Sunday, November 21, 2010

गौरव सोलंकी की कविताएँ


अभिव्यक्ति की राह में, शब्द दर शब्द, दूर से दूर तक की यात्राओं को सहज ही पूरा करते चलने वाले विरले कवि हैं गौरव सोलंकी। बिलकुल नया कवि होना इनके परिचय में कहा जाने वाला दूसरा वाक्य है। कहानियाँ भी लिखते हैं। 'भाषासेतु' पर उनकी दो कवितायें... जिनमें से एक, ‘सौ साल फिदा’, उनके पहले काव्य संग्रह का भी नाम होने जा रहा है। ‘सौ साल फिदा’ की पांडुलिपि लगभग तैयार है। भाषासेतु की तरफ से गौरव को ढेर सारी शुभकामनाएँ....

सौ साल फ़िदा

तुम अचानक अँधेरे का बटन दबाओ
पट्टियाँ उतारो, पहनो कपड़े
हम अपने भविष्य पर न फेंके चबे हुए नाखून
देर से जगें तो पछताएं नहीं
इधर कुछ दिन, जब भूख उतनी पुख़्ता नहीं लगती
हम दीवारों में सूराख करना सीखें
एक रंग पर होना सौ साल फ़िदा
एक ज़िद पर रहना आत्मघाती होने की हद तक कायम

जब मैं तुम्हारे बारे में बता रहा होऊँ
तब मेरी आँखें खुली रहें
मैं पानी मांगूं और हंसूं, खनखनाऊं
फिर मांगूं पानी, भर लूं आँख
और रोशनी हो जब डरने के नाटक के बीच
तब हम किसी फ़साद में अपने नामों के साथ मारे जा रहे हों
नाम चिढ़ाने के हों तो बेहतर है
शहादत महसूस हो ग़लतफ़हमी की तरह
जैसा उसे अक्सर बताया जाता है
बच्चों को बचाने के इंतज़ाम करते हुए न चला जाए सारा बचपना
दर्द इतना ही हो कि ख़त्म हो जाए कहानियों में
पिंजरे इतने छोटे पड़ें कि पैदा होते ही उनसे खेला जा सके बस
शहर इतने बड़े हों, लोग इतने ज़्यादा कि उम्र बीते उन्हें भुलाने में
बर्फ़ इतनी थोड़ी हो कि उसे माँगते हुए झगड़े हों, पहले मिन्नतें और शर्म आए
शरबत की ख़्वाहिश में कटे पूरा जून
नहर के किनारे बैठी हो मौत
उसकी उम्मीद में तकते हुए लड़कियाँ
हम अपना डरपोक होना जानें
खिड़कियों की नाप लेते हुए
जरूरी है कि हम खुलकर साँस ले रहे हों
जब जीतें तो हौसले की बातें न करें

करोड़ों साल बाद की किसी रेलगाड़ी की सुबह के चार बजे
काँपते हुए सर्दी, बाँधते हुए बिस्तर
याद आएं तुम्हारे सोने के ढंग

सोना आदत न बने।



उसके पीछे हमारी पागल गायें

हम सुबह से सोचते थे कि मारे जाएंगे

बिजली भागती थी
उसके पीछे हमारी पागल गायें
और इस तरह हम अनाथ होते थे
बाड़ में कुछ फूल उग आए थे
जिनका नाम रखा गया इंदिरा गाँधी के नाम पर
होते गए हमारे नाक बन्द मरते गए डॉक्टर
एक गाली लगातार तैरती थी क्रिकेट मैचों के बीच
मेरी बहन ने पहले हमारे खेल देखना
फिर रस्सी कूदना छोड़ा
खुले दरवाजे से बिस्किट खाते हुए आए पिता
और पीली दीवार के सामने फेरे हुए
जिस पर से शाहरुख ख़ान की तस्वीर सुबह हटाई गई थी
मुझे लगी थी भूख और सारी तस्वीरें उदास आईं
एलबम बाँधकर हमने सोचा कि तीन हजार में खरीदा जा सकता था कूलर
बाद में तीन अच्छी लड़कियों की एक-एक रात
पहले कभी पिताजी के लिए नौकरी
या कभी भी साढ़े चार पुलिस वाले

शोर जब खूब होता था
मैंने तुम्हारे गले पर रखा अपना चुभने वाला हाथ
और यूँ तुम्हारी आवाज को खा गया बिल्कुल मासूम

पापा जब बिस्किट खरीद रहे थे खुश
तब मैंने खोला था दरवाजा
और तुम बन्द हो गई थी
हम सबने शुरु से तय किया था
कि तुम्हारी हर चिट्ठी पढ़ा करेंगे
खूब था गोंद और खोलकर चिपकाते थे

उत्सव हुआ जैसे थी आदत
फिर पीछे फूल और चांदी फेंकी गई
जब सब लौटे
तब दूर से हमें रोते हुए दिखाई देना था

वीडियो कैसेट में हम गोरे लग रहे थे
नए थे गाने

7 comments:

NC said...

GAURAV JI APKI DONO KAVITAEIN BAHUT ACHCHI HAI.

शिरीष कुमार मौर्य said...

गौरव बिलकुल नए कवि होंगे पर वो मेरे लिए "बिलकुल प्रिय कवि" भी हैं. अपनी शुभ कामनाओं और बधाइयों में मेरी भी शुमार करें कुणाल.

अरुण चन्द्र रॉय said...

वाकई गौरव नई संवेदना के कवि हैं.. सुन्दर कवितायेँ दोनों...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मुझे खुशी है कि मैने गौरव सोलंकी की बहुत सी कविताएं पढ़ी हैं..

khalid a khan said...

gavrav ki bhasha me naye kalewar aur khanak hai ....sundar abvivekti

डॉ .अनुराग said...

थोड़े से बागी है ......शायद उनके यही तेवर उनकी मौलिकता है ....वे उन कवियों में से है जो किसी बंधी बंधाई लीक पर नहीं चलते है .....उम्मीद है अपनी इस उर्जा को वे कायम रखेगे

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

kuch kaviyon ne leek se hatkar chalne kee leek apnai hui hai ....gaurav jee usi leek ke kavi hain....inki kavita pankti dar pankti mujhe bahut pasand hai..par ek poori kavita ke taur par uske mool bhaavlok tak pahunchna kaafi mushkil ho jata hai.... in rachnaon men bhi pankti dar pankti achhe bimb hain....