Saturday, August 07, 2010

असहमति पत्र

पिछले दिनों, हिंदी पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित एक साक्षात्कार के प्रसंग में असहमतियों के बिन्दुओं पर सैद्धांतिक विचार विमर्श की बजाय व्यक्तिगत विद्वेष और अतिचार अमर्ष की अभिव्यक्ति साहित्यिक बहस की मर्यादा का उल्लंघन कर रही है। साक्षात्कार में उपयुक्त आपत्तिजनक शब्दों की हम भर्त्सना करते हैं, फिर भी संपादक और लेखक द्वारा खेद प्रकट करने के बावजूद कुछ रचनाकारों द्वारा एक संचार पत्र समूह विशेष में लगातार गरिमाहीन आक्रमण से हम सभी रचनाकार क्षुब्ध अनुभव कर रहे हैं और अपनी असहमति व्यक्त कर रहे हैं।
हस्ताक्षर
1 महाश्वेता देवी
2 अमरकांत
3 रामदरस मिश्र
4 शहरयार
5 काजी अब्दुसत्तार
6 महीप सिंह
7 पद्मा सचदेव
8 नित्यानंद तिवारी
9 चित्रा मुद्गल
10 मत्स्येन्द्र शुक्ल
11 ममता कालिया
12 कन्हैयालाल नंदन
13 राजी सेठ
14 अखिलेश
15 आलोकधन्वा
16 अजय तिवारी
17 मधु कांकरिया
18 द्रोणवीर कोहली
19 अ अरविंदाक्षण
20 दिनेश कुमार शुक्ल
21 कुणाल सिंह
22 यू के एस चौहान
23 उपेन्द्र कुमार
24 गंगा प्रसाद विमल
25 सतीश जमाली
26 कृष्णा अग्निहोत्री
27 प्रियदर्शन मालवीय
28 सौमित्र
29 से रा यात्री
30 मधुर कपिला
31 शम्भू गुप्त
32 नवारुण भट्टाचार्य
33 बुद्धिसेन शर्मा
34 मनोरमा विस्वाल महापात्र
35 मनोरमा दीवान
36 मीरा सीकरी
37 यश मालवीय
38 बलदेव बंशी
39 अशोक त्रिपाठी
40 मनोज कुमार पाण्डेय
41 प्रियंकर पालीवाल
42 राजेंद्र राजन
43 बलराम
44 ज्ञान प्रकाश विवेक
45 पंकज सुबीर
46 राकेश मिश्र
47 विनोदिनी गोयनका
48 एहतराम इस्लाम
49 संजय कुंदन
50 भारत भारद्वाज
51 सुशील सिद्धार्थ
52 प्रदीप सौरभ
53 प्रांजल धर
54 गजाल जैगम
55 कुमार अनुपम
56 वाजदा खान
57 फूल चन्द मानव
58 राजेंद्र राव
59 वंदना मिश्र
60 साधना अग्रवाल
61 दयानंद पाण्डेय
62 बोधिसत्व
63 बद्रीनारायण
64 नीरजा माधव
65 सूरज पालीवाल
66 नरेन्द्र मोहन
67 विमल चन्द्र पाण्डेय
68 गौरव सोलंकी
69 श्रीकांत दुबे
70 मीनाक्षी जोशी
71 विजेंद्र नारायण सिंह
72 केशुभाई देसाई
73 मेवाराम
74 दीपक शर्मा
75 आभा बोधिसत्व
76 कृष्ण कुमार सिंह
77 नीलम शंकर
78 नेहा चौहान
79 राज कुमार राकेश
80 रामबीर सिंह
81 अरुणेश नीरन
82 विजय शर्मा
83 कमलनयन पाण्डेय
84 विजय काका
85 हरीश नवल
86 राज मणि त्रिपाठी
87 बरखा पुंडीर
88 अनय
89 हिमांशु
90 मिथिलेश कुमार
91 बिमलेश त्रिपाठी
92 रविन्द्र आरोही
93 पराग मांदले
94 अशोक मिश्र
95 संदीप मधुकर सपकाले
96 सीमा रावत
97 ध्यानेन्द्र मणि त्रिपाठी
98 डॉ सौम्य शास्वत
99 राहुल सिंह
100 प्रो सुवास कुमार
101 महेश्वर
102 राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय
103 पंकज मिश्र
104 विवेक निराला
105 चारुलता
106 श्रुति
107 ज्योतिष पायेंग
108 मनोज चौधरी
109 अवधेश मिश्र
110 महावीर राजी
111 चन्द्र प्रकाश पाण्डेय
112 विजय शंकर चतुर्वेदी
113 जितेन्द्र चौहान
114 अंशुल त्रिपाठी
115 बहादुर पटेल
116 हितेंद्र पटेल
117 रूपा गुप्ता
118 शैलेश कदम
119 नीलेश ठाकुर
120 अनिल जनविजय
121 श्रीप्रकाश शुक्ल
122 भालचंद्र जोशी
123 हृदयेश मयंक
124 नासिर अहमद सिकंदर
125 भास्कर लाल कर्ण
126 बसंत त्रिपाठी
127 अरुण प्रकाश मिश्र
128 रमण मिश्र
129 धीरज शंकरवार
130 राहुल चौहान
131 महीधर सिंह चौहान
132 अशोक सिंह
133 नरेन्द्र सैनी

44 comments:

गौरव सोलंकी said...

उस साक्षात्कार की भाषा को तो स्वीकार किया ही नहीं जा सकता. हां, मेरे खयाल से संपादक उसके लिए इतने उत्तरदायी नहीं हैं कि उनकी बर्खास्तगी के लिए मुहिम चलाई जाए. यदि संपादक ने खेद प्रकट कर दिया है, तब तो उनके विरुद्ध चल रही इस मुहिम में मुझे पुराने हिसाब-किताब की बू ज्यादा आती है.
इस बयान के साथ मैं आपकी असहमति के साथ हूं.

NC said...

I Agree with this comment.
gyanodaya mein chapi koi bhi rachna kisi ko hurt karne ke madhyam se nahi prakashit ki jati.

addictionofcinema said...

भाषा कि अश्लीलता पर सहमत हूँ कि बहुत निंदनीय और गन्दी भाषा है और इसके लिए भर्त्सना कि जानी चाहिए लेकिन वाकई कुछ लोग इस मुद्दे को भटका कर पुराने हिसाब चुका रहे हैं. खासतौर पर कुछ वेब्साइतें इस निंदा में ऐसा गन्दी भाषा का प्रयोग कर रही हैं जिसे कहीं से भी उस भाषा के विरोध में नहीं कहा जा सकता है. आपके बयां से सहमत हूँ....
विमल चन्द्र पाण्डेय

Bhuvan said...

कुणाल उम्मीद है तुमने सभी लेखकों से उनकी सहमति ले ली होगी। मैंने ये नाम सेव कर लिए हैं। जिससे बाद में तस्दीक की जा सके।

सुनने में आया है कि कुछ रचनाकारों के नाम अखिलश ने उनसे बिना पूछ डलवा दिए हैं। इसका स्पष्टीकरण अखिलेश को जरूर देना होगा।

तुम्हारी पत्र कुछ ज्यादा ही अमूर्त हो गया है। तुम बता सकते हो कि किसने अमर्यादित भाषा लिखी है ? तुम एकाध नामी और कुछ बेनामीयों की आड़ में विभूति के घनघोर आपत्तिजनक भाषा के खिलाफ लिखने वालों का तो विरोध नहीं कर रहे ?

विभूति के बयान की एक शब्द में भर्त्सना करके तुम उनकी मुखालफत करने वालों के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चला रहे हो। शर्म नहीं आती। इससे अच्छा था कि चुप रहते।

विभूति के इस्तीफा/बर्खास्तगी पर तुम्हारा क्या स्टैण्ड है इसे तुमने कहीं कुछ लिखा हो तो बताना।

Anonymous said...

Vibhutiji k kriyaklapon aur vktavyo ne hmesa hi sahityik mahol ko grm bnaye rkha hai.Ek sahityakar aur smpadk hone k nate Ravindraji k daaybhar se v inkar nhi kiya ja skta.Manviy smvedna me mafi magna ya maaf kr dena kv anuchit nhi hota kintu Bibhutiji k vktavya samajik dushprabhav aur asahishunta ka pchar krte hai.Aisi sthiti me unhe maaf krna smbhav nhi.Rhi baat Ravindraji ki to Gyanody me chhape sakshatkar se unki sahmati-asahmati ho hi skti hai par patrika ki gunwtta, samajik sarokaro se nhi.Is ASAHMATI k VIRUDH main apni ASAHMATI DRJ krti hu.VIJAYA SINGH

संजीव गौतम said...

क्या साहित्य के दिन इतने खराब आ गये हैं कि उसे, जिनका कि वह आज तक विरोध करता आ रहा था, उन्हीं बाजारवादी “ाक्तियों से संचालित होने को विवश होना पड़े।

सुशीला पुरी said...

''साक्षात्कार में उपयुक्त आपत्तिजनक शब्दों की हम भर्त्सना करते हैं, फिर भी संपादक और लेखक द्वारा खेद प्रकट करने के बावजूद कुछ रचनाकारों द्वारा लगातार गरिमाहीन आक्रमण से हम सभी रचनाकार क्षुब्ध अनुभव कर रहे हैं और अपनी असहमति व्यक्त
कर रहे हैं।'' मुझे इन शब्दों के साथ माना जाय ।

Anonymous said...

10 baar nahi kaha nahi kaha kah kar sarkar ke dabav mein kursi bachane ke liye mangi gayi mafai mafi nahi hoti. ye rai aur kalia ki chamchagiri wala hastakshar abhiyan hai.

Anonymous said...

इस सूची में महाश्वेता जैसे एक-आध नाम को छोड़ कर सारे के सारे मीडियोकर लेखक है. इनमें एक भी कृष्ण सोबती, कुंवर नारायण, कृष्ण बलदेव वैद, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, विष्णु खरे या ज्ञानरंजन के टक्कर का नहीं है. महाश्वेता देवी का नाम भी कहीं कृपाशंकर चौबे ने तो नहीं भिड़ा दिया जो वर्धा में नौकरी कर रहे हैं! महाश्वेता इंडियन एक्सप्रेस को दिए बयान में वीएन राय और कालिया के कुकर्म कि निंदा कर चुकी हैं.

Anonymous said...

कुणाल सिह नौकरी बचाने के लिये कितने प्रयास कर रहे हो? नीचे गिरते जाने की कोई सीमा तय कर रखी है तुमने या नहीं? यही उस समय किया होता जब कालिया उस इंटरव्यू को सदी का सबसे बड़ा वियाग्रा मान के पढ़ रहा था और उसे बेबाक बता रहा था.

इस सूची से आपत्ति भारत भारद्वाज के नाम पर है. अभी तक इस कीड़े ने माफी नहीं मांगी है. यह छिनाल कहे जाने के पक्ष में टी.वी. पर हंगामा कर रहा था. अफसोस उन लोगो का है जो भारत भारद्वाज के साथ अपना नाम लिखा रहे हैं. हिन्दी का भला कर रहे हो कुणाल ! तुम्हारे भीतर जमीर होगा तो भविष्य में कभी हिन्दी भाषा में कहानी मत लिखना.

Bimlesh Tripathi said...

मुझे तो यह मामला व्यकितिगत विद्वेष का लगता है...इसका विरोध होना ही चाहिए...

Anonymous said...

Kewak e media group (jahir hai indian express, jansata) ke khilaf is suchi ka kya arth hai?

Anonymous said...

Kewak ek media group (jahir hai indian express, jansata) ke khilaf is suchi ka kya arth hai? yeh rai-kalia ki jundli ke prati hamdardi ka patra hai parth!

राकेश सिंह सेंगर said...

कुणाल की छोड़िए आप अनाम क्या बचाने के लिए हो गए हैं. लेखन में स्टैंडर्ड आपके हिसाब से थोड़े तय होगा। यह तो व्यक्तिगत समझ है कि किसे क्या पंसद आता है। किसका मुकाम ऊंचा है इसे आप अपने हिसाब से तय करेंगे। अब अशोक वाजपेई ही आपके मॉडल हैं तो हम केवल तरस खा सकते हैं...

भूवन जी जनसत्ता और इस लिस्ट के नाम को सेव करिए.डर रहे हैं या डरा रहे हैं। प्रतिक्रिया को जगह देने की बात है। जनसत्ता ने ये लिस्ट क्यों नहीं छापी क्योंकि ओम थानवी की पहुंच वहीं है जहां से यह व्यक्तिगत विद्वेष की मुहिम चल रही है।

राकेश सिंह सेंगर said...

भूवन जी जुगाड़ लगाओ अपनी....लुटिया डूब रही है....भीतरी साजिश खुल गई है। संभलकर रहना रैकेटियरिंग में पीछे न छूट जाओ
यहां विभूति के अपशब्द का बचाव नहीं उस रैकेटियरिंग से हिंदी साहित्य को बचाने का सवाल है जिसे तुम जैसे लोग ढो रहे हैं।

Anonymous said...

yeh wakai afsosnakh hai aur nishchit hi vaiktigat rag-duash se prarit hai.app kee ahsamati ke saat huon.
mithilesh kumar,Ph.D

Anonymous said...

Sir you are very helpful and kind man so i am with you

Anonymous said...

hum bhi apni asahmati vyakht kar rahe hai.
himanshu,Ph.D

parag mandle said...

'उस साक्षात्कार की भाषा को तो स्वीकार किया ही नहीं जा सकता. हां, मेरे खयाल से संपादक उसके लिए इतने उत्तरदायी नहीं हैं कि उनकी बर्खास्तगी के लिए मुहिम चलाई जाए.' - मैं गौरव के इस वाक्य से पूर्ण सहमत हूँ।
एक बात और.......इस असहमति को और व्यापक करके सिर्फ एक पत्र समूह तक सीमित न रखकर किसी भी माध्यम से किसी भी व्यक्ति द्वारा, किसी के भी पक्ष अथवा विपक्ष में व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए की जा रही तमाम अभद्र टिप्पणियों को इसके दायर में शामिल किया जाना चाहिए था।

Narender said...

वैचारिक और भाषिक असहमतियां को कतई गलत नहीं कहा जा सकता लेकिन निजी शत्रुता की मुहिम से ऊपर उठकर सोचना जरूरी।
नरेंद्र

Bhuvan said...

अभी थोड़ा व्यस्त हूं इसलिए लिस्ट का मिलान तो बाद में करूंगा। तब तक कुणाल ये बताओ कि शिवमूर्ति,विमल कुमार और धर्मेन्द्र सुशांत का नाम तुमने हटा क्यों दिया ??

और अशोक पाण्डे ने कहा है कि आलोकधन्वा का नाम उनसे बिना पूछे डाला गया है !! इस पर तुम्हे क्या कहना है ?

जवाब न देते बने तो भी, अपने इस चमचे राकेश सिंह सेंगर को जरूर बता देना।

राकेश सिंह सेंगर said...

अविनाश उर्फ भूवन
तो तुम रख लो अपनी मोहल्ला वाली लिस्ट में.सब काम तुमसे पूछकर होगा क्या?
चमचे हो तो सबको चमचा ही समझोगे। बलात्कारी कहीं के।

kadam said...

I am agrree with above said stetement.

Shailesh kadam.

Anonymous said...

What saying its not the matter, who saying it’s the matter for those people who has always in worked to digging for create situation for their personal wealth ness and interests. This has relevance about the present created controversy about V. N. Rai comment about contemporary Hindi feminist Writers.
-Jyotish
If we read the complete conversation of V. N. Rai and Rakesh Mishra, published in “Naya Gyanuday”, it has been clear that B. N Rai have not comment about person and physique dimensions, he has express his worried about Q of phonographic texts created in the name of “Feminist Writing in Hindi Literature”, from my site which has also a great Socio-Culture and Academic illness of our society.

If someone has evoke to proved through their texts with depicts nudity and narrating their sexual relationship with different persons, then why our society not to be called them they are not a “cchanai”, it’s equally relevance for those Man or Women writer who used the feminist thinking in this regard. Our country and society have different from west and have a great own value about sex and relationship. So, later V. N. Rai also details about his comment on electronics media that ‘narrating sex and relationship not to be the only subject of Feminist writing, there are different so many subjects also here can to depicts in their texts like Dalit, Poverty and Adi Vasi etc.’ Which has been shown that he has a responsible Writer, IPS officer cum Vice-Chancellor of a University and worried citizen about this writings. We always belief and honour his works, who has spent his life in administrating work for our country and creating Literature and Research Work. We evoke those people to stop who has creating nasty situations against a respective and responsible person.

NILAMBUJ SINGH said...

इस लिस्ट का भरोसा नहीं. बहुत से नाम फर्जी दिख रहे हैं.
बहुत से नाम आसानी से समझे जा सकते हैं कि क्यों हैं?( मन तुरा मुल्ला बगोयम, तू मुरा मुल्ला बगो)
बहुत से चमचा टाइप के लोग हैं, तो कुछ अवसरवाद में विशेषज्ञ!
क्या ‘भाषा सेतु’ ने सबको –”छिन्न-नाल” समझ रखा है ?

बोधिसत्व said...

मत्स्येन्द्र जी का नाम ठीक कर दीजिए
बहादुर पटेल( देवास)
जितेन्द्र चौहान( इंदौर)
के नाम भी इसमें शामिल कर लीजिए।

Anonymous said...

कुणाल और चन्दन,

अपने आका की गुलामी मे तुम दोनो ने साहित्यिक मर्यादाओं का नाश कर दिया. अपराधी हो तुम लोग. तुम दोनो इस प्रश्न का उत्तर तैयार रखो, इतिहास पूछेगा कि तुमने अपने अपने ब्लॉग पर एक ही समय और एक ही दिन क्यो एक जैसा ही लिखा? कुणाल तुम हस्ताक्षर ले रहे हो और चन्दन तुम बर्खास्तगी की माँग को कमजोर करने के लिये रास्ते सुझा रहे हो? फिर तुममे और प्रय़ण क़ृष्ण में क्या फर्क बाकी बचा?
यह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि तुम दोनो इस भाषा के लेखक हो. तुम लोग हिन्दी के शरीर पर कोढ़ हो.

भविष्य में तुम दोनो की कोई रचना नहीं नहीं पढूंगा.

नीलेश ठाकुर said...

कुछ और अपील करो...मार्यादित अनामधारी
मुद्दे पर बात करो...किसी की समझ को ऐसे मत ललकारो
तुम्हारी अपील से साफ है कि तुम खुद विरोध तो करते हो लेकिन दूसरे की असहमति तुम्हे बर्दास्त नहीं होती।
तुम्हारे जैसे विचारों के विरोध में ये मुहिम चलानी पड़ रही है। क्योंकि तुम लोग हिंदी रटते हो हिंदी विचारशील और रचना में उन्नति करे ये नहीं चाहते। व्यक्ति विशेष के माफी मांगने पर भी तुम्हारी लंगुरबाजी अंदरूनी घटिया एजेंडे का हिस्सा है। इसलिए अब जो भी साक्षात्कार पढ़ रहा है वो यही कही रहा है कि सिलसिलेवार पढ़ने पर वह शब्द गलत जरूर लगता है लेकिन बाकी बातें सौ फीसदी सही है। यह आम जन की समझ है। तुम लोग आम पाठक के खिलाफ खड़े हो रहे हो। वह अपशब्द की माफी के बाद पूरा साक्षात्कार भी पढ़ रहा है और तुम्हारी दकियानुस मुहिम भी देख रहा है। बाकी दुकान चलाओ...लेकिन यह जान लो कि समय हमारी समझ को सही साबित करने लगा है।
कुणाल मैं एक पाठक रहा हूं
विभूति का शब्द गलत है लेकिन बाकी बातें जितनी बार मैने पढ़ी वो सही लगीं। एक समझ के साथ दिया गया है। लेकिन वह शब्द उन्हे नहीं बोलना चाहिए। लेकिन साहित्यकारों और उनके पिछलग्गु कुछ दलालों के ब्लाग ने जिस तरह से इस बात को भुनाने की कोशिश में सही सवाल दबा रहे हैं उसे कोई सही नहीं कह सकता।
उसके तर्क में चाहे विष्णु खरे कुछ कहें चाहे अशोक वाजपेई....
हम आपके साथ हैं....

विशाल श्रीवास्तव said...

साक्षात्कार की भाषा से मुझे भी दुःख हुआ था
बोधि भाई के ब्लॉग पर मैंने लिखा भी
पर वाकई संपादक और लेखक द्वारा माफ़ी के बाद
अब हो रहे सुनियोजित षड़यंत्र
से अधिक दुःख और क्षोभ हो रहा है .........

Hitendra Patel said...

विभूति नारायण राय ने 'छिनाल' शब्द का आपत्तिजनक प्रयोग किया और उन्हें प्रतिवाद के सामने अंतत: माफी मांगनी पडी. जिसने भी वह इंटरव्यू ठीक से पढा होगा उन्हें यह पता होगा कि उस टिप्पणी का एक संदर्भ था, लेकिन उनके वक्तव्य से युवा लेखिकाओं की भावना को ठेस लगती है इस आरोप के कारण ही राय को प्रतिवाद के सम्मुखीन होना पडा. इस तर्क को अगर माना जाए तो विष्णु खरे के लेख से तो हिन्दी समाज के तमाम लोगों का ही अपमान करने की कोशिश की गयी है. जिस असभ्य तरीके से खरे ने पूर्वांचल के युवा लेखकों के बारे में एक आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया है उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है.

सुशीला पुरी said...

हिन्दी भाषा का ये दुर्भाग्य है कि उसको पढ़ने वाले ऐसे छुपकर तू तू मै मै मे लगे हैं ।

Anonymous said...

Mahashweta devi, kal tak to udhar Rai kee barkhastagi ki mang kar rahi theen aaj unka lota idhar ludhak gaya?

Aur ye Lijlija Gaurav solanki bhi bayan badalne laga? Aur ye Vimalchandr Pandey bhi?

Hame mat banao bhaiye !!! is list me aadhe gurge VN rai kee University ke hain, jinhe usne lagaya hai, kai mahilayen ve hain jo unkee premikayen rah chuki hain.
Muh mat khulvao hamara...han kahe dete hain.

Anonymous said...

mai bhi aapke samarthan me apnaa haath uthaataa hun. kripya mera naam bhi shaamil karen. shaayed aadhe se jyaadaa Vibhuti-Kalia virodhiyon ne vah interview padhaa hii nahiin hai. aur chhinaal koi aisaa gandaa shabd bhii nahiin hai. shabd kaa matlab badalkar log apnaa ullu sidhaa kar rahe hain.
--anil janvijay

आदित्यनाथ said...

विष्ण खरे ने चेखव को सही कर दिया वाकई ये घुड़मक्खी हैं

अनिल सिंह said...

लेकिन घुड़मक्खी विष्णु खरे से मैं उन्ही की बात पूछना चाहता हूं कि पार्टनर आपकी पॉलिटिक्स क्या है?
सूचनार्थ-
विष्णु खरे केन्द्रीय साहित्य अकादेमी में उपसचिव के पद पर भी रहे हैं।
विभूति विरोधी गैंग के ब्लॉग पर टिप्पणियों को देखिए
http://mohallalive.com/2010/08/11/mohalla-live-moderator-react-on-hitendra-patel-reaction-about-vishnu-khare-writeup/#comments


आपने पुर्वांचल के लोगों का अपमान किया है। शब्द को मैग्निफाई करने में ऐसे वाक्य निकालने की मजबूरी क्यों। प्रजापति तुम भी विभूति के बयान को समझदारी से पढ़ते तो इसका अर्थ वह नहीं निकलता जो तुमने दुनिया को समझाने की कोशिश की है। शब्द की गलती सब मानते हैं लेकिन माफी के बावजूद एक घुड़मक्खी का ये बयान चौंकाने वाला है। साहित्य के दरोगा का दंभ तो देखिए। अपनी किताब का नाम ही लिखता है 'आलोचना की पहली किताब'. कायदे से इन्हे माफी मांगनी चाहिए। नहीं तो जिस मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाले हैं बरबाद हो जाएंगे।

अरविंद सिंह said...

जरूर पढ़ें घुड़मक्खी विष्णु खरे के नाम खुला पत्र।
पत्र पुराना है लेकिन इनकी नैतिकता को लोगों ने पहले पहचान लिया था। समयांतर में छपे इस लेख को आप भी पढ़ सकते हैं।

http://beelag.blogspot.com/2010/08/blog-post_3512.html

Anonymous said...

ये गौरव सोलंकी नामक जीव पाला बदल गया? चलो इससे यही उम्मीद थी!

वैसे भी हिंदी की ये ’विलक्षण’ प्रतिभा अभी से स्वयंभू होने का स्वप्न पाले नज़र आती है। समय बताएगा इसकी लेखनी में कुछ दम है भी या नहीं।

जो लोग इसके भारतीय प्रोद्योगिकि संस्थान के होने के आहें भरते हैं, उन्हें इसके उपनाम का भी ध्यान रखना चाहिए। ये जानना दिलचस्प होगा कि ये भाई कोटे में वहां पहुंचे थे या अपने बाहुबल से!

Ek ziddi dhun said...

Ajay Tiwari ke sign behad kamal ke hain. DU ka yaun shoshan ka mamla nipat gaya kya?

Anonymous said...

ab ye chhichaledar band hona chahiye. VN rai jaise logone ko nazarandaz karen, sahitya mein isase kuchh bigar nahi jayega.

kpa

Anonymous said...

कुनाल,

एक लखेरे के ब्लॉग का सहारा लेकर तुम विजयी हुए पर यह मत भूलो कि समाज की निगाह खुली है. चन्दन पंडे का इससे खूबसूरत इस्तेमाल हो भी कहाँ सकता था ? गिरिराज किराडू जी को धोखा देने की क्या कीमत अदा की है तुमने और कालिया ने? चन्दन पंडू की हश्र बताती है, किसी साहित्यकार की मौत कैसे होती है. क्या उसकी कहानिया अब पढ़ी जायेगी? यह हिन्दी समाज उस पर और तुम पर थूकेगा.

तुम्हारा बाप.

Anonymous said...

कोई गौरव सोलंकी की भी तो सुध ले! हिंदी में भविष्य का नोबल विजेता जन्मा है। हमारा तारणहार।

प्रदीप जिलवाने said...

'उस साक्षात्कार की भाषा को तो स्वीकार किया ही नहीं जा सकता. हां, मेरे खयाल से संपादक उसके लिए इतने उत्तरदायी नहीं हैं कि उनकी बर्खास्तगी के लिए मुहिम चलाई जाए.' - इस वाक्य से सहमत हूँ।

सुनील गज्जाणी said...

सुशील जी - कुनाल जी
नमस्कार !
आप के ब्लॉग पे पहली बार आने का सौभाग्य मिला , सार्थक रहा , आप हमारी और से एवं हमारे साहित्यक ब्लॉग '' आखर कलश '' कि और से हार्दिक बधाई .
सादर !

सुनील गज्जाणी said...

सुशील जी - कुनाल जी
नमस्कार !
मैंइ '' ज्ञानोदय '' के इस अंक के बारे में पत्र पत्रिकाओं में बहुत पढ़ा है , क्या कारण है इस का कि ज्ञानोदय के और भी विशेषांक निकले होंगे जो इतने चर्चित नहीं हुए होगा जो ये हुआ है , जहा तक मेरा मत है कि इस में रचनाकारों कि बज्जे संपादक का ही पहला दोष आता है , एक गरिमा होती है पत्रिका , जाने कालिया जी का तात्पर्य क्या है इस अंक के प्रति वे बता सकते है .
सादर