Tuesday, March 16, 2010

हिंदी कविता

प्रसिद्ध कथाकार रवीन्द्र कालिया एक संस्मरण अक्सर सुनाया करते हैं. जालंधर के दिनों की बात है. एक बार कुछ दोस्तों के साथ देर रात तक मयनोशी हुई. सुबह सकारे जब लोगों की आँख खुली तो पाया गया कि सुदर्शन फाकिर बिस्तरे पर ही उकडू हो बैठे हैं और दनादन यके बाद दीगर ग़ज़लें लिखे जा रहे हैं. लोगों ने पूछा कि या खुदाया ये माजरा क्या है, तो फाकिर ने कहा कि यारो ये बताओ कि रात में जो पी गयी थी उस व्हिस्की का नाम क्या था. सुबह से ही जैसे मुझ पर दौरा सा पड़ा है और बिना किसी मशक्क़त के मेरी कलम से क्या खूब ग़ज़लें निकल रही हैं. मित्रों ने फरमाइश की कि मियां कुछ हमें भी सुनाओ. फिर जब फाकिर ने लिखी गयी ग़ज़लों के एकाध शेर पढ़े, तो लोगों ने अपना सर पीट लिया. दरअसल फाकिर ने जो कुछ लिखा था, वो ग़ालिब की ग़ज़लें थीं.
जो लोग लिखते हैं, और पढ़ते भी हैं (ज्यादातर लोग सिर्फ लिखना पसंद करते हैं) वे सहमत होंगे कि ऐसा अक्सर होता है. कभी का कुछ पढ़ा मन के कहीं इतने गहरे पैठ जाता है कि कई बार हमें पता ही नहीं चलता कि अवचेतन से निकली कोई लाइन सबसे पहले कहाँ पढ़ी थी. खैर ग़ालिब वाली बात तो नहीं, लेकिन एक बार मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. कथाकार मित्र चन्दन पाण्डेय दिल्ली आये हुए थे और कुछ दिनों हमने साथ साथ बिताया. उन दिनों मैं अपने उपन्यास पर काम कर रहा था. लिखने के क्रम में अचानक दो पंक्तियाँ कौंधी और मैं खुद चकित रह गया. दोनों लाइनें इतनी ग़ज़ब की फर्निश्ड थीं कि मैं सहसा डर गया. चन्दन सामने पड़ा तो मैंने उससे इस बाबत पूछा कि ये बताओ कि ये पंक्तियाँ कहीं पढ़ी सुनी है पहले? चन्दन को एकाएक कुछ याद नहीं आया तो मैंने समझा मेरे मन का भ्रम होगा. मैं आगे लिखने लगा. कुछ घंटों बाद चन्दन का फोन आया कि ये लाइनें युवा कवि सौमित्र की एक कविता से बहुत हद तक मिलती जुलती हैं जिसका मित्रों के बीच मैं अक्सर पाठ किया करता था. सौमित्र की यह कविता (पुनर्जन्म) मुझे बहुत प्रिय है. न जाने कितनी दफे मैं इसे पढ़ सुना चुका हूँ.
अभी पिछले दिनों सौमित्र का फोन आया. USA में रहते हैं, कविताएँ बड़ी प्यारी लिखते हैं. मैंने इस घटना का जिक्र किया तो देर तक हँसते रहे. मैंने भाषासेतु के लिए कुछ कविताएँ मांगीं तो आश्वस्त किया कि जल्दी ही भेजेंगे. तब तक मैंने इस बात की इजाज़त ले ली कि 'पुनर्जन्म' समेत उनकी कुछ ऐसी कविताएँ मैं भाषासेतु के पाठकों के लिए मुहैय्या करूँगा, जो मुझे अत्यंत प्रिय हैं। कुणाल सिंह

सौमित्र सक्सेना

नाम
उन सबके नाम बहुत अच्छे हैं
जार्ज, सैंडी,
अहकितिन, मुबारक
गोमेज...
माँ-बाप ने
जब उनके नाम रखे होंगे
तो कुछ अच्छा सोचकर ही
रखे होंगे.
मैं जब भी उन्हें
उनके नाम से बुलाता हूँ
लगता है
कि कुछ
अच्छा काम किया.

आधार
वे सब सोचते हैं-
पक्षी उड़ने से पहले
हवा खोजते हैं.

रकीब
एक बादल टिक गया है
आसमान में
भूमि के एक टुकड़े पर रीझकर
मेरे पास
धुआँ करने को कुछ भी नहीं है
मैं अब ओझल करके सबकुछ
उस मिटटी को भीगने से
नहीं बचा पाऊंगा.
वह धूल भी अब पसीज गयी है
उसी बादल के छींटों से
जिसे उड़ाकर मैं
उसकी आँखों में
झोंक देता.

सीढियां
जितनी सीढ़ियों से मैं नीचे उतरता हूँ
उतनी ही दीवारें मुझे
अलग रंगी दिखाई देती हैं.
छत का उजला आकाश और
पक्षियों की हलचल
जीने में उतरते ही खो जाती हैं
सीढी दर सीढी
मेरा क़द कम होने लगता है और
मेरी दृष्टि
हर निचली जगह पर आकर
ठहर जाती है-
ईमारत के उन हिस्सों पर
जो ऊपर की सतहों को
लादे खड़े हुए हैं.

हर मंजिल पर रास्ता घूमता है
कुछ दरवाज़े दिखाई देते हैं
न जाने क्यों
मुझे लगता है कि उस जगह
मैंने अगर दस्तक दी तो
जो भी आदमी निकलेगा
वह मुझे ऊपरवाला समझकर
सहम जाएगा.
मैं अक्सर
सबसे नीचेवाले घर में पहुंचकर
सब तरफ की खिड़कियाँ
साफ करना चाहता हूँ
मुझे उन पक्षियों के लिए वहां
घोंसले रखने का मन होता है
जो ऊपर के उजाले से
आगे नहीं सोच पाते.

पुनर्जन्म
भूल होती है
तो दुबारा काम करना पड़ता है.
जो कहानी अच्छी लगती है
उसे दुबारा पढता हूँ.
जहाँ से भी मन जुड़ जाता है
दुबारा जाता हूँ वहां.
गर्भवती औरतें एक बार हंसती हैं
पर आवाज़ दो बार आती है-
ऐसा जाने उन्हें क्या अच्छा लगता है
जिसे वे दुबारा सुनना चाहती हैं!

6 comments:

डॉ .अनुराग said...

गोया रकीब पसन्द आ गया .....

Anonymous said...

soumitra ji maine aapko aur jagho par v padha hai-achha likhte hai. yaha naam aadhar aur punrjanm to khash achhi lagi.

ravindra arohi

अनहद/aNHAD said...

अच्छी कविताएँ...प्रस्तुती भी जोरदार

Suman said...

nice

शशिभूषण said...

कुणाल जी,एक बात कथाकार अखिलेश जी भी कहते हैं-कविता लिखना जितना आसान है अच्छी कविता लिखना उतना ही मुश्किल.पहली बार में लिखी हुई लाइनों को काटकर दुबारा लिखना चाहिए.क्योंकि पहली बार में अमूमन प्रभाव ही लिखा जाता है.
यह तो हुई लंबी राह के अनुभवी लोगों की बातें पर कभी कभी ऐसा भी होता है कि आप केवल सोच रहे होते हैं वही बात कोई कह रहा होता है.आप लिखकर रखे रहते हैं.ठीक वैसा ही छप रहा होता है.और इमानदारी से ऐसा होता है.कोई नकल नहीं मार रहा होता तब ऐसा होता है.जिन्होंने सुझाव दिए बाद में अपने आलस पर विजय पाई तो डर ही गए अब तो हमीं नकलची ठहरेंगे.कई बार समय का प्रभाव जबरदस्त होता है जिसे समर्थ भोगते हैं.

पुनर्जन्म वाकई सुंदर कविता है.कविता सार्वभौम है या नहीं इसे आचार्य बताएँगे पर इसमें बड़ी कॉमन गाढ़ी बात कही गई है लगता है जैसे खुद को सुन रहा हूँ.अपनी कल्पनाशीलता में अद्वितीय है यह.

Anonymous said...

Kunal, Thank you! I don't know how to write in Devanagari yet. Need to lean it fast.
Regards,
Saumitra, Dayton-OH.
(saumitra.saxena@gmail.com)