Thursday, December 02, 2010

सूरज की कविता : मेरे खरीददार


मौसम ने, जबकि समूचे उत्तर भारत को अपनी ठंडी हथेलियों से सहलाना शुरू कर दिया है, ऐसे में प्रेम की सुख(!)दायी ऊष्मा से लबरेज, सूरज की यह कविता। सूरज हमारे समय के कितने महत्वपूर्ण कवि हैं, इसे उनकी रचनाओं से ही जाना जा सकता है. ‘तहलका’ के बहुचर्चित साहित्य विशेषाँक तथा ‘साखी’ के ताजे अंक के अलावा उनकी कविताएँ ‘नयी बात’ और ‘सबद’ पर प्रकाशित हो चुकी हैं।

मेरे खरीददार


(किसी ढाबे से रात का खाना पैक करा रही सुन्दरतम युवती के लिये, जो उस दरमियान तन्दूर के पास खड़ी अपने कोमल हाथ सेंक रही है और शर्तिया मुझे याद कर रही है, जबकि मैं हूँ कि वहीं हूँ – उसी तन्दूर में..)

तुमने मेरी कीमत नींद लगाई थी
जो स्वप्न हमने देखे वो सूद थे
जब स्वप्न चूरे में बिखर गया
तुमने मुझे समुद्र के हाथों बेच दिया

मेरी स्त्री!
बिकना मेरे भाग्य का अंतिम किनारा रहा
पर तुम ऐसा करोगी इसका भान नहीं था,
लगा तुम गुम हो गई हो
किसी बिन-आबादी वाले इलाके में

मैने समुद्र से लड़ाई मोल ली
उसे पराजित किया
तुम्हारे लिये तोड़ लाया समुद्र से चार लहरें
जैसे मैं जानता था तुम्हारे सलोने
वक्षों को होगा इन लहरों का इन्तजार

तब,
मेरी स्मृतियों को औने पौने में खरीद
तुमने मुझे बर्फ को बेच दिया
जो तुम्हारी लम्बी उंगलियों के
पोरों की तरह ठंढी थी

बर्फ के लिये मैं बेसम्भाल था
उसने मुझे पर्वत को बेच दिया
पर्वत ने शाम को
शाम ने देवदार को
देवदार ने पत्थरों को
और पत्थरों ने मुझे नदी को बेच दिया

स्मृतिहीन जीवन के लिये धिक्कारते हुए
नदी ने मुझे पाला अपने गर्भ की मछलियों,
एकांत,
और शीतल आसमान के सामियाने के सहारे

नदी को आगे बहुत दूर जाना था
उसने मुझे कला को बेच दिया
मात्र एक वादे की कीमत पर

कला के पास रोटी के अलावा देने के लिये सबकुछ था
कला ने साँस लेने की तरकीब सिखाई
फाँकों में सम पर बने रहने का सलीका
और तुम्हे याद कर सकूँ इसलिये कविता सिखाई

अनुपलब्ध रोटी के लिये कला उदास रहती थी
उसने विचार से सौदा किया
और जो मौसम उन दिनों था
उस मौसम ने विचार के कान भरे
विचार ने मुझे अच्छाईयों का गुलाम बनाना चाहा
मैने यह शर्त अपने पूरेपन नामंजूर की

मेरे इंकार पर विचार ने मुझे गुलाम
बताकर बाज़ार को बेच दिया

बाजार ने मुझे रौँदा
शत्रु की तरह नही
मिट्टी की तरह और ऐसा करते हुए
वो आत्मीय कुम्हार की धोती बान्धे था
जिसमें चार पैबन्द थे

चार पैबन्द से
चार लहरों की स्मृति मुझे वापस मिली
जिसकी सजा में बाजार ने
मेरा सौदा आग से कर लिया

बाजार को कीमत मिली और
मुझे अपने नाकारा नहीं होने का
इकलौता सबूत

तब मुझे तुम्हारी बहुत याद आई

आज शाम जब आग मुझे
तन्दूर में सजा रही थी
मैं तुम्हे याद कर रहा था

उपलों के बीच तुम्हारी याद सीझती रही
सीझती रही
सीझती रही...

जिसकी आंच में सिंक रहे थे
तुम्हारे कोमल हाथ
और सिंक रही थीं
तुम्हारे लिये रोटियाँ
..................................................................



प्रस्तुति : श्रीकांत


6 comments:

सागर said...

उफ्फ्फ बेजोड़ कविता... कई बिम्ब बेहतरीन बन पड़े हैं... पूरी कविता ही एक मादक खुशबू में लिपटी हुई है. .... बेजोड़ जगह, बेजोड़ दृष्टि और बेजोड़ शिल्प के साथ पेश किया... शुक्रिया

डॉ .अनुराग said...

मिका कविता से ज्यादा खूबसूरत है .......कविता टुकडो में बेहतरीन लगी .....जैसे ये पंक्तिया

आज शाम जब आग मुझे
तन्दूर में सजा रही थी
मैं तुम्हे याद कर रहा था

उपलों के बीच तुम्हारी याद सीझती रही
सीझती रही
सीझती रही...

उत्‍तमराव क्षीरसागर said...

सुंदर...!

shesnath pandey said...

अद्धभुत, बेहतरीन... इस कविता को पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया में अद्धभुत,बेहतरीन,लाज़वाब जैसे विशेषण ही निकलते है... और मन इसी में गोता लगा के डूब जाना चाहता है... लेकिन कविता जितना अपने भाव में बहाती है उससे कही ज्यादा विचारो,संघर्षो से टकराती है... विचारो की टकराहट,पहचान की संकट को भावना के उबाल के साथ इतनी सहजता से कैरी कर ले जाना विरले ही देखने को मिलता है... इस कविता की यह सहज यात्रा जहाँ विमर्शों के बाज़ार में एक अलग रास्ता खींचती है वही हमारी संघर्ष को एक नई जमीन देती है... शिल्प के स्तर पर यह कविता गेय लोक कथा की धरातल का सफ़र कराती है... “बढ़ई-बढ़ई खूँटा चिरो... खूँटवा में दाल बा... का खाऊँ का पीऊँ का ले के परदेस जाऊँ...” कविता पड़ते हुए इसकी लय साफ सुनाई पड़ती है... सूरज को बहुत बहुत बधाई...

सुशीला पुरी said...

तुमने मेरी कीमत नींद लगाई थी
जो स्वप्न हमने देखे वो सूद थे
जब स्वप्न चूरे में बिखर गया
तुमने मुझे समुद्र के हाथों बेच दिया
!!!!!!!

Brajesh pandey said...

Is jade me aisi kavita ka ana ek garmahat paida kr rha hai.Pura khayal is bat ka ki khan kitna sinjhana hai,kitni anch chahie.gajab ki kavita .shukriya kunal bhai.Suraj ji ko behtarin rachna hetu badhai!