Monday, April 26, 2010

हिंदी कविता

गौरव सोलंकी हमारे समय के चुनिन्दा कथाकारों में से हैं। लिखने की शुरुआत कविता लिखने और प्रेम करने से की। तद्भव, ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश आदि पत्रिकाओं में छप चुके हैं। फिल्मों के खासे शौकीन। जल्दी ही कहानियों की आपकी पहली किताब छपने वाली है। 'भाषासेतु' के पाठकों के लिए पेश है गौरव की कुछ ताज़ातरीन कविताएँ।





गौरव सोलंकी

चूमना और रोते जाना
गोल घूमता आकाश,
उजाला और ईमान,
मेरा खत्म होना, शुरू होना, तुम्हारा माँगना पानी,
देर और डर होना,
हम चले आते हैं ऐसे
जैसे जाना जाना न हो, हो श्मशान, ज्वालामुखी, घोड़ा आखिरी या ईश्वर ख़ुद।

बेहतरीन होने की जिद में
चप्पलें घर पर ही भूल जाना,
खींचना सौ किलो साँस, बाँटना शक्कर, देखना अख़बार।
हो जाना अंधा और खराब,
बिगड़ना जैसे कार,
भींचना मुट्ठी और गोली मारना,
सच बोलना और खाना जहर।

करारे परांठे और किताबें खाना,
बेचना दरवाजे, तोड़ना खिड़की,
घर होना या कि शहर,
तुम्हारी बाँहों में नष्ट होना,
जैसे होना स्वर्ग, लेना जन्म, माँगना किताबें, देखना जुगनू और बार बार वही आकाश।

शहर से बाहर आकर
अपने चश्मे और मतलब आँखों में लौट जाना।
माँगना माफ़ी।

चूमना और रोते जाना।


जहाँ से सड़क शुरू होती है
जहां से सड़क शुरू होती थी
वहां पहली दफ़ा मैंने जानी
कोई राह न बचने वाली बात
और यह कि मजबूर होना किसी औरत का नाम नहीं है।
जब सब मेरे सामने थे
तब मैं रुआंसा और कमज़ोर हुआ
और शोर बहुत था
कि गर्मियां आती गईं गाँव के न होने पर भी।

भूल जाऊँ मैं अँधेरा, हँसी और डिश एंटिने,
पक्षियों से मोहब्बत हो तो जिया जाए,
हवास खोकर पानी ढूँढ़ें, मर जाएँ
और किसी बस में न जाना हो हमेशा अकेले।

वे सराय, जिनमें हम रुकते किसी साल
अगर हम जाते कहीं और रात होती,
वे पहाड़, जिन पर टूटते हमारे पैर,
वे चैनल, जिन्हें प्रतिबंधित किया जाता और हम करते इंतज़ार,
वे चूहे, जो घूमते मूर्तियों पर सुनहरे मन्दिर में,
वे शहर, जिनमें रंग और सूरज हों, रिक्शों के बिना,
हम अगले साल धान बोते तुम्हारे खेत में
और उनमें वे सब हमारे दुख के साथ उगते।

अकाल हो विधाता!

Saturday, April 24, 2010

জীবনগীতিকা

মৃনালেন্দু দাশ

এইখানে বসে আছি রোজকার মতো
তুমি এসে পাশটিতে বসতেই শুরু
হয় সন্ধ্যার কাকলি, চারপাশ চুপ
আলো ছায়া খেলা করে নীল ক্যানভাসে
ট্রেন থামে, ট্রেন চলে যায়, কথা চলে
অগুনতি কথা, কথারা শরীরী হয়
ভাষায় এমন জাদু, নিরিবিলি ছায়া
হয়ে, মায়া হয়ে স্বপ্নের ডানায় উড়ে
চলে বনপথ ছুঁয়ে ছুঁয়ে দূরে, আরো
দূরে, বহুদূরে থাকে অজানা প্রকৃতি
মানুষ জানেনা কিছু, জানে না বলেই
এত কোলাহল, ভুল বোঝাবুঝি, ভুল
দিয়ে গাঁথা ঘরগেরস্থালি রোজ রোজ
টুং টাং বাসনকোসন, জীবনগীতিকা

Mrinalendu Das
57, Abdul Jabbar Road
Post. Kancharapara, Dist. (N) 24 Parganas
Pin : 743145, West Bengal
Mob : 09831263065

Thursday, April 22, 2010

हिंदी कविता




युवा कवयित्री मंजुलिका पाण्डेय 'भाषासेतु' पर पहली बार। बल्कि ब्लॉग की दुनिया में यह मंजुलिका का डेब्यू है। राँची में रहती हैं। पढाई-लिखाई करती हैं। आजकल कहानियां भी लिख रही हैं। जल्दी ही आपकी कहानियां हिंदी की प्रमुख पत्रिकाओं में पाठक पढेंगे।





मंजुलिका पाण्डेय
हम मनीप्लांट हैं
हम मनीप्लांट हैं
जड़ तने में होती है
पत्थर, दीवार, छत...
जो भी मिलता है
जकड लेते हैं
फिर फैलने लगते हैं
रौशनी मिले, न मिले
उर्वरता हो, न हो
पर...
फैलते हैं, फैलते जाते हैं
कि हमें
अभिशाप मिला है
बेशर्मी से जीते जाने का।



मैं एक प्रश्न हूँ
मैं एक प्रश्न हूँ
विरोधाभासों से निषेचित
संशयों के गर्भ में पलता हूँ, बढ़ता हूँ
संघर्ष की गोद में प्रसवित हो
आरोपों के आलिंगन में झूलता हूँ
टूटे सपनों से आदर्शों पर आघात करता हूँ
रिश्तों की प्रपंच शिलाओं से
घिसता हूँ, पिसता हूँ
जीवन के खोल में
मृत्यु सा छिपा हूँ
तर्कों की झुर्रियों में
भावों सा मिटा हूँ
जीवन हूँ मैं?
मैं एक प्रश्न हूँ।

Sunday, April 18, 2010

तालिबान का देसी संस्करण

पिछले दिनों जब मनोज और बबली की हत्या करने वालों को करनाल सत्र न्यायालय ने सजा सुनाई तो ऐसा लगा कि सभ्यता की बर्बरता को सिरे से ख़त्म करने की दिशा में यह पहला क़दम है। विदित हो कि हरयाणा की खाप पंचायत ने वर्ष २००७ में मनोज और बबली की इसलिए हत्या कर दी थी कि उन्होंने खाप के कानून का उल्लंघन कर सगोतिया होने के बावजूद शादी कर ली थी। सिर्फ मनोज और बबली ही क्यों, पिछले कुछ वर्षों में न जाने कितने मनोजों और बबलियों को इसलिए मार दिया गया कि एक ही गोत्र के होने के बाद भी उन्होंने प्रेम विवाह कर लिया था। ऐसे में अगर पहली बार खाप पंचायतों की संप्रभुता को भारतीय संविधान चैलेन्ज करता है तो निश्चित रूप से यह ख़ुशी की बात होनी चाहिए।

लेकिन पिछले दिनों चार राज्यों- हरयाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतों ने एक महासभा की और मनोज व बबली की हत्या के आरोप में दण्डित सात अभियुक्तों को बचाने की जंग छेड़ने का ऐलान किया। पांच हज़ार से ज्यादा लोगों ने इस महासभा में यह निर्णय लिया कि वे मनोज-बबली के हत्यारों को बचाने के लिए हाई कोर्ट से लगा कर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे। तय हुआ कि हर घर से दस दस रुपये चंदा लेकर यह 'धर्मयुद्ध' लड़ा जाएगा। विदित हो कि इस महासभा में भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत और हरयाणा के एक पूर्व डीजीपी महेंद्र सिंह मलिक भी शिरक़त करने पंहुचे थे।

आश्चर्य होता है कि ये खाप के सदस्य आखिर किस दुनिया में जीते हैं! क्या अफगानिस्तान-पाकिस्तान के तालिबानों और खाप के सदस्यों में कोई असमानता है? अगर नहीं है तो फिर सर्कार उनके साथ वही सलूक क्यों नहीं करती जो उसने दंतेवाडा में कथित माओवादियों के साथ किया? पी चिदंबरम ने अभी हाल में पश्चिम बंगाल का दौरा करने के बाद कहा था कि यहाँ की कानून व्यवस्था ठीक नहीं है। तो क्या सिर्फ इसलिए कि वहां वामपंथी सरकार है और हरयाणा में नहीं? याद करें पाकिस्तान की रीढ़हीन सरकार ने भी तालिबानों को पहले उतनी गंभीरता से नहीं लिया था और नतीजा वे आज तक भुगत रहे हैं। तो क्या यह खाप महासभा हमें एक चेतावनी नहीं देता?

कुणाल सिंह

Wednesday, April 14, 2010

बांग्ला कविता


१९५४ में जन्मे जय गोस्वामी के अबतक लगभग २५ कविता संग्रह बांग्ला में प्रकाशित हो चुके हैं। आनंद पुरस्कार समेत कई महत्वपूर्ण पुरस्कार पा चुके हैं। फिलहाल बांग्ला अखबार 'प्रतिदिन' से जुड़े हुए हैं।
1४ मार्च २००७ को नंदीग्राम का भयावह ऐतिहासिक हादसे के बाद जय गोस्वामी ने 'शासक के प्रति' नाम से यह कविता लिखी- सुशील कान्ति


शासक के प्रति

आप जो कहेंगे मैं बिलकुल वही करूँगा
वही खाऊंगा -पियूँगा, वही पहनूंगा ,
मल के वही देह में निकलूंगा बहार
ज़मीन अपनी छोड़
चला जाऊंगा बिना एक भी शब्द कहे
कहेंगे- गले में रस्सी बांध लटके रहो रात भर
वैसा ही करूँगा
सिर्फ अगले दिन जब कहेंगे-
अब उतर आओ
तब लेकिन किसी और की ज़रूरत पड़ेगी
अपने से उतर नहीं पाउँगा
इतना भर
जो न कर सका
उसे न मानें आप
मेरी बेअदबी।


जय गोस्वामी
मोब 0993710969

रूपांतर
संजय भारती
मोब 09330887131

Saturday, April 10, 2010

ग़ज़ल


बहुत दिनों से चाहता था अपने ब्लॉग पे पाकिस्तान के मशहूर शायर जनाब अहमद फ़राज़ की कुछ ग़ज़लें पेश करूँ। सबसे पहले मेहंदी हसन साब की गायी वो मशहूर ग़ज़ल 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ' से ही मैंने फ़राज़ के बारे में जाना। फिर सिलसिला निकल पड़ा। कौन नहीं बार बार सुनना चाहता है मेहंदी साब की ही गायी फ़राज़ की वो एक और मशहूर ग़ज़ल 'ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं'? बहरहाल चूँकि ये दोनों ग़ज़लें बहुत बार सुनी गयी हैं, इसलिए यहाँ दो दूसरी ग़ज़लें पेश हैं।

अहमद फ़राज़ की चन्द ग़ज़लें
एक
बरसों के बाद देखा एक शख्स दिलरुबा सा
अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू खिंचे खिंचे से ऑंखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा

अल्फाज़ थे के जुगनू आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा

ख्वाबों में ख्वाब उसके यादों में याद उसकी
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िन्दगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बतों ने वो नामुरादियाँ दी
ताज़ा रफ़ाक़तों से दिल था डरा डरा सा

अब सच कहें तो यारो हमको खबर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत एक वाकिया ज़रा सा

तेवर थे बेरुखी के अंदाज़ दोस्ती का
वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा

हमने भी उसको देखा कल शाम इत्तेफाक़न
अपना भी हाल है अब लोगो 'फ़राज़' का सा

दो
इससे पहले के बेवफा हो जाएँ
क्यों न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज्र करें
और कहीं और मुब्तला हो जाएँ

इश्क भी खेल है नसीबों का
खाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ

अबके गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ

बंदगी हमने छोड़ दी है 'फ़राज़'
क्या करें लोग जब खुदा हो जाएँ

Thursday, April 08, 2010

बेलारूस से एक कविता






1981 में बेलारूस में जन्मीं वाल्झीना मोल्त की अब तक दो किताबें 'I am as thin as your eyelashes' और 'Factory of Tears' प्रकाशित हो चुकी हैं। फ़िलहाल USA में रहती हैं, University of Baltimore में राईटर-इन-रेजिडेंट हैं। 'भाषासेतु' पर पहली बार।


वाल्झीना मोल्त
अंग्रेजी से अनुवाद : कुणाल सिंह

यह यकीन करना कितना मुश्किल है
यह यकीन करना कितना मुश्किल है
कि आज हम जितने हैं
कभी इससे भी कमसिन हुआ करते थे
कि हमारी खाल इतनी पारदर्शी हुआ करती थी
कि नसों शिराओं की नीली स्याही झांकती थी उससे होकर
जैसे स्कूल कि कॉपिओं के ज़र्द पन्ने पे खिंची हों नीली लाइनें

कि यह दुनिया एक यतीम कुत्ते की मानिंद थी
जो छुट्टी के बाद हमारे साथ खेला करता था
और हम सोचते थे कि एक दिन इसे हम अपने घरों में लिए जाएँगे
हम ले जाते, इससे पेश्तर कोई और बाज़ी मार ले गया
उसे एक नाम दिया
प्रशिक्षित किया कि अजनबियों को देखो तो भौंको
और अब हम भी अजनबियों के घेरे में आते थे

और इसी वजह से देर रात हम जाग पड़ते
और अपनी टीवी सेट की मोमबत्तियों को जला देते
और उनकी गर्म रौशनी की आंच में हमने पहचानना सीखा
चेहरों और शहरों को
और सुबहिया हिम्मत से लैश होकर
फ्राइंग पैन से उतार फेंकना सीखा ओम्लेट को

लेकिन हमारा कुत्ता किसी और के फीते से बंधा बड़ा होता रहा
और हमारी माँओं ने अचानक हमें मर्दों के साथ सोने
और आज की तारीख में देखने से मना कर दिया

किसी बेदाग़ कल्पना में खोने की सोचना कितना आसान होता है।