Friday, September 17, 2010

हिंदी कविता


कुणाल सिंह
नोकिया 6300

नाईन एट थ्री वन जीरो...

मैंने जोर से सटा लिया कानों पर और सुनने लगा
रिंग टोन
जैसे कम्बल में लिपटी आवाज़
गझिन, गर्म-गुदाज़
सुदूर बजती जाने कौन से स्वर में
सचमुच की आवाज़ के बदले, तब तक के लिए
आवाज़ की प्रतिकृति- हैलो ट्यून
तब तक के लिए उतावली प्रतीक्षा में एक तुतलाता ढाढस

तब तक के लिए घिर आते हैं बादल
अपने अक्ष पर दौड़ते दौड़ते थम जाती है पृथ्वी
एक चिड़िया का चहचहाना रुक जाता है कहीं
कहीं एक फूल का खिलना स्थगित हो जाता है तब तक के लिए
ट्रैफिक की बत्ती पीली है और अब तक अवरुद्ध सा कुछ
मचल पड़ता है खुल पड़ने को, चारों तरफ
मेरी सांस तेज तेज चलती है
शिराओं-धमनियों में दौड़ता है लहू तेज तेज
रोमकूपों में समा जाते हैं रोमांच के छोटे छोटे दाने अनगिन

यह सब एकदम शुरू शुरू का होना है
ऊपर के सख्त परत के एक बार हटते ही
गरगर बहने लगता है भीतर का तरल
लेकिन यह हर बार का होना है, ऐसे ही
हर बार का यह प्रतीक्षित, रुका सा
हर बार ऐसे ही पुनर्नवा

एकाएक चुकने लगेंगे सारे शब्द, सारी ध्वनियाँ, अर्थ सारे
भाषा का पृष्ठ जैसे कोरा हो चलेगा एकाएक
पृथ्वी नयी नकोर

अभी थोड़ी देर में
छटेंगे यही बादल
यहीं से निकलेगा जाना पहचाना सूरज रोज का
यहीं से विकसेगी सभ्यता, संतति के बीज अन्खुवायेंगे यहीं से
अभी थोड़ी देर में शुरू होगा सब, फिर से
एक भाषा का निर्माण होगा
और पहली बार हव्वा कहेगी आदम से
भाषा का पहला पवित्र शब्द- हैलो!


नाटक
सियालदह से लास्ट लोकल के छूटने में अभी देर है
खिड़की वाली सीट पर बैठे बैठे रमापद
सो गया है या केवल सोने का नाटक करता है कौन जाने

1989 में जब रमापद छोटा था
मोहल्ले के लोगों के बीच बहुत फेमस था
लोग कहते थे कालोशशि तुम्हारा छोटा लड़का
क्या ही खूब नाटक करता है मरने का
जान डाल देता बस!
दुर्गापूजा में बारीपाडा हाईस्कूल माठ में
नाटक खेला जाता था तो रमापद को
रोल दिया जाता था मरने का
कालोशशि तब मन ही मन जरूर डर जाती थी
लेकिन उसे और भी ज्यादा डर लगता था रमापद के बाप हरिपद से
अपनी छाती से सटाकर कहती थी क्या बताऊँ रमा
तुम्हारे बाप की अंतड़ी में दो घूँट शराब के पड़ते ही
वह जैसे शैतान का रूप धर लेता है
वास्तव में रमापद का बाप हरिपद शैतान था
या शैतान होने का नाटक करता था कौन जाने

1989 नहीं रहा, रमापद का बाप
हरिपद कभी का मर गया ज़हरीली शराब से
कालोशशि भी एक बार मर ही गयी थी लेकिन
फिर यह कहकर जी उठी कि रमापद की शादी हो जाये
बहू का मुंह देख ले फिर मारेगी चैन से
अभी कौन सी लास्ट लोकल छूटी जा रही है- हाँ तो!
यही सब सोचता है रमापद नींद में
खिड़की वाली सीट पर बैठकर

रमापद की बीवी मुनमुन ने
लौकी की डंठल और रोहू की एक साबुत मूडी डालकर
दाल बनायीं है क्या ही स्वादिष्ट
पोस्ते का दाना भूनेगी रोटी सेंकेगी गरमागरम
रमापद के आ जाने के बाद
रमापद की बीवी मुनमुन
लौकी कि डंठल और रोहू की मूडी डली दाल बनाकर
'स्वीट ड्रीम्स' कढ़े तकिये पर सर रखकर
सो गयी है या सोने का नाटक करती है कौन जाने

1989 में मुनमुन ने प्रेम किया था
नागा घोष के मंझले लड़के सन्नी देओल से
मोहल्ले में क्या ही हो-हल्ला मचाया था मुनमुन के बाप सुमन सरकार ने
स्कूल से पीठ पर बस्ता टाँगे लौटती मुनमुन को
अपनी साईकिल के कैरियर पर बिठाकर
भाग चलने को कहा था सन्नी देओल ने बहुत दूर सूरत को जहाँ
उसका ममेरा भाई राजू नौकरी करता था किसी कपड़ा मिल में
रिजर्वेशन, कोर्ट मैरिज, जेरोक्स, एसटीडी कॉल-
उस उम्र में मुनमुन डर के मारे थर थर कांपने लगी थी यह सब सुनकर
'जमाने की दीवार', 'अरमान', 'मियां-बीवी राजी',
'दो दिलों का बिछड़ना सदा सदा के लिए', 'बर्दाश्त से बाहर'
और अपनी बांहों की मछलियाँ दिखाने के बाद भी निराश
साईकिल के कैरियर पर बिठाकर
छोड़ गया था सन्नी देओल उसे उसके बाप के घर
कई दिनों तक रोती-सुबकती रही थी मुनमुन
सन्नी देओल के बनाए दिल और उसमें बिंधे तीर को देख देख
कई दिनों तक सुनती रही थी लोगों के बोल-
साली नाटक करती है!

1989 नहीं रहा, नागा घोष सुमन सरकार मर-खप-बिला गए
सन्नी देओल बहुत दूर सूरत में, या कि दिल्ली में
नौकरी करता है या नौकरी का नाटक कौन जाने
यही सब सोचती है रमापद कि बीवी मुनमुन
'स्वीट ड्रीम्स' कढ़े तकिये पर सर रखकर सोते हुए

हुर्र हुर्र भागती है लास्ट लोकल
रमापद खटखटाता है घर का दरवाज़ा
खूब चाव से खाता है रमापद, मुनमुन के
हाथ के बने खाने की तारीफ़ करता है खूब
बिस्तर पर पड़ते ही सो जाता है, आधी रात
झकझोड़कर जगाती है मुनमुन रमापद को
1989 1989 1989 -हुर्र हुर्र भागता है 1989
खूब प्यार करती है मुनमुन रमापद को- देर तक।

10 comments:

prkant said...

ज़बरदस्त.
समझ नहीं पा रहा हूँ कि मैं पढ़ रहा हूँ या पढ़ने का नाटक कर रहा हूँ! मुनमुन,रामपद ,हरिपद ,सन्नी देओल....इन सबके नाटक के पीछे की सच्चाई-- जिन्दगी तो चलनी ही है.

NC said...

MOBILE 6300 MUJHE BAHUT ACHI LAGI HAI.
DOBARA WAPSI KE LIYE SWAGAT HAI.

shashi said...

thik hai chal jayegi...vaise kuchh khas to nahi hai...fir bhi bahut achhi hai.

डॉ .अनुराग said...

नाटक वाली गहरे तक उतर गयी......सनी देयोल वाला एपिसोड जैसे कविता को ओर जीवंत बनाता है .ओर आखरी लाइन" 989 1989 1989 -हुर्र हुर्र भागता है 1989
खूब प्यार करती है मुनमुन रमापद को- देर तक।"

i love this line.....

RAVINDRA SWAPNIL PRAJAPATI said...

meri kahani or tumhari kavita badiya jugalbandi banegi

nokia 6300 theek h matlab bahut achchi mat smajh lena.

swapnil

विनीत कुमार said...

वैसे तो मैं कविता बिल्कुल भी नहीं पढ़ता लेकिन दूसरी कविता की शुरुआती लाइनों पर नजर गयी तो आगे बढ़ता चला गया और कविता खत्म हो गयी। कविता में तुम्हारे कहानी के ढंग का असर नजर आया। बहुत अच्छी लगी कविता..

Anonymous said...

SUNDER...CONGRATS.

विमलेश त्रिपाठी said...

अच्छी कविताएं... उससे भी अच्छी तुम्हारी वापसी...बधाई.....

Amarjeet Singh said...

Sir, kolkata ki sanskriti mein nahaye huye Rampad, munmum, sunny deol...aur jina isi ka naam hai ki undertone...bahut hi jyada touching hai...

sandeep said...

दोनो कविताएँ अच्छी लगी। नोकिया-6300 छू गई। गझिन, गर्म, गुदाज़ लय मेँ खोये हुए एक तुतलाते ढाढस एवं उतावली प्रतीक्षा का अनुभव लाजवाब है। हैलो तक के कतरा भर लमहे के बीच का अहसास सारी गतियोँ से परे है। इस अहसास को संवेदना विरोधी (बहुकथित) तकनीकी उपकरणो ने साक्षात कर दिया है न कि रोका है। अनुभूतियोँ की सच्ची कथबयानी बेहद पसंद आई।