ

এইখানে বসে আছি রোজকার মতো
তুমি এসে পাশটিতে বসতেই শুরু
হয় সন্ধ্যার কাকলি, চারপাশ চুপ
আলো ছায়া খেলা করে নীল ক্যানভাসে
ট্রেন থামে, ট্রেন চলে যায়, কথা চলে
অগুনতি কথা, কথারা শরীরী হয়
ভাষায় এমন জাদু, নিরিবিলি ছায়া
হয়ে, মায়া হয়ে স্বপ্নের ডানায় উড়ে
চলে বনপথ ছুঁয়ে ছুঁয়ে দূরে, আরো
দূরে, বহুদূরে থাকে অজানা প্রকৃতি
মানুষ জানেনা কিছু, জানে না বলেই
এত কোলাহল, ভুল বোঝাবুঝি, ভুল
দিয়ে গাঁথা ঘরগেরস্থালি রোজ রোজ
টুং টাং বাসনকোসন, জীবনগীতিকা

Mrinalendu Das
57, Abdul Jabbar Road
Post. Kancharapara, Dist. (N) 24 Parganas
Pin : 743145, West Bengal
Mob : 09831263065